प्रधानमंत्री की चुप्पी कोई रणनीति नहीं,मजबूरी है !
भारत के इतिहास में सबसे बड़े घोटाले के रूप में चर्चा में आए 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर रोज नए खुलासे हो रहे हैं।हर सुलासा इन घोटालों से जुड़े कड़ियों को परत दर परत खोल रहा है। उस पर प्रधानमंत्री की चुप्पी ने राज को और गहरा दिया है। यह विडंबना ही है कि अपने मंत्री (राजा ने अब इस्तीफा दे दिया है) के खिलाफ इतने सारे सबूत मिलने के बाद भी देश का प्रधान मंत्री अपनी तरफ से एक बयान तक जारी नहीं कर रहा है। ताजा विवाद डीएमके नेता दयानिधि मारन की उस चिट्ठी को लेकर उठा है जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में दखलअंदाजी नहीं करने को कहा था।
टीवी चैनल आईबीएन 7 ने दावा किया है कि दयानिधि मारन ने पीएम को लिखी चिट्ठी में स्पेक्ट्रम की कीमतों के बारे में दखल नहीं देने का अनुरोध किया था। भाजपा नेता अरुण जेटली ने ऐसी चिट्ठी का खुलासा होने पर कहा कि यह बेहद अफसोसजनक है कि गठबंधन में शामिल कोई दल सरकार पर इस तरह दबाव डाले। सरकार को अब बहुत कुछ बताना होगा।
दिलचस्प है कि इस घोटाले का तार पीएमओ से भी जुड़े होने के सबूत मिले हैं ।यह बात भी सामने आई है कि सीताराम यचुरी ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अनियमितता से संबंधित तीन चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी थी लेकिन उन्हें उसका कोई जवाब नहीं मिला।
यह बात भी सामने आई है कि इस्तीफा देने से ठीक पहले भी राजा तीन बड़ी मोबाइल कंपनियों को एयरवेव्स आवंटन की कोशिश में जुटे थे। जब एक तरफ इन घोटालों में राजा की संलिप्तता की बात सामने आ चुकी थी और देश उनसे इस्तीफा मांग रहा था उस वक्त भी राजा टाटा टेलीसर्विसेज, यूनिनॉर और वीडियोकॉन(10 नवंबर) को एयरवेव्स आवंटन की कोशिश में लगे थे जबकि ट्राई की सिफारिशों के मुताबिक जब तक आवंटन की नई नीति नहीं बन जाती है, तब तक नया आवंटन नहीं करना था।
जाहिर है राजा को डीएमके हाईकमान से कुछ भी करने की पूरी छुट थी।इस बात की भी आशंका जताई गई है कि घोटाले की राशि राजा ने अकेले हजम नहीं किया है ।आश्चर्य की बात है कि तमिलनाडु में करूणानिधि की विरासत संभालने के लिए उनके दोनों बेटे में मनमुटाव है ।लेकिन स्टालिन से राजा की बनती है लेकिन अल्हागिरी उन्हें पसंद नहीं करते । परंतु 2जी स्पेक्ट्रम प्रकरण में उन्होंने राजा का खूब बचाव किया है।क्या यह सिर्फ पार्टी धर्म है ।
ए. राजा के खिलाफ पीएम की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लिखित जवाब देने के लिए शनिवार तक मोहलत दी है ।अपनी बेदाग छवि के लिए हर जगह प्रशंसा बटोरने वाले प्रधानमंत्री आखिर चुप क्यों हैं? क्या सरकार बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने अपनी विश्वसनियता दांव पर लगा दी है?
यूपीए पार्ट -१ में तो अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के लिए उन्होंने वामदलों की एक नहीं सुनी थी।उस वक्त तो उन्होंने सरकार को दांव पर लगा दिया था। क्या अब प्रधानमंत्री सत्तालोलुप हो गये हैं ?प्रधानमंत्री की चुप्पी विपक्ष द्वारा लगाये जा रहे बहुत सारे इल्जामों की जवाब दे रही है।
प्रधानमंत्री भी समझ रहे हैं कि सरकार चलाने के दबाव में उनसे गलती हो गई है ।इसलिए वे कुछ समझ नहीं पा रहे हैं।उनकी जगह पर कोई और होता तो कई बयान जारी कर चुका होता लेकिन मनमोहन सिंह खांटी राजनीतज्ञ नहीं है और जाहिर है झूठ भी नहीं बोलना चाहते, इसलिए चुप हैं।
लेकिन अब चुप रहकर मनमोहन सिंह अपनी साख नहीं बचा सकते जैसा कि कई मौकों पर उन्होंने किया है।प्रधानमंत्री की चुप्पी ने उनके विरोधियों को मौका दे दिया है। इस बार उनकी चुप्पी किसी रणनीति का हिस्सा नहीं बल्कि मजबूरी है।
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