भारत बनाना रिपब्लिक है : टाटा [ये 'बनाना' क्या है?]
आजकल जिसे देखो, वहीं बनाना रिपब्लिक का नाम लेता जा रहा है। बात शुरू हुई नीरा राडिया से, फिर रतन टाटा ने तस्दीक किया कि हम बनाना रिपब्लिक में रहते हैं। इधर हमारे कामरेड भाईलोग सालों से ये बात कहते आ रहे थे, किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था। आखिरकार हमने आजिज आकर अपने एक दोस्त से पूछ ही लिया कि मियां ये बनाना रिपब्लिक क्या बला है? उसका कहना था कि यू नो… जब रिपब्लिक बनाना की तरह हो जाए तो उसे बनाना रिपब्लिक कहते हैं! मैंने कहा कि अर्थ स्पष्ट करो। तो उसने कहा कि जिस देश को लोग पके हुए केले की तरह मनमर्जी दबा दें, तो वो बनाना रिपब्लिक हो जाता है!
इधर हाजीपुर से एक भाई ने फोन पर दावा किया कि बनाना रिपब्लिक का नाम हाजीपुर के केला बगान पर पड़ा है! उसका तर्क था कि जैसे गंगा किनारे के दियारा में (नदी के किनारे का इलाका) ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस चलती है’, वही हाल बनाना रिपब्लिक का भी होता है! मुझे लगा कि ये सही परिभाषा है। वैसे हाजीपुर के ही एक दूसरे सज्जन ने फोन किया कि ऐसा कहना हाजीपुर के केला बगान का अपमान है और इस पर मानहानि का मामला बन सकता है! आखिर ‘दियारा’ के भी कुछ अपने नियम-कानून होते हैं, उसकी तुलना आप बनाना रिपब्लिक से कैसे कर सकते हैं?
खैर, यह सवाल कई दिनों तक मुझे परेशान किये रहा। फिर महर्षि गूगल ने बताया कि बनाना रिपब्लिक दरअसल उसे कहते हैं, जहां वाकई जिसकी लाठी उसकी भैंस होती है।
दरअसल, बनाना रिपब्लिक का नामकरण एक अमेरिकी लेखक ओ हेनरी ने 20वीं सदी के शुरुआती सालों में किया था। हेनरी साहब ने 1904 में ‘कैबेज एंड किग्स’ नामकी अपने लघुकहानी संग्रह में इसका जिक्र किया था, जब वे अमेरिकी कानूनों से बचने के लिए होंडुरस में रह रहे थे। होंडुरस, उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप मे ही है, मैक्सिको-ग्वाटेमाला से बिल्कुल सटा हुआ, उसके दक्षिण में।
बनाना रिपब्लिक का केले से वाकई संबंध है। दरअसल, जब बागवानी कृषि के लिए बड़े पैमाने पर गुलामों और दासों का उपयोग किया जा रहा था, तो उस समय भूस्वामियों ने बेतरह गुंडागर्दी मचा रखी थी। बागवानी कृषि में बड़े पैमाने पर केले का उत्पादन होता था और दासों से जानवरों की तरह काम लिया जाता था। ये भूस्वामी आपस में भी लड़ते थे और साथ ही उन देशों की सत्ता को इन्होंने अपना रखैल बना लिया था। उन्हीं भूस्वामियों की बड़ी-बड़ी कंपनियां थीं, जो केले का निर्यात अमेरिका और यूरोप के बाजारों में करते थे। कहते हैं कि पहली बार जब इसका निर्यात यूरोपियान बाजार में हुआ, तो उसमें हजार फीसदी का मुनाफा हुआ था! उसी केले की बागवानी के नाम पर ऐसे देशों को बनाना रिपब्लिक कहा गया। जहां नियम-कायदों की जगह ताकत, पूंजी और भाई-भतीजाबाद का नंगा खेल चलता था। केले को डॉलर में बदलने का ये सिलसिला 19वीं सदी के शुरुआत में हुआ था।
बाद में लोग कैरिबियन द्वीप समूहों के अलावा कई लैटिन अमेरिकी देशों को बनाना रिपब्लिक कहने लगे। वजह साफ थी। यहां लाठी का नंगा नाच होता था। वैसे इन देशों में व्यापक पैमाने पर केले की खेती करने का काम रेल पटरी बिछाने वाली अमेरिकी कंपनी के मालिक हेनरी मेग्स और माईनर कीथ ने किया था, जिसने मजदूरों को खाना खिलाने के लिए रेलवे पटरियों के किनारे केले की खेती शुरू की। बाद में यह केला सोना उगलने लगा और इसे लेकर खून-खराबे, सत्ता पलट और मजदूरों पर अमानुषिक अत्याचार शुरू हो गये।
कहते हैं कि केले की खेती से इतना मुनाफा होने लगा कि केला कंपनियों ने वहां की सत्ता का दुरुपयोग कर कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। माईनर कीथ जो रेल की पटरी बिछाते थे, उन्होंने कई केला कंपनियों के साथ अपनी रेल पटरी कंपनी का विलय कर इतनी बड़ी कंपनी बना ली कि उन्होंने अमेरिका के 80 फीसदी केला कारोबार पर ही कब्जा कर लिया! अब वे ‘बनाना किंग’ बन गये। इसके लिए हर उपलब्ध साधन अपनाये गये। हालत ये हो गयी कि इन केला कंपनियों ने दक्षिण अमेरिका, कैरिबियाई द्वीप समूह और केंद्रीय अमेरिका के लाखों लोगों को भूमिहीन बनाकर बंधुआ मजदूर बना लिया गया। इन मजदूरों को सीमित रूप से भोजन और यौन संबंध बनाने की आजादी मिली हुई थी।
ये केला कंपनियां इतनी ताकतवर थीं कि इन्होंने सीआईए के साथ मिलकर कई देशों में तख्ता पलट करवाया और कई राष्ट्रपतियों की हत्या कर दी गयी। पाब्लो नेरुदा ने लैटिन अमरीकी देशों में इन कंपनियों केला कंपनियों के राजनीतिक प्रभुत्व की अपनी कविता ‘ला यूनाईटेड फ्रूट कंपनी’ में भर्त्सना भी की।
उस हिसाब से देखा जाए तो केला कंपनियों की तरह अपने यहां कंपनियां जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक की लूटमार करती ही रहती हैं। तो फिर टाटा साहब का कहना ठीक है कि हम बनाना रिपब्लिक हो गये हैं! अंग्रेजी में ये शब्द कितना अच्छा लगता है…!
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ओ हेनरी अर्थशास्त्री थे? हमें तो पता ही नहीं था! अब तक तो हम उनको एक साहित्यकार के ही रूप में जान रहे थे! वैसे अगली पंक्ति में उनके “लघुकहानी संग्रह” का उल्लेख भी है. मुझे किसी विद्वान का यह कथन याद आ रहा है कि लापरवाही से किया गया लेखन अपने पाठकों के प्रति अशिष्टता है.
कालचिंतन जी,
आपके कमेंट के तुरंत बाद वो गलती ठीक कर दी गई है। यह एक संपादकीय भूल थी। और पाठकों के प्रति हुई अशिष्ठता के लिए हम माफी मांगते हैं।
धन्यवाद समरेन्द्र जी. गलती करना तो स्वाभाविक है. मगर उसे सुधारना परिपक्वता का परिचायक है.