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	<title>जनतंत्र &#187; सुर्ख़ियां</title>
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	<description>बोल के लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>फिर से शुरु हो रहा है जनतंत्र</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Jul 2011 08:15:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[करीब पांच महीने हो गए. जनतंत्र पर कोई भी अपडेट नहीं हुआ. पाठकों को हमसे शिकायत रही कि बिना किसी नोटिस के इसे अचानक लावारिस की तरह छोड़ दिया गया. खुद जनतंत्र की टीम को इसका इफसोस है. यह हमारे लिए बेहद मुश्किल दौर था. कई मोर्चों पर एक साथ संघर्ष ने हमें इस कदर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/07/jantantra.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/07/jantantra.jpg" alt="" title="jantantra" width="100" height="60" class="alignleft size-full wp-image-21677" /></a>करीब पांच महीने हो गए. जनतंत्र पर कोई भी अपडेट नहीं हुआ. पाठकों को हमसे शिकायत रही कि बिना किसी नोटिस के इसे अचानक लावारिस की तरह छोड़ दिया गया. खुद जनतंत्र की टीम को इसका इफसोस है. यह हमारे लिए बेहद मुश्किल दौर था. कई मोर्चों पर एक साथ संघर्ष ने हमें इस कदर उलझा दिया था कि हम जनतंत्र के लिए जरा भी वक्त नहीं निकाल सके. लेकिन अब नए सिरे से टीम तैयार हो रही है. कुछ नए साथी जुड़े हैं. स्थितियां बेहतर तो नहीं हुई हैं लेकिन बहुत बिगड़ी भी नहीं हैं. इसलिए हम फिर से जनतंत्र को शुरू करने का हौसला जुटा रहे हैं. एक हफ्ते के भीतर यह मंच अपने पुराने तेवर और ज्यादा परिपक्व अंदाज में वापस लौटेगा. हमें उम्मीद है कि आप फिर से हमें उतना ही स्नेह देंगे और यहां समाज, संस्कृति, सियासत और सिनेमा से जुड़े तमाम मुद्दों पर जोरदार बहस होगी. इस वेबसाइट को रोचक और आकर्षक बनाने के लिए आप सभी के सुझावों का स्वागत है. उम्मीद है कि आप सभी खुलकर अपनी प्रतिक्रिया देंगे. &#8211; मॉडरेटर </p>
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		<title>भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पर पटना में होगी बहस</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Feb 2011 16:55:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[तीर-ए-नज़र]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>
		<category><![CDATA[bhojpuri films]]></category>
		<category><![CDATA[fondation for media culture and cinema awareness]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[sri krishna memorial hall]]></category>
		<category><![CDATA[एफएमसीसीए (फाउंडेशन फॉर मीडिया कल्‍चर एंड सिनेमा अवेयरनेस)]]></category>
		<category><![CDATA[पटना]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी सिनेमा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीकृष्‍ण मेमोरियल हॉल]]></category>

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		<description><![CDATA[16 फरवरी को भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर एफएमसीसीए (फाउंडेशन फॉर मीडिया कल्‍चर एंड सिनेमा अवेयरनेस) पटना में तीन दिनों का भोजपुरी फिल्‍म और सांस्‍कृतिक समारोह आयोजित करने जा रहा है। 14, 15 और 16 फरवरी को एएन सिन्‍हा इंस्‍टीच्‍यूट और श्रीकृष्‍ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस समारोह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/film.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/film-192x300.jpg" alt="" title="film" width="192" height="300" class="alignright size-medium wp-image-21549" /></a><strong>16 </strong>फरवरी को भोजपुरी सिनेमा के पचास साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर एफएमसीसीए (फाउंडेशन फॉर मीडिया कल्‍चर एंड सिनेमा अवेयरनेस) पटना में तीन दिनों का भोजपुरी फिल्‍म और सांस्‍कृतिक समारोह आयोजित करने जा रहा है। 14, 15 और 16 फरवरी को एएन सिन्‍हा इंस्‍टीच्‍यूट और श्रीकृष्‍ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस समारोह में भोजपुरी के लगभग सभी जाने माने चेहरे मौजूद रहेंगे।</p>
<p><strong>दो </strong>सेमिनार, पांच सिनेमा, मूविंग एग्जिविशन, फूड कोर्ट और तीन संगीत संध्‍या से सजे इस समारोह की रौनक होंगे शारदा सिन्‍हा, छन्‍नूलाल मिश्रा, भरत शर्मा व्‍यास, गिरिजा देवी, मालिनी अवस्‍थी, ब्रजकिशोर दुबे, रवि किशन, मनोज तिवारी, नितिन चंद्रा और त्रिपुरारी शरण।</p>
<p><strong>भोजपुरी</strong> के पांच दशक की कुछ चुनिंदा फिल्‍में दिखायी जाएंगी, जिनमें गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, बलम परदेसिया, हमार संसार, ससुरा बड़ा पइसा वाला, कब अइबू अंगनवा हमार, देसवा और उधेड़बुन जैसी फिल्‍में शामिल हैं। भोजपुरी के शेक्‍सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर कृत और संजय उपाध्‍याय निर्देशित बिदेसिया का मंचन भी इस मौके पर किया जाएगा।</p>
<p><strong>पचास </strong>सालों में भोजपुरी जैसी भाषा ने सिनेमा के मोर्चे पर जितनी भी कामयाबी हासिल की हो, उसे विमर्श के केंद्र में लाना जरूरी है। दुनिया की तमाम भाषाओं के सिनेमा का विमर्श हमारे सामने है, लेकिन भोजपुरी सिनेमा को लेकर विमर्श की स्थिति अच्‍छी नहीं है। समारोह में भोजपुरी सिनेमा के विभिन्‍न आयामों और उसके भविष्‍य पर सिनेमा के बड़े दिग्‍गज अपनी राय रखेंगे।</p>
<p><strong>सेमिनार </strong>के चेहरे होंगे अभय सिन्‍हा, अनीश रंजन, हृषिकेश सुलभ, त्रिपुरारी शरण, आनंद भारती, अनिल अजिताभ, कुणाल, राकेश पांडेय, शंकर प्रसाद, मनोज भावुक, किरण कांत वर्मा, सिद्धार्थ सिन्‍हा, विनोद अनुपम, आलोक रंजन, पंकज शुक्‍ला, मुन्‍ना कुमार पांडेय, ज्ञानदेव मणि त्रिपाठी, सफदर इमाम कादरी, डॉ सुनील कुमार, विनय बिहारी, रंजन सिन्‍हा और लालबहादुर ओझा।</p>
<p><strong>इस</strong> मौके पर वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक रंजन भोजपुरी सिनेमा के पचास सालों के सफर पर एक मूविंग एग्जिविशन भी लगाएंगे। साथ ही बिहार के स्‍वादों पर आधारित फूड कोर्ट्स भी लगेंगे।</p>
<p><strong>भोजपुरी</strong> फिल्‍म एवं सांस्‍कृतिक समारोह से जुड़ी किसी भी तरह की सूचना के लिए आप समरेंद्र और अविनाश से संपर्क कर सकते हैं। समरेंद्र का ईमेल आईडी indrasamar@gmail.com है और नंबर है 09504901446, जबकि अविनाश से avinashonly@gmail.com और 09811908884 पर संपर्क किया जा सकता है।</p>
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		<title>जन-मजूरों, हलवाहों-चरवाहों के गायक थे बालेस्‍सर यादव</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Jan 2011 04:02:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong> प्रभात रंजन ♦</strong>लेकिन कल जब पढ़ा कि बालेश्‍वर नहीं रहे तब जाकर यह लगा कि भोजपुरी की एक बड़ी लोक-परंपरा का सचमुच अंत हो गया। वह परंपरा भोजपुरी के ‘बाजार’ बनने से पहले खेतों-खलिहानों तक में फैली थी। मेरे अपने जीवन के उस छोटे-से अंतराल का भी जिसे बालेश्‍वर के गीतों ने धडकाया था।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ प्रभात रंजन </strong></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Baleshwar-Yadav-Image.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Baleshwar-Yadav-Image.jpg" alt="" title="Baleshwar-Yadav-Image" width="481" height="720" class="alignright size-full wp-image-21481" /></a>जिन दिनों सीतामढ़ी में लंबी मोहरी का पेंट पहनने वाले और बावरी (बाल) बढाकर घूमने वाले स्कुलिया-कॉलेजिया लड़के दरोगा बैजनाथ सिंह के आतंक से छुपते फिरते थे, क्योंकि बैजनाथ सिंह जिस नौजवान के पेंट की मोहरी लंबी देखता वहीं कैंची से काट देता था, जिसकी बावरी बढ़ी देखता मुंडन करवा देता था, उन्हीं दिनों एक गीत सुना था…</p>
<p><em>बबुआ पढ़े जाला पटना हावड़ा मेल में<br />
गयी जवानी तेल में ना…<br />
</em><br />
उन्हीं दिनों एक बार जब मैं नयी काट का पेंट-शर्ट डालकर ननिहाल गया था तो दूर के रिश्ते के एक मामा ने कहा था,</p>
<p><em>घर में बाप चुआवे ताड़ी, बेटा किरकेट के खेलाड़ी<br />
लल्ला नाम किया है जीरो नंबर फेल में ना…</em></p>
<p>बालेश्‍वर के गीत से मेरा यही पहला परिचय था। वैसे यह तो बहुत बाद में पता चला था कि उस गायक का नाम बालेश्‍वर था।</p>
<p>बाद में उस गायक से परिचय कुछ और तब गहराया, जब दूर मौसी के गांव का एक आदमी हमारे यहां कुछ दिन खेती करवाने आया था – विकल दास। शाम को नियम से मठ के पुजारी जी की संगत में भांग खाकर आता और जाड़े की उन रातों में घूर तापते हुए कभी-कभी हम बच्चा लोगों को गीत भी सुनाता। कल मोहल्ला पर बालेश्‍वर की मौत के बारे में निरुपम जी का लेख पढकर उसी का सुनाया एक गीत याद आ गया…</p>
<p><em>पटना शहरिया में घूमे दु नटिनिया<br />
मोरे हरि के लाल<br />
काले लाल गाल पे रे गोदनवा…<br />
मोरे हरि के लाल…</em></p>
<p>उसकी अंतिम लाइन याद आयी तो कल भी दिल में हूक सी उठ गयी – ऊंची अटरिया से बोली छपरहिया, आजमगढ़ बालेश्‍वर बदनाम, मोरे हरि के लाल… लेकिन तब यह भी समझ में आ गया था कि बालेश्‍वर की पहुंच कहां तक है। बालेश्‍वर को सुनना उन दिनों हमारे जैसे खुद को शिक्षित समझे जाने वाले परिवारों में बदनामी का ही कारण समझा जाता था। वह तो जन-मजूरों, हलवाहों-चरवाहों का गायक था। हमारे घर में फिलिप्स का टू बैंड रेडियो था। दादी को जब अपने बनिहारों से बिना मेहनताना दिये कोई काम करवाना होता था तो कहती – जरा बाहर एकर सब वाला गीत लगा दे। मैं टी सीरीज का वह कैसेट लगा देता, जिसके ऊपर लिखा था ‘बेस्ट ऑफ बालेश्‍वर’। दादी गोला साह की दुकान से मंगवाये गये गोदान का चाय बनातीं और वे बनिहार पेड़ को देखते-देखते जलावन की लकड़ी में बदल डालते या बाहर सूख रहे गेहूं या धान के ढेर को समेटकर दालान में रख देते। कुछ नहीं बस चाय और बालेश्‍वर के दम पर।</p>
<p>खैर, हो सकता है कि यही कारण रहा हो कि धीरे-धीरे बालेश्‍वर के गीत मैं भी सुनने लगा। जिन दिनों बोफोर्स कांड की गूंज थी, तो उसका यह गीत दिल को तब बड़ा सुकून देता था,</p>
<p><em>नयी दिल्ली वाला गोरका झूठ बोलेला<br />
हीरो बंबई वाला लंका झूठ बोलेला…</em></p>
<p>गीत में कुछ भी अतिरिक्त नहीं था लेकिन जाने क्या था कि सब समझ जाते कि इसमें किन ‘झूठों’ की चर्चा हो रही है।</p>
<p>बाद में जब दिल्ली आये तो हिंदू कॉलेज हॉस्टल में मैंने पाया कि मेरे जैसे कुछ और लड़के थे, जिनके पास बालेश्‍वर का कैसेट था। उन दिनों उनके गीत हम विस्थापितों को जोड़ने का काम करते। हॉस्टल में जब लड़के बोब डिलन, फिल कोलिंस के गाने सुनते तो हम बालेश्‍वर के गीत सुनते और उस संस्कृति पर गर्व करते जिसने बालेश्‍वर जैसा गायक दिया। वे अलग दिखने के लिए अंग्रेजी गाने सुनते, हम अलग दिखने के लिए बालेश्‍वर के गीत सुनते…</p>
<p>बाद में जाने कहां वह कैसेट गया… कहां वह विस्थापितों की एकता गयी। सचमुच हम इतने ‘शिक्षित’ हो गये कि भोजपुरी से, उसके गीतों से पर्याप्त दूरी हो गयी।</p>
<p>मैं सच बताऊं तो बालेश्‍वर को भूल गया था। बीच-बीच में खबर सुनकर यह मान चुका था कि उनकी मृत्यु हो चुकी है। वह तो भला हो ईटीवी बिहार, महुआ जैसे भोजपुरी चैनलों का कि जिसने कुछ कार्यक्रमों में उनको दिखाकर यह इत्मीनान करवा दिया कि वे जीवित हैं। लेकिन कल जब पढ़ा कि बालेश्‍वर नहीं रहे तब जाकर यह लगा कि भोजपुरी की एक बड़ी लोक-परंपरा का सचमुच अंत हो गया। वह परंपरा भोजपुरी के ‘बाजार’ बनने से पहले खेतों-खलिहानों तक में फैली थी।</p>
<p>मेरे अपने जीवन के उस छोटे-से अंतराल का भी जिसे बालेश्‍वर के गीतों ने धडकाया था।</p>
<p><em>(<strong>प्रभात रंजन</strong>। युवा कथाकार और समालोचक। पेशे से प्राध्‍यापक। जानकी पुल नाम की कहानी बहुत मशहूर हुई। इसी नाम से ब्‍लॉग भी। उनसे prabhatranja@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)</em></p>
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		<item>
		<title>दलित नेता सुधीर ढवले को बिनायक सेन बनाने की तैयारी</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jan 2011 02:13:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और  मराठी पत्रिका, 'विद्रोही ' के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>यह</strong> एक खतरनाक दौर है। सत्ता ने नशे में चूर आले दर्जे के मूर्ख हुक्मरान हर वो आदेश दे रहे हैं जो देश की मूल भावना के खिलाफ जाता है। वो एक तरफ को लूट-खसोट में लिप्त हैं और हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटाले कर रहे हैं और दूसरी तरफ उन लोगों को उठा कर जबरन जेल में ठूंस रहे हैं जो गरीबों-दलितों के हितों की बात करते हैं। बिनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसके गवाह हम सब हैं और अब महाराष्ट्र में दलित नेता सुधीर ढवले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यही नहीं रविवार को उनके घर पर बिना सर्च वारंट के छापा मारा और घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए तलाशी ली। पुलिस की इस गैरकानूनी कार्रवाई का हम विरोध करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि सुधीर ढवले को तुरंत रिहा किया जाए। &#8211; <strong>मॉडरेटर </strong></p></blockquote>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/sudhir-dhawle.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/sudhir-dhawle.jpg" alt="" title="sudhir dhawle" width="200" height="147" class="alignright size-full wp-image-21463" /></a>महाराष्ट्र पुलिस ने भी छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह गरीबों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी है। इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और  मराठी पत्रिका, &#8216;विद्रोही &#8216; के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। पुलिस ने उनको नक्सलवादी बताकर अपने काम को आसान करने की कोशिश भी कर ली है। <span id="more-21462"></span></p>
<p>अभी पिछले हफ्ते गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने महाराष्ट्र सरकार से आग्रह किया था कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान को तेज किया जाए। सबको मालूम है कि जब पुलिस के ऊपर आला अफसरों का दबाव पड़ता है तो वे सबसे आसान पकड़ उन वामपंथियों को मानते हैं जो गरीब आदमियों के बीच काम कर रहे हों। छत्तीसगढ़ में डॉ बिनायक सेन ऐसे ही शिकार थे और अब महाराष्ट पुलिस ने वही कारनामा कर दिखाया है। सुधीर ढवले ने वर्धा में रविवार को अंबेडकर-फुले साहित्य सम्मलेन को संबोधित किया था और गिरफतारी के समय ट्रेन से वापस मुंबई  जा रहे थे। उन्हें गिरफ्तार करके 12 जनवरी तक पुलिस हिरासत में रखा जाएगा। गोंदिया की पुलिस ने दावा किया है कि कुछ लोगों ने उसे बता दिया था कि सुधीर ढवले किसी नक्सलवादी संगठन के राज्य स्तर के पदाधिकारी हैं। और उनके पास एक कम्प्युटर है जिसमें सारा नक्सलवादी साहित्य रखा हुआ है। सुधीर का कम्प्युटर भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है। सुधीर की गिरफ्तारी को सभ्य समाज के लोग किसी भी विरोधी आवाज को कुचल देने की सरकारी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं। </p>
<p>सुधीर ढवले कोई लल्लू पंजू सड़क छाप नेता नहीं है। महाराष्ट्र में दलित अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन के चोटी के नेता हैं। महाराष्ट्र में जाति के विनाश के लिए चल रहे आंदोलन में वे बहुत ही आदर के मुकाम पर विराजमान हैं। 2006 में जब खैरलांजी में दलितों की सामूहिक ह्त्या की गयी थी तो महाराष्ट्र के नौजवानों में बहुत गुस्सा था। उसके बाद 6 दिसंबर 2007 को डॉ अंबेडकर के महापरिनिर्वाण के दिन रिपब्लिकन जातीय अन्ताची चालवाल की स्थापना करके सुधीर ढवले ने जाति के विनाश के डॉ अंबेडकर के अभियान को आगे बढ़ाया था। यह आंदोलन आज मुंबई में एक मजबूत आंदोलन है। इस बात में दो राय नहीं है कि वे सरकार के लिए असुविधाजनक हमेशा से ही रहे हैं। महाराष्ट्र में चल रहे उस आंदोलन की अगुवाई भी वे कर रहे थे जिसमें मुंबई और महाराष्ट्र के सभ्य समाज के लोग डॉ बिनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ लामबंद हो गए थे। सुधीर की गिरफ्तारी के बाद मुंबई के संस्कृति कर्मियों के बीच बहुत गुस्सा है। फिल्मकार आनंद पटवर्धन ने कहा कि सुधीर ढवले बहुत ही भले आदमी  है। उनको भी उसी तर्ज़ पर पकड़ा गया है जिस पर बिनायक सेन को पकड़ा  गया था। फिल्मकार सागर सरहदी ने भी सुधीर ढवले की गिराफ्तारी को गलत बताया है।</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>देश को फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jan 2011 01:48:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशुतोष</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/manmohan_singh.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/manmohan_singh-300x202.jpg" alt="" title="manmohan_singh" width="300" height="202" class="alignright size-medium wp-image-21459" /></a>सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। और ये उस वक्त कहा जा रहा है, जब देश की कमान एक अर्थशास्त्री के हाथों में है।</p>
<p>जिस व्यक्ति के सिर पर वर्ष 2004 से अब तक देश की विकास दर नौ प्रतिशत के आस-पास रखने का सेहरा बंधता है, देश की आर्थिक क्रांति का जनक जिन्हें माना जाता है, ऐसे प्रधानमंत्री के काल में बसु का यह बयान चौंकाता है। मैं यह मानने को तैयार नहीं कि मनमोहन सिंह के पास महंगाई से निपटने का कोई रास्ता नहीं है। </p>
<p>मनमोहन सिंह वह शख्स हैं, जिन्होंने तब देश को राह दिखाई थी, जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। राजनेताओं के हाथ-पांव फूल गए थे। तब एक अर्थशास्त्री सामने आया था, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। ऐसे में, जब वर्ष 2004 मे सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी, तो सबको पता था कि राजनीति सोनिया देखेंगी और मनमोहन सिंह एक नौकरशाह की तरह सरकार चलाएंगे। पांच साल तक यह व्यवस्था अच्छी तरह चली। अर्थव्यवस्था भी सरपट भागी और मनमोहन सिंह भी मध्य वर्ग के लाडले बने रहे। विपक्ष औंधे मुंह पड़ा था और मीडिया अपनी राह से भटका हुआ, खासतौर पर टीवी, जो खबरों के अलावा सब कुछ कर रहा था।<span id="more-21460"></span></p>
<p>पिछले आम चुनाव ने मनमोहन सिंह को मैच विनर बना दिया। यहीं से उनकी मुसीबत शुरू हो गई। वर्ष 2004 में लोगों को उनसे कोई अपेक्षा नहीं थी, लेकिन 2009 में उम्मीदें अचानक काफी बढ़ गईं। लोग उनमें एक अर्थशास्त्री के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी खोजने लगे। पार्टी के अंदर और बाहर उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ने लगी। जब तक वह कमजोर व्यक्ति थे, सबको सूट करते थे, लेकिन जैसे ही मजबूत हुए लोगों को खटकने लगे।</p>
<p>विपक्ष विशेषकर बीजेपी भी खड़ी हो गई। मीडिया भी खबरों पर वापस आया, तो एक के बाद एक घोटाले खुलने लगे। सरकार का हनीमून खत्म भी नहीं हुआ कि दिन में तारे नजर आने लगे। आरोपों की हुंकार प्रधानमंत्री के दरवाजे तक गूंजने लगी। इस्तीफा मांगा जाने लगा और ईमानदार प्रधानमंत्री को राजीव गांधी की तरह बयान देना पड़ा कि सीजर की पत्नी को शक से ऊपर रहना चाहिए, इसलिए वह पीएसी के सामने पेश होने को तैयार हैं। यानी उन्होंने जब कोई घोटाला किया ही नहीं, तो किसी भी जांच से डर कैसा? मनमोहन सिंह की यह कमजोरी थी। इसलिए नहीं कि उन्होंने कोई गलती की है, बल्कि इसलिए कि वह राजनीतिज्ञ की तरह बर्ताव नहीं कर रहे और बुरी तरह से एक्सपोज हो रहे हैं। जैसे राजीव गांधी जाल में उलझ गए थे।</p>
<p>राजीव भी स्वभाव से राजनीतिज्ञ नहीं थे। राजनीति की बारीकियों और नेताओं की धूर्तता से वह वाकिफ नहीं थे। उन्हें अहसास नहीं था कि राजनीति में कहा कुछ जाता है, किया कुछ। पीठ पर वार वही करते हैं, जो सबसे करीब होते हैं। राजनीतिज्ञ अपने अलावा किसी और पर भरोसा नहीं करता और कभी अपने हितों के लिए किसी अपने की बलि लेने को तैयार रहता है। संकट आने के पहले ही वह भांप लेता है कि हवा किस तरफ बह रही है और समय से पहले हवा के रुख को दूसरों की तरफ मोड़ने की कोशिश करता है। राजीव यह सब नहीं कर पाए, अब मनमोहन भी नहीं कर पा रहे हैं। राजीव को पॉलिटिकल होना था, वह नहीं हो पाए, इसलिए एक के बाद एक गलतियां करते गए। मजबूरी यह थी कि उन्हें दोनों भूमिका निभानी थी। एक प्रधानमंत्री की और दूसरी पार्टी अध्यक्ष की।</p>
<p>मनमोहन सिंह की यह मजबूरी नहीं है। वह प्रधानमंत्री हैं और सोनिया राजनीति के फैसले करती हैं। पहले पांच साल तो सब कुछ ठीक चला, क्योंकि इस दौरान राजनीतिक चुनौतियां काफी कम थीं, सिवाय न्यूक्लियर डील के। उसमें वो साफ बच निकले, क्योंकि उनका सामना एक ऐसे आदमी से था, जो खुद राजनीति का पक्का घुटा हुआ खिलाड़ी नहीं था। प्रकाश करात उनकी तरह ही पढ़ाकू ज्यादा हैं। मनमोहन को किसी ने नहीं बताया कि काम के बंटवारे के बावजूद प्रधानमंत्री का पद सिर्फ एक नौकरशाह का पद नहीं होता, वह खालिस पॉलिटिकल कुर्सी भी है। नीतिगत और प्रशासनिक फैसले लेने के पहले उन्हें राजनीति के तराजू पर भी तोलना पड़ता है। संकट आने से पहले उसे भांपना होता है।</p>
<p>मनमोहन सिंह को कॉमनवेल्थ घोटाले की भनक मिलने के पहले कदम उठाने थे, 2-जी स्पेक्ट्रम पर राजा और डीएमके की मनमानी के फलितार्थ को समय से पहले समझना था। दोनों ही मामलों में उनकी लेट-लतीफी उनके जी का जंजाल बनी। लोगों ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री को नहीं पता था कि कॉमनवेल्थ गेम्स में क्या हो रहा है? 2-जी स्पेक्ट्रम पर लोगों ने देखा कि कैसे एक क्षेत्रीय पार्टी का मंत्री प्रधानमंत्री समेत पूरी सरकार की खिल्ली उड़ाता रहा और सब कुछ जानते हुए मनमोहन सिंह मौन रहे।</p>
<p>लोग कहने लगे कि यह कैसे प्रधानमंत्री हैं, जो एक मंत्री को नहीं संभाल पाए। घुटे विपक्षी नेताओं को उन्होंने वह मौका दे दिया, जो एक राजनेता शायद कभी नहीं देता। उनकी यही कमजोरी महंगाई पर भी साफ दिख रही है। वह उसे आर्थिक समस्या मानते रहे, जबकि यह मसला राजनीतिक अधिक है। उनको किसी ने बताया नहीं कि प्याज पर दिल्ली की सुषमा स्वराज की सरकार जा चुकी है।</p>
<p>ऐसे में कौशिक बसु के बयान से पहले महंगाई का पॉलिटिकल मैनेजमेंट होना चाहिए था। इसकी जगह उन्होंने अपने ही कैबिनेट मंत्रियों को खुलेआम बयानबाजी का मौका दिया। चिदंबरम की जुबान कुछ कहती है, प्रणब मुखर्जी की कुछ और। राज्य सरकारें उनके कहे पर अमल नहीं करतीं। महंगाई काबू में आए तो आए कैसे? शांति के समय सादगी तो उनकी ताकत हो सकती है, लेकिन संकट में यही सादगी कमजोरी बन गई है।</p>
<p>प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से अगर उसके मंत्री, सहयोगी और विपक्षी डरे नहीं, तो शासन चलता नहीं। राजनीति और प्रशासन में आधा काम तो खौफ से होता है, बाकी के लिए चालाक बनना पड़ता है। कांग्रेस और उसकी सरकार इस वक्त संकट में है। उसे आज फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है। वक्त उनके पास कम है, क्योंकि दिल्ली के गलियारों में इन दिनों कई ब्रूटस दिखाई देने लगे हैं। सीजर की कुर्सी पर कई लोगों की नजर है, जो नहीं चाहते कि महंगाई डायन मरे और घोटालों पर लगाम लगे। </p>
<blockquote><p>लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं और यह लेख हिंदुस्तान से साभार यहां छापा जा रहा है।</p></blockquote>
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		<title>ये नेता महिलाओं को इस्तेमाल की चीज क्यों मानते हैं?</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Jan 2011 01:41:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
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		<description><![CDATA[बिहार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna.jpg" alt="" title="Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna" width="200" height="200" class="alignright size-full wp-image-21451" /></a>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">बि</span>हार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार की शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया था। उस महिला का नाम रूपम पाठक है और उसने इस अत्याचार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी थी लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। उस पर दबाव डाल कर केस को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया गया। लगता है कि कहीं से भी न्याय की उम्मीद से निराश होने के बाद उसने यह कदम उठाया।</p>
<p><strong>हत्या एक</strong> जघन्य अपराध है और उसकी निंदा की जानी चाहिए। हत्या जैसा जघन्य अपराध करने वाले को भारतीय दंड संहिता के आधार पर दंड दिया जाना चाहिए। ताजा खबर यह है कि अदालत ने रूपम पाठक को चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पत्रकारों से बता दिया है कि मामले के सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है और जुडीशियल जांच की भी कोई जरूरत नहीं है। राज्य की पुलिस पूरी तरह से सक्षम है और वह जांच का काम पूरा कर लेगी। उनके इस बयान के बाद राज्य की पुलिस ने पूरी तत्परता से काम शुरू भी कर दिया है। हर उस आदमी की धर पकड़ शुरू हो गयी है, जो रूपम पाठक के साथ जरा सी भी सहानुभूति रखता है। एक मुकामी अंग्रेजी साप्ताहिक अखबार के संपादक को पकड़ लिया गया है। नवलेश पाठक नाम के इन पत्रकार ने ही कई महीने पहले रूपम पाठक के यौन शोषण की बात को सार्वजनिक कर दिया था। पुलिस का कहना है कि विधायक की हत्या साजिशन की गयी है और यह पत्रकार उस साजिश का हिस्सा है।</p>
<p><strong>इसके पहले कि</strong> विधायक की हत्‍या और उससे जुड़ी दीगर सामाजिक समस्याओं पर नजर डाली जाए, मृतक विधायक के बारे में भी कुछ जानकारी ले लेना जरूरी है। बीजेपी के इस विधायक का नाम राज किशोर केसरी है। अभी संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में यह विधायक जी पूर्णिया जिले से बीजेपी के टिकट पर जीत कर आये थे। चुनाव के समय उन्होंने एक हलफनामा दाखिल करके स्वीकार किया था कि उनके ऊपर आईपीसी की कई आपराधिक धाराओं में मुकदमा चल रहा है। उन्होंने अपने शपथ पत्र में लिखा है कि वे आईपीसी की दफा 147, 148, 149, 323, 332, 341, 353,307,379, 426, 427, 504 में अभियुक्त हैं। आम बोलचाल की भाषा में इन दफाओं का मतलब भी स्वर्गीय विधायक जी ने अपने शपथ पत्र में साफ साफ लिखा है। यह मुकदमे कत्ल की कोशिश, चोरी, अपहरण जैसे संगीन मामलों में दर्ज किये गये हैं। यह मुकदमे किसी विपक्षी पार्टी की सरकार के दौरान नहीं दर्ज किये गये। यह सारे अपराध नीतीश कुमार की पिछली सरकार के दौरान किये गये और अपनी सरकार होने के बावजूद यह राजकुमार केसरी आपराधिक मुकदमों से बच नहीं सके।</p>
<p><strong>लुब्बोलुआब यह है</strong> कि राजकुमार केसरी कोई मामूली आदमी नहीं थे। इलाका उनसे थर्राता था। शायद इसी वजह से रूपम पाठक के ससुर ने ऐलानिया कह दिया कि स्वर्गीय विधायक जी तो बहुत अच्छे आदमी थे, उनकी बहू ने ही गड़बड़ किया था। इस प्रकार से मामला दफन होने की राह पर निकल पड़ा था लेकिन रूपम पाठक की मां, कुमुद मिश्र ने अपनी बेटी की इज्जत को दागदार होने से बचाने का फैसला किया और बिहार के राज्य महिला आयोग में अर्जी लगा दी कि राजकुमार केसरी और उसका चमचा बिपिन राय उनकी बेटी को हमेशा परेशान करते रहते थे। उन्होंने अपनी दरखास्त में लिखा है कि केसरी एक बदमाश आदमी था और सारा पूर्णिया जिला उसके गुनाहों को जानता था और बहुत सारे लोगों को मालूम है कि उसने आतंक का राज कायम कर रखा था। रूपम की मां ने मांग की है कि मामले की सीबीआई जांच करवायी जाए क्योंकि बिहार पुलिस तो गवाहों को डरा-धमका कर फर्जी मामले में रूपम पाठक को फंसा देगी। रूपम पाठक की मां की तरफ से हिम्मत करके आगे आने के बाद तो एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने भी अपने कर्तव्य की पहचान की और उनको टेलीविजन न्यूज का समय दिया। रूपम की मां ने देश को बताया कि राजकुमार केसरी के लोग उनको धमका रहे हैं, बिपिन राय इस गिरोह की अगुवाई कर रहा है। रूपम के बेटों के अपहरण की धमकी दी जा रही है। कुमुद मिश्र ने बताया कि रूपम के पति जो इंफाल में रहते हैं, उनकी जान को भी खतरा है और बिहार पुलिस से न्याय की उम्मीद बिलकुल नहीं है।</p>
<p><strong>जरूरत</strong> इस बात की है कि राजनीतिक नेताओं के महिलाओं के शोषण के प्रति रुख की भी बाकायदा जांच की जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसे सैकड़ों विधायक हैं, जिनके ऊपर महिलाओं के शोषण के आरोप लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में अभी भी सत्ताधारी दल का एक विधायक एक लड़की के अपहरण और शारीरिक शोषण के मामले में पार्टी से निलंबित चल रहा है। उत्तर प्रदेश में कई मंत्रियों के खिलाफ भी इस तरह के मामले चल रहे हैं। मुलायम सिंह की सरकार में मंत्री रहे एक नेता ने एक कवयित्री की हत्‍या करवा दी थी और आजकल जेल में है। इन बातों की जांच की जानी चाहिए कि नेता बिरादारी अपनी सारी बहादुरी महिलाओं को अपमानित करने में ही क्यों दिखाती है। इन अपराधी लोगों को दंडित किया जाना चाहिए और उनका सार्वजनिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति पैदा की जानी चाहिए कि नेताओं की हिम्मत ही न पड़े कि वे किसी लड़की का यौन शोषण करने के बारे में सोच भी सकें। रूपम पाठक के मामले में भी मीडिया को उसी तरह से सामने आना चाहिए, जिस तरह से अन्य कई मामलों में वह आता रहा है।</p>
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		<title>बम का जवाब बम से देने के लिए विस्फोट : असीमानंद</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Jan 2011 18:28:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के गिरफ्तार नेता स्वामी असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के समक्ष कबूला है कि वह और हिंदू कार्यकर्ता मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर और मक्का मस्जिद विस्फोटों में शामिल थे। साप्ताहिक पत्रिका तहलका ने दावा किया है कि उसके पास असीमानंद द्वारा हस्ताक्षरित 42 पन्नों वाले कबूलनामे की प्रति है। पत्रिका के मुताबिक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/asimanand.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/asimanand-300x132.jpg" alt="" title="asimanand" width="300" height="132" class="alignright size-medium wp-image-21449" /></a><strong>राष्ट्रीय </strong>स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के गिरफ्तार नेता स्वामी असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के समक्ष कबूला है कि वह और हिंदू कार्यकर्ता मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, अजमेर और मक्का मस्जिद विस्फोटों में शामिल थे।</p>
<p><strong>साप्ताहिक </strong>पत्रिका तहलका ने दावा किया है कि उसके पास असीमानंद द्वारा हस्ताक्षरित 42 पन्नों वाले कबूलनामे की प्रति है। पत्रिका के मुताबिक न्यायालय के समक्ष असीमानंद द्वारा जुर्म कबूलने से &#8216;हिंदुत्व आतंकी नेटवर्क के आंतरिक कारगुजारियों&#8217; का खुलासा हो गया।</p>
<p><strong>असीमानंद </strong>का यह बयान गत 18 दिसम्बर को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत दर्ज किया। मुस्लिमों को निशाना बनाकर किए गए विस्फोटों की जांच में जुटीं जांच एजेंसियां असीमानंद के इस बयान को बतौर साक्ष्य पेश कर सकती हैं।</p>
<p><strong>पत्रिका </strong>के मुताबिक असीमानंद ने मजिस्ट्रेट को बताया कि बम विस्फोटों को अंजाम दने में दक्षिणपंथी हिंदू संगठन अभिनव भारत अकेला समूह नहीं है, बल्कि आरएसएस के राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य इंद्रेश कुमार सहित अन्य प्रचारक भी विस्फोटों के लिए जिम्मेदार हैं।</p>
<p><strong>गौरतलब </strong>है कि फरवरी, 2007 में समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फोट में 68 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें अधिकांश पाकिस्तान के निवासी थे। असीमानंद ने कथित रूप से कहा, मैंने सभी से कहा है कि बम का जवाब बम से देना चाहिए और हिंदू चुप बैठे हैं जो ठीक नहीं है।’</p>
<p><strong>असीमानंद </strong>ने सीबीआई से कहा, ‘2005 में इंद्रेश आरएसएस के एक समारोह में हिस्‍सा लेने के बाद साबरी धाम आए। उनके साथ आरएसएस के कई बड़े नेता भी थे। सुनील जोशी भी साथ थे। इंद्रेश जी ने हमें सबसे मिलाया। उन्‍होंने कहा कि बम बनाना हमारा काम नहीं है। मुझे आरएसएस की ओर से आदिवासियों के साथ काम करने के निर्देश दिए गए हैं। सुनील जोशी को बम धमाके का काम सौंपा गया था। उन्‍होंने कहा कि सुनील को जिस चीज की जरूरत होगी, हम उन्‍हें देंगे।’ </p>
<p><strong>असीमानंद </strong>ने कहा, ‘मुझे यह भी पता चला कि सुनील जोशी और भरतभाई इंद्रेशजी से नागपुर में मिले थे और इंद्रेशजी ने भरतभाई की मौजूदगी में सुनील को 50 हजार रुपये दिए। कर्नल पुरोहित ने मुझसे एक बार कहा था कि इंद्रेशजी पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट हैं और उनके पास यह साबित करने के लिए जरूरी दस्‍तावेज भी हैं। लेकिन उन्‍होंने कभी मुझे वो दस्‍तावेज नहीं दिखाए।’ </p>
<p><strong>असीमानंद </strong>के इस ‘कबूलनामे’ पर इंद्रेश कुमार ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है। उन्‍होंने कहा कि असीमानंद द्वारा सीबीआई के सामने बम धमाकों में हाथ होने की बात स्‍वीकार करने की मीडिया रिपोर्ट मनगढ़ंत हैं। इंद्रेश ने कहा, ‘अजमेर धमाका हो या समझौता एक्‍सप्रेस धमाका, शुरू में जांच एजेंसियों ने इन मामलों में पकिस्‍तान का हाथ बताया था लेकिन अब सरकार क्‍यों इससे मुकर रही है।’ </p>
<p><strong>असीमानंद </strong>को राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पंचकुला से हिरासत में लिया था।  एनआईए भी समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामले के एक गवाह भरत भाई की गवाही सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज कर रही है। भरत भाई अजमेर विस्फोट कांड में भी महत्वपूर्ण गवाह है। </p>
<p><strong>ज्ञात</strong> हो कि अजमेर विस्फोट के मुख्य साजिशकर्ता जोशी की हत्या वर्ष 2007 में मध्य प्रदेश में कर दी गई।</p>
<p><strong>राजस्थान </strong>पुलिस के मुताबिक इस बात की आशंका है कि आतंकवादी कार्रवाई को छुपाने के लिए जोशी की हत्या उनके अपने ही लोगों ने की।</p>
<p><strong>पिछले </strong>वर्ष गिरफ्तार असीमानंद ने इंद्रेश पर आतंकवादी गतिविधियों के लिए जोशी को धन देने और बम लगाने के लिए आदमी उपलब्ध कराने का आरोप लगाया।</p>
<p><strong>असीमानंद </strong>ने आतंकी साजिश रचने में अपनी भूमिका स्वीकार किया है। उसने यह भी स्वीकार किया है कि मालेगांव, हैदराबाद और अजमेर शरीफ में विस्फोट करने के लिए उसने कैसे आरएसएस के प्रचारकों को उकसाया।</p>
<p><strong>उसने</strong> बताया कि हिंदू आतंकी गतिविधियां &#8221;वर्ष 2002 में हिंदू मंदिरों पर शुरू हुए मुस्लिम आतंकवादियों के हमलों&#8221; की प्रतिक्रिया में थीं।</p>
<p><strong>स्वामी </strong>असीमानंद द्वारा फरवरी 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस बम धमाके मामले में शामिल होने की बात कबूल करने की खबर आने के बाद संघ में उबाल आ गया है। आरएसएस ने इसे हिंदू संगठनों के खिलाफ साजिश बताया है। संघ के प्रवक्ता राम माधव ने कहा कि केंद्र सरकार लंबे समय से हिंदू संगठनों के पदाधिकारियों को जबरन अपराधिक मामलों में फंसा रही है।</p>
<p>एजेंसियां</p>
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		<title>&#8220;आखिर क्यों हर हिंदू आतंकवादी का रिश्ता आरएसएस से है&#8221;</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Jan 2011 05:07:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[दिसंबर में हुई कांग्रेस की सालाना बैठक में जब से तय हुआ कि आरएसएस के उस रूप को उजागर किया जाए जिसमें वह आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक के रूप में पहचाना जाता है, तब से ही संघ के अधीन काम करने वाले संगठनों और नेताओं में परेशानी का आलम है। जब से आरएसएस के ऊपर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/gujarat-new1.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/gujarat-new1.jpg" alt="" title="gujarat new" width="400" height="619" class="alignright size-full wp-image-21413" /></a>दिसंबर में हुई कांग्रेस की सालाना बैठक में जब से तय हुआ कि आरएसएस के उस रूप को उजागर किया जाए जिसमें वह आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक के रूप में पहचाना जाता है, तब से ही  संघ के अधीन काम करने वाले संगठनों और नेताओं में परेशानी का आलम है। जब से आरएसएस के ऊपर आतंकवादी जमातों के शुभचिंतक होने का ठप्पा लगा है वहां अजीबोगरीब हलचल है। संघ ने अपने लोगों को दो भाग में बांट दिया है। एक वर्ग तो इस बात में जुट गया है कि वह संघ को बहुत पाकसाफ संगठन के रूप में प्रस्तुत करे जबकि दूसरे वर्ग को यह ड्यूटी दी गयी है कि वह संघ को सभी हिन्दुओं का संगठन बनाने की कोशिश करे। आरएसएस के पे रोल पर  कुछ ऐसे लोग हैं जो पत्रकार के रूप में अभिनय करते हैं। ऐसे लोगों की ड्यूटी लगा दी गयी है कि वे हर उस व्यक्ति को हिन्दू विरोधी साबित करने में जुट जाएं जो आरएसएस या उससे जुड़े किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहता हो। <span id="more-21412"></span></p>
<p>लगता है कि कांग्रेस ने आरएसएस की पोल खोलने की योजना की कमान दिग्विजय सिंह को थमा दी है। दिग्विजय सिंह ने भी पूरी शिद्दत से काम को अंजाम देना शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े अखबार में उन्होंने एक इंटरव्यू देकर साफ़ किया कि वे हिन्दू आतंकवाद की बात नहीं कर रहे हैं, वे तो संघी आतंकवाद का विरोध कर रहे हैं। यह अलग बात है कि आरएसएस वाले उनका विरोध यह कह कर करते पाए जा रहे हैं कि दिग्विजय सिंह हिन्दुओं के खिलाफ हैं। लेकिन इस मुहिम में आरएसएस  को कोई सफलता नहीं मिल रही है। दुनिया जानती है कि आरएसएस  ने अपना तामझाम मीडिया में मौजूद अपने मित्रों का इस्तेमाल करके बनाया है। लगता है कि दिग्विजय सिंह भी मीडिया का इस्तेमाल करके आरएसएस  के ताश के महल को ज़मींदोज़ करने का मन बना चुके हैं। उनके इंटरव्यू को आधार बनाकर जो खबर अखबारों में छापी गयी उसमें संघी आतंकवाद को हिन्दू आतंकवाद लिखकर बात को आरएसएस  के मन मुताबिक बनाने की कोशिश की गयी। </p>
<p>बीजेपी के कुछ नेताओं ने दिग्विजय के हिन्दू विरोधी होने पर बयान भी देना शुरू कर दिया। लेकिन लगता है कि दिग्विजय ने भी खेल को भांप लिया और देश की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी, पी टी आई के मार्फत अपनी बात को पूरे देश के अखबारों में पंहुचा दिया। ज़्यादातर अखबारों में  छपा है कि दिग्विजय सिंह ने इस बात का खंडन किया है कि कि वे हिन्दू धर्म के खिलाफ हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित अखबार, द हिन्दू में  पी टी आई के हवाले से जो बयान छपा है वह आरएसएस के खेल में बहुत बड़ा रोड़ा साबित होने की क्षमता रखता है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि उन्होंने कभी भी आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा। उनका दावा है कि आतंकवाद बहुत गलत चीज़ है। वह चाहे जिस  धर्म के लोगों की तरफ से किया जाए। उन्होंने कहा कि हर हिन्दू आतंकवादी नहीं होता लेकिन पिछले दिनों जो भी हिन्दू आतंकवादी घटनाओं  में शामिल पाए गए हैं, वे सभी आरएसएस या उस से संबद्ध संगठनों के सदस्य हैं। यानी वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिन्दू नहीं आरएसएस वाला आदमी आतंकवादी होता है। उन्होंने बीजेपी और आरएसएस से अपील भी की है कि वे आत्मनिरीक्षण करें और इस बात का पता लगाएं कि हर आदमी जो भी आतंकवादी घटनाओं में पकड़ा जा  रहा है, उसका सम्बन्ध आरएसएस से ही क्यों होता है। उन्होंने कहा कि वे हिन्दू धर्म का विरोध कभी नहीं करेगें क्योंकि वे खुद हिन्दू धर्म का बहुत सम्मान करते हैं। उनके माता पिता हिन्दू हैं और उनके सभी बच्चे हिन्दू हैं। लेकिन वे सभी आरएसएस  के घोर विरोधी हैं। </p>
<p>ज़ाहिर है दिग्विजय सिंह एक ऐसे अभियान पर काम कर रहे हैं जिसमें यह सिद्ध कर दिया जाएगा कि आरएसएस एक राजनीतिक जमात है और उसका विराट हिन्दू समाज से कुछ लेना देना नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को गंभीर चुनौती मिल रही है। भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेल कर सत्ता तक पंहुचने वाली बी जे पी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बी जे पी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिलकुल नहीं स्वीकार करते। आरएसएस को भगवा या हिंदू धर्म का पर्यायवाची भी नहीं बनने दिया जाएगा। दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से भी कहा है कि भगवा रंग बहुत ही पवित्र रंग है और उसे किसी के पार्टी की संपत्ति मानने की बात का मैं विरोध करता हूं। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था के बल पर मैं राजनीतिक फसल काटने के पक्ष में नहीं हूं और न ही किसी पार्टी को यह अवसर देना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म पर हर हिन्दू का बराबर का अधिकार है और उसके नाम पर आरएसएस और बी जे पी वालों को राजनीति नहीं करने दी जायेगी।  और अगर कांग्रेस अपनी इस योजना में सफल हो गयी तो और बी जे पी की उस कोशिश को जिसके तहत वह हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अपने को स्लाट कर रही थी,  नाकाम कर दिया तो इस देश की राजनीति का बहुत भला होगा।</p>
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		<title>भ्रष्टाचार को समर्पित साल और राजनीति की उतरती आबरू</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Jan 2011 09:14:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़झाले से गुज़र रही है। कांग्रेस की ढिलाई और हालात पर पकड़ के कमजोर होने की वजह से अगर आज चुनाव हो जाएं तो यूपीए सरकार की हार लगभग पक्की मानी जा रही है। यह बात बहुत सारे कांग्रेसियों को भी पता है। बीजेपी वालों को यह बात सबसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/raja-kalmadi.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/raja-kalmadi-300x165.jpg" alt="" title="raja-kalmadi" width="300" height="165" class="alignright size-medium wp-image-21400" /></a>देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़झाले से गुज़र रही है। कांग्रेस की ढिलाई और हालात पर पकड़ के कमजोर होने की वजह से अगर आज चुनाव हो जाएं तो यूपीए सरकार की हार लगभग पक्की मानी जा रही है। यह बात बहुत सारे कांग्रेसियों को भी पता है। बीजेपी वालों को यह बात सबसे ज्यादा मालूम है। शायद इसी वजह से जेपीसी के नाम पर वे सरकार को घेरे में लेना चाहते हैं। वैसे इस बात में दो राय नहीं है कि 2010  में अपने देश में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़े गए हैं। भ्रष्टाचार और घूस की रकम को इनकम मानने का रिवाज तो बहुत पहले शुरू हो चुका है, लेकिन घूसखोर थोड़ा संभलकर रहता था। भले आदमियों की नजर बचाकर रहता था। लेकिन जब से संजय गांधी ने अपराधियों को राजनीति में इज्जत देना शुरू किया, घूस को गाली मानने वालों की संख्या में भारी कमी आई थी। लेकिन भ्रष्टाचार को सम्मान का दर्जा कभी नहीं मिला। <span id="more-21399"></span></p>
<p>पिछले बीस साल में जब से केंद्र में गठबंधन सरकार की परंपरा शुरू हुई है, भ्रष्टाचार और घूस को इज्जत हासिल होने लगी है। घूसखोर आदमी अपने आप को सम्मान का हकदार मानने लगा है। राजनीति में शामिल लोगों की आमदनी कई गुना बढ़ गयी है और भ्रष्ट होना अपमानजनक नहीं रह गया है। जब तक बीजेपी वाले विपक्ष में थे,  माना जाता था कि यह ईमानदार लोगों की जमात है। लेकिन कई राज्यों में और केंद्र में 6 साल तक सरकार में रह चुकी  बीजेपी भी अब बाकायदा भ्रष्ट मानी जाने लगी है। बीजेपी में फैले भ्रष्टाचार को उनके बड़े नेता कांग्रेसीकरण कहते हैं और उपदेश देते हैं कि पार्टी को कांग्रेसीकरण की बीमारी से बचाएं। यह अलग बात है कि बीजेपी को भ्रष्टाचार की आदत से बचा पाने की हैसियत अब किसी की नहीं है। वह अब विधिवत भ्रष्ट हो चुकी है और वह जब भी सत्ता में होगी भ्रष्टाचार में लिप्त पायी जायेगी। लेकिन भ्रष्टाचार की इस भूलभुलैया में भी सन 2010 का मुकाम बहुत ऊंचा है। </p>
<p>इस  साल देश में आर्थिक भ्रष्टाचार के सारे पुराने रिकार्ड टूट गए हैं। कामनवेल्थ खेलों में सुरेश कलमाड़ी के नेतृत्व में जमकर लूट मची। शुरू में बीजेपी ने जांच के लिए बहुत जोर भी मारा लेकिन जब जांच के शुरुआती दौर में ही बीजेपी के कुछ नेताओं का गला फंसने लगा तो मामला ढीला पड़ गया। अब तो  लगता है कि कांग्रेस ही कामनवेल्थ के घूस को उघाड़ने में ज्यादा रूचि ले रही है। ऐसा शायद इसलिए कि उनका तो केवल एक मोहरा, सुरेश कलमाड़ी मारा जाएगा जबकि बीजेपी के कई बड़े नेता कॉमनवेल्थ घूस कांड की जद में आ जाएंगे। सुरेश कलमाड़ी को राजनीतिक रूप से खत्म करके देश के सत्ताधारी वंश का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले की जांच में अब बीजेपी और कांग्रेस के शामिल होने की जांच का काम शुरू हो गया है। ज़ाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही इस जांच से जो भी दोषी होगा, दुनिया के सामने आ जाएगा। शायद इसलिए मध्यवाधि चुनाव को लक्ष्य बनाकर बीजेपी वाले जेपीसी जांच की बात को आगे बढ़ा रहे हैं।</p>
<p>बीजेपी के नेताओं को उम्मीद है कि जेपीसी जांच के दौरान मीडिया में अपने लोगों की मदद से कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाया जा सकेगा। और उसका असर सीधे चुनाव प्रचार पर पड़ेगा। कुल मिलाकर हालात ऐसे बन रहे हैं कि देश की सत्ता की राजनीति रसातल की तरफ बढ़ रही है। दोनों ही मुख्य पार्टियां बुरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं। </p>
<p>कांग्रेस पार्टी की राजनीति में सारी ताकत राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में झोंकी जा रही है। महात्मा गांधी और सरदार पटेल की कांग्रेस के परखचे उड़ रहे हैं। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत पता नहीं कहां दफन हो गए हैं। आलाकमान  कल्चर हावी है और सुप्रीम नेता से असहमत होने का रिवाज ही खत्म हो गया है। राजनीतिक जागरूकता के बुनियादी ढांचे में कहीं कुछ भी निवेश नहीं हो रहा है। ठोस बातों की कहीं भी कोई बात नहीं हो रही है। पार्टी के बड़े नेता चापलूसी के सारे रिकार्ड तोड़ रहे हैं और आजादी के बुनियादी सिद्धातों की कोई परवाह न करते हुए अमरीकी पूंजीवाद के कारिंदे के रूप में देश की छवि बन रही है। </p>
<p>बीजेपी में भी हालात बहुत खराब हैं। कई गुटों में बंटी हुई पार्टी में किसी तरह का अनुशासन नहीं है। नागपुर के बल पर पार्टी  अध्यक्ष बने एक मामूली नेता को कोई भी इज्जत देने को तैयार नहीं है। वह नेता भी अपने अधिकार को बढाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू देकर पार्टी अध्यक्ष ने अपनी ताकत को दिखाने की कोशिश की है। साफ कह दिया है कि लाल कृष्ण आडवाणी अब उनकी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं रहेंगे। भला बताइये, 2009 के लोकसभा चुनावों में पूरे देश में भावी प्रधानमंत्री का अभिनय करते हुए व्यक्ति को एक इंटरव्यू देकर खारिज  कर देना कहां का राजनीतिक इंसाफ है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि अपने आपको  प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से दूर रख कर अध्यक्ष ने आडवाणी गुट के की कई  नेताओं का नाम आगे कर दिया है। जाहिर है उनके दिमाग में भी आडवाणी गुट में फूट डालकर उनकी ताकत को कमजोर करने की रणनीति काम कर रही है। ऐसी हालात में देश की राजनीति में तिकड़मबाजों और जुगाड़बाजों का बोलबाला चारों तरफ बढ़ चुका है। अब तक बीजेपी वाले नीरा राडिया के हवाले से कांग्रेस को खींचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अब लगता है कि नीरा राडिया के बीजेपी के बड़े नेताओं से ज्यादा करीबी संबंध रह चुके हैं। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि अब कोई चमत्कार ही देश की राजनीति की आबरू बचा सकता है।</p>
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		<title>बहुत हुआ, अब भोजपुरी सिनेमा को बदलना ही होगा!</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Jan 2011 04:54:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नितिन चंद्र</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>अगर आप</strong> बिहार के रहने वाले हैं, या भोजपुरी भाषी हैं और देश के किसी भी कोने में आप इंजीनियर, डाक्टर, वकील, बैंक अफसर, नौकरशाह, मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, छात्र, घूसखोर किरानी, कालाबाजारू कारोबारी, समाज सेवक, दिल्लीवाला बनने के लिए आतुर हैं, अपने आपको बिहारी कहने से शर्माती हुई लड़की या घुट-घुट के जीने वाले कोई भी व्यक्ति हैं, तो मैं ये बता दूं की ये भोजपुरी फिल्‍में आप ही की कहानी बता रही हैं, और आप हैं कि कहते है की हम देखते नहीं, वो तो बहुत गंदी होती हैं। गंदी तो होती हैं, लेकिन क्यों? क्या इसका आप पर कोई असर होता है?]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>हम इन दिनों भोजपुरी सिनेमा की दुनिया खंगालने की कोशिश कर रहे हैं। <a href="http://www.janatantra.com/news/2010/12/31/history-of-bhojpuri-cinema-part-one/" target="_blank">आलोक रंजन ने <strong>पहली फिल्‍म की कहानी</strong> बतायी</a>, नितिन आने वाले वक्‍त की तस्‍वीर साफ कर रहे हैं। वे खुद फिल्‍मकार हैं और भोजपुरी सिनेमा की नयी भाषा को लेकर सजग हैं। उन्‍हें दुख है कि भोजपुरी सिनेमा का मौजूदा परिदृश्‍य भोजपुरी समाज की मिट्टी खराब कर रहा है। उनका गुस्‍सा रचनात्‍मक है और हम उनकी इस बेचैनी में खुद को शामिल करते हैं : <strong>मॉडरेटर</strong></em></p></blockquote>
<p style="text-align: center;"><strong>भोजपुरी सिनेमा बनाने वालों द्वारा भोजपुरी भाषा और संस्‍कृति का बाजारीकरण</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong><em>(सिर्फ वयस्‍कों के लिए)</em></strong></p>
<p style="text-align: center;"><span style="font-size: large;"><span style="color: #ff0000;">Disclaimer</span></span></p>
<p><span style="color: #aa0000;"><strong>ये लेख सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो सिनेमा को एक कला की तरह भी देखते हैं और भोजपुरी सिनेमा में पसरी हुई गंदगी के प्रति चिंतित हैं, या नहीं चिंतित हैं…</strong></span></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-21390" title="Deswa-Poster" src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Poster-234x300.jpg" alt="" width="234" height="300" /></a></p>
<p><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times, serif, Georgia;">क</span>ई बार जब आप पटना के गांधी मैदान, बांस घाट, रेलवे स्टेशन या मुंबई के अंधेरी, दादर, बांद्रा या दिल्ली के लाजपत नगर, कनाट सर्कल की तरफ से गुजरेंगे तो आपको बड़े भद्दे से, भड़कीले रंगों में, अजीब से चहरों और नामों वाली फिल्‍मों के पोस्टर दिखेंगे। ये हैं भोजपुरी, आपकी भाषा की फिल्मों के पोस्टर्स। शायद आपका आभिजात्य आग्रह, शिक्षा और पारिवारिक पृष्‍ठभूमि ऐसे पोस्टर्स की तरफ आपका ध्‍यान जाने से रोके लेकिन उन पोस्‍टर्स में प्रचारित कहानी बिहार और पूर्वांचल में रहने वाले हर अमीर, गरीब, नेता, अभिनेता, कलाकार, बैंक क्‍लर्क, स्‍कूल शिक्षक, गांव की लड़की, सुमो और मारुति गाड़ी में घूमने वाले ऊंची सोसाइटी के लोग… भोजपुरिया और बिहारी पहचान से ताल्‍लुक रखते हैं। शायद आप अपनी भाषा और पहचान से मुकर जाएं और मुंह बिचका के निकल जाएं, ठीक वैसे ही जैसे कचरे की गंध को सूंघ कर हम नाक बंद करके चल देते हैं, लेकिन वही कचरा जब संक्रमण का रूप लेता है, तब हम जागते हैं या हमेशा के लिए सो जाते हैं। बड़ी अजीब बात है कि इस कचरे के फैलने में आपका भी हाथ है, माने या न मानें। अगली बार जब आप इन भोजपुरी फिल्‍मों के पोस्टर्स को देखें तो थोड़ा बेशर्म होकर गाड़ी, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि को रोक लें (अगर आपके साथ कोई नाबालिग लड़का या लड़की हो तो ऐसा न करें) और एक नजर भर के देखें। आप सामान्यतः तीन चीजें देखेंगे…</p>
<p><strong>1.</strong> एक अधनंगी लड़की, जिसने पता नहीं किस मजबूरी में अपने विदलन (स्तनों के बीच का भाग) दिखाये होंगे</p>
<p><strong>2.</strong> खून से लथपथ हीरो और विलेन (सोचिए, फोटो खिंचवाते समय कितना खून पी जाते होंगे) और नकली बंदूक या चाक़ू… और हां बहुत सारे दूसरे लोग भी दिखेंगे… उन पर ज्यादा ध्यान न भी दें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये जो उच्चतम दर्जे की भोजपुरी फिल्‍में हैं, वो अस्सी के दशक की “सी ग्रेड” हिंदी फिल्‍मों जैसी हैं। हालांकि वो फिल्‍में भी तकनीकी स्तर पर आज की भोजपुरी फिल्‍मों से आगे थीं।</p>
<p><strong>इन फिल्‍मों के</strong> नाम पर भी हम आएंगे। भोजपुरी सिनेमा का तिबारा जन्म (दो बार वह मर चुकी थी) हुआ, “ससुरा बड़ा पैसा वाला” नामक एक फिल्म से और उसके बाद भोजपुरी फिल्‍मों एक नया दौर शुरू हुआ। इसमें अमिताभ बच्चन के सचिव से लेकर, बिहार के कुछ नेता, दिल्ली के नौकरशाह से लेकर, Ex – Spotboy या देश के किसी भी कोने या भाषा-भाषी का इंसान हो, उसने इस धंधे में पैसा लगाया और कमाया। आज सबको पता है कि किस भाषा की फिल्‍मों को कामुकता का मसाला और अश्लीलता का तड़का लगा दें तो कुछ बेचारे गरीब, अनपढ़ लड़के, रिक्शा, ठेला वाले, स्‍कूल से भागे बच्चे और इस अफीम रूपी सिनेमा के नशे से ग्रसित लोग देखने आ ही जाएंगे। दस-दस रुपये के टिकट खरीद कर फिल्म देखने वाले ये लोग, जो बेचारे तमाम सुविधाओं से वंचित हैं और इतने शिक्षित भी नहीं हैं कि अपना भला बुरा सोच सकें, जानते ही नहीं कि इनके साथ क्या हो रहा है। इनकी सोचने-समझने की शक्ति को इतनी सूक्ष्मता से मारा जा रहा है कि ये जान भी नहीं पाएंगे कि ये असर सिनेमा का है या किसी और चीज का।</p>
<p><strong>कुछ हाल ही में</strong> प्रदर्शित भोजपुरी फिल्‍मों के नाम हैं, “मार देब गोली केहू न बोली”, “जरा देब दुनिया तहरा प्यार में”, “देवरा बड़ा सतावेला”, “लहरीया लुटs ऐ राजाजी”, आदि। “रणभूमि” जैसी सशक्त मुद्दों पर बनी फिल्‍मों में भी बेहद अश्‍लील गाने हैं। हालांकि नाम इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी बड़ी समस्‍या इन फिल्‍मों में दिखायी जाने वाली विषय सामग्री। क्या मैं कुलीन और उच्च वर्ग के बिहारी की तरह बातें कर रहा हूं? नहीं, मैं सिर्फ बिहार का रहने वाला और भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी से प्रेम करने वाला एक साधारण बिहारी हूं, जो भोजपुरी फिल्मों के द्वारा हो रहे भोजपुरिया समाज और बिहार की संरचना और उसकी संस्‍कृति पर हो रहे प्रहार को लेकर चिंतित है।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Image.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-21391" title="Deswa-Image" src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Image.jpg" alt="" width="300" height="693" /></a><strong>आखिर</strong> माजरा क्या है? सब पैसे का खेल है। यही सोच रहे होंगे आप। सही सोच रहे हैं आप।</p>
<p><strong>एक भाषा</strong> सिर्फ भाषा नहीं होती, सिर्फ बात पहुंचाने का साधन नहीं होती है बल्कि एक समाज का अंग, उस सभ्यता की प्रतिनिधि होती है। उसके बोलने वालों की संस्कृति को अपने हर शब्द से बयान करती है। सिनेमा, या किसी भी रूप में जन-संचार, या वो टीवी, रेडियो, अखबार, इंटरनेट हो, अपने में बड़ा ही बलवान होता है। आज के सामाजिक परिवेश में उसका बहुत महत्त्व है और लोग उसे विश्‍वसनीय भी मानते हैं। सिनेमा इनमें से एक बहुत ही सार्थक और सशक्त संचार का माध्यम है। भारतीय समाज पर सिनेमा का असर कितना रहा है, ये तो सभी जानते हैं। भोजपुरी भाषा और इस माध्यम का मिलन हुआ सन 1962 में। बड़े उत्साह से हमारे पूर्वजों ने भोजपुरी सिनेमा की नींव रखी। बड़े-बड़े कलाकार, गायक वगैरह आये और इसका बीज बोया। लेकिन आज क्या हालत है? और इसका जिम्मेदार कौन है?</p>
<p><strong>अगर आप</strong> बिहार के रहने वाले हैं, या भोजपुरी भाषी हैं और देश के किसी भी कोने में आप इंजीनियर, डाक्टर, वकील, बैंक अफसर, नौकरशाह, मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, छात्र, घूसखोर किरानी, कालाबाजारू कारोबारी, समाज सेवक, दिल्लीवाला बनने के लिए आतुर हैं, अपने आपको बिहारी कहने से शर्माती हुई लड़की या घुट-घुट के जीने वाले कोई भी व्यक्ति हैं, तो मैं ये बता दूं की ये भोजपुरी फिल्‍में आप ही की कहानी बता रही हैं, और आप हैं कि कहते है की हम देखते नहीं, वो तो बहुत गंदी होती हैं। गंदी तो होती हैं, लेकिन क्यों? क्या इसका आप पर कोई असर होता है?</p>
<p><strong>मेरे एक</strong> पहचान के व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि कला पहले अपने बेडौल रूप में रहती है, फिर धीरे-धीरे बारीक और सुंदर होती है। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं, लेकिन एक हद तक। सिर्फ ये कह कर कि सब ठीक हो जाएगा और भोजपुरी सिनेमा अभी परिवर्तन के चरण में है, सारी बहस को समाप्त नहीं किया जा सकता। आज का भोजपुरी सिनेमा, बिहार और भोजपुरिया समाज की क्या छवि बना रहा है, ये एक व्यक्तिपरक (subjective) बात हो सकती है लेकिन मैं इसे एक गंभीर समस्या मानता हूं। आज बिहार और पूर्वांचल के हिस्सों में मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका और अवधी भाषाएं बोली जाती हैं लेकिन सिनेमा के माध्यम से भोजपुरी भाषा की फिल्‍में ही छवि बना रही हैं या बिगाड़ रही हैं। आज बिहार भोजपुरी सिनेमा का सबसे बड़ा बाजार है। आज भोजपुरी सिनेमा बेहद प्रतिगामी (regressive) है, और अपने घिसे-पिटे संगीत और गीत से सस्ता और हानिकारक मनोरंजन कर रहा है। और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज की भोजपुरी फिल्मों ने अपने लिए हजारों दर्शक खड़े कर लिये हैं, जो इस नशे से बीमार हैं। क्या मजाल कि आज एक अच्छी सोच का निर्माता/निर्देशक भोजपुरी में एक साफ-सुथरी फिल्म बनाने की सोच सके। हालांकि कुछ फिल्‍मे बनी भी हैं।</p>
<p><strong>कभी आपने</strong> सोचा है के ऐसे फिल्मी पोस्टर्स और टीवी पर ट्रेलर्स को देख रहा एक गैर बिहारी या भोजपुरिया, हमारे समाज के बारे में क्या छवि बनाता होगा?</p>
<p><strong>पूरी दिल्ली</strong>, गुड़गांव और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बिहार के लोगों से पटा पड़ा है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय और तमाम ऑफिसेस, कॉल सेंटर्स, कॉरपोरेट्स आदि जगहों पर बिहार के लोग भरे पड़े हैं। लेकिन क्या ये लोग भोजपुरी फिल्‍में देखते हैं? बिलकुल नहीं। दिल्ली या मुंबई में रह रहे बंगाली तो देखते हैं अपनी भाषा की फिल्‍में। दिल्ली में रहने वाला तमिल आदमी भी देखता है, जब उसकी भाषा की फिल्‍में सिनेमा घरों में लगती हैं। मराठी, कन्नड़, मलयाली, असमिया, उड़‍िया वगैरह सब अपनी भाषा की फिल्‍में देखते हैं, लेकिन बक्सर जिले में रहने वाला एक पढ़ा-लिखा भोजपुरी बोलने वाला इंसान भोजपुरी फिल्‍में नहीं देखता। आश्चर्य है न? क्‍योंकि भोजपुरी भाषा का इस्तेमाल तो अश्लीलता बेचने के लिए किया जा रहा है और अनपढ़-गरीब जनता को और भ्रष्ट बनाया जा रहा है। और उन बनाने वालों से पूछो, तो कहते हैं कि पब्लिक की डिमांड है तो हम बनाते हैं। पब्लिक की “डिमांड” तो बहुत कुछ होगी तो क्या सब करेंगे? नहीं न! आप youtube पर जाइए और एक क्लिक करते ही आपको भोजपुरी के “सुपर हिट” गाने मिलने शुरू हो जाएंगे। कुछ गाने इस प्रकार से हैं, “तनी धीरे धीरे डाला, सील बा… तनी हौले हौले डाला, दुखाता राजाजी…”, “लहंगा उठा देब रिमोट से..”, “सैय्यां लेके बहियां में मारेलन काचा कच कच कच…”, “काहे नाही आये सईयां, रतियां में बोलकर, बईठल रहनी पिछली कोठरिया में खोलकर…” खैर ये एक अंतहीन सूची है।</p>
<p><span style="font-size: large;">आखिर ये कौन लोग है?</span></p>
<p><strong>ज्यादातर</strong> भोजपुरी बोलने वाले लोग हैं। कोई पटना से है, कोई बेतिया, मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, रांची से है। अपने लोग हैं जो अपने जीवन का महत्त्व नहीं समझ रहे हैं, और संस्कृति का सामूहिक रूप से संहार कर रहे हैं। कल्लू नाम का एक 14 वर्षीय बालक, आज भोजपुरी का सबसे प्रसिद्ध गायक है। उसकी उपलब्धि ये है कि उसने भोजपुरी के कुछ सबसे अश्‍लील गाने गाये हैं। उसके परिवार वालों का कहना है कि कल्लू एक निहायत मासूम और अबोध बच्चा है। “लगा दी चोलिया के हुक राजाजी” और “सकेत होता राजाजी” उसकी गायकी के कुछ नायाब नमूने हैं। अधेड़ उम्र के लोग उसके गानों पर नाचते हुए दिख जाएंगे। इस धंधे में ज्यादातर बिहार के ही लोग हैं, जो पैसे के लिए अपनी संस्कृति, अपने लोगों और अपनी आत्मा को बेचते हैं।</p>
<p><strong>आइए जरा</strong> भोजपुरी फिल्मों के इतिहास पर एक नजर डालें। विश्वनाथ शाहबादी ने 1962 में “गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो” से शुरुआत की थी। इस वक्त तक दूसरे क्षेत्रीय भाषा की फिल्‍मों को आये हुए 30-40 साल हो गये थे और भोजपुरी नया था। लेकिन शुरुआत की फिल्‍मों में भिखारी ठाकुर जैसे लोग खुद नजर आये थे। महेंदर मिसिर के गानों का रस था, निर्गुण पर नृत्य होता था और पूरबी और बिरहा की तान थी। बिदेसिया, लोहा सिंह, लागी नाही छूटे रामा, जैसी कुछ बहुत ही सुंदर और सामाजिक फिल्‍में बनीं। लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे जैसे गायक और चित्रगुप्त जी जैसे संगीतकार थे। वो था बीता हुआ कल।</p>
<p><strong>आज तेलुगु</strong>, तमिल, मलयाली, मराठी इत्यादि भाषाओं की फिल्म राष्ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म समारोहों में जा रही है। ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में भारत की लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषा की फिल्‍में जा चुकी हैं। मराठी सिनेमा के अंदर उमेश कुलकर्णी, केदार शिंदे, तेलुगु में शेखर कमुल्ला, तमिल में मणिरत्‍नम, आमिर सुलतान, मलयालम में अदूर गोपालकृष्णन, कन्नड़ में गिरीश कसारावल्ली, बांग्ला में रितुपर्णो घोष, अपर्णा सेन, गौतम घोष इत्यादि लोग हैं, जिन्होंने अपनी भाषा की फिल्मों को राष्‍ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, अपनी संस्‍कृति को और सुसज्जित किया है। मैं किसी भी भोजपुरी निर्देशक का नाम नहीं जानता। भोजपुरी वालों की तरह भोजपुरी रूपी अपनी मां का बीच चौराहे पर चीरहरण नहीं किया है। जब भी मैं भोजपुरी के किसी पोस्टर या ट्रेलर को देखता हूं तो ऐसा लगता है जैसे भोजपुरी रूपी मां अपने बच्चो से चीख चीख कर कह रही हो कि मेरा बलात्कार मत करो, मुझे थोड़ी इज्जत दो। लेकिन शायद कोई सुनने वाला नहीं है।</p>
<p><strong>भोजपुरी फिल्मकारों को</strong> क्या हुआ? सच तो ये है कि भोजपुरी में कोई फिल्मकार ही नहीं है। मैं, बिहार के भोजपुर क्षेत्र से आता हूं। चंपारण से भी उतना ही गहरा रिश्ता है। लेकिन मैंने आजतक कोई भी भोजपुरी फिल्म सिनेमाघर में नहीं देखी है। मैं बाकी सारी भाषाओं की फिल्‍में सिनेमाघर में देखता हूं। ये हास्य से ज्यादा दुःख की बात है। कैसे इन फिल्मकारों ने मुझे और करोड़ों पढ़े-लिखे लोगों को भोजपुरी सिनेमा से अलग कर दिया और बिहार और भोजपुरी समाज के आभिजात्य वर्ग ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया। कह देते हैं कि भी हम तो नहीं देखते भोजपुरी, हां घर में बात करते हैं जरूर भोजपुरी में। लेकिन मैं कहता हूं कि “अरे ऐसा बोलने वाले बेवकूफो, छवि तो तुम्हारी ही बन रही है दुनिया के सामने”। आधे बदन के कपड़े पहने वो लड़की कौन है, उस पोस्टर पर? ध्यान से देखो? वही भोजपुरी है। छाती ठोंक कर कहते हैं न आप, डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे, उनकी भाषा थी भोजपुरी! भिखारी ठाकुर का नाम तो सुना होगा, उनकी भाषा थी भोजपुरी। मुंशी प्रेमचंद, मंगल पांडे, वीर कुंवर सिंह, जयप्रकाश नारायण, बिस्मिल्लाह खान, शिव नारायण राम गुलाम की भाषा है भोजपुरी! ये हम सबकी मां है। अगली बार अपनी मां को देखिए और दीवार पर लगे उन पोस्टर्स को देखिए। पैसे के लिए तन या मन को बेचने को ही वेश्यावृत्ति कहते हैं। लेकिन…</p>
<p><strong>शर्म उनको</strong> मगर नहीं आती!!!</p>
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