Category archives for: मुद्दा

आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता, सिवाय हिंसा के?

राजदीप सरदेसाई हमारे सामने चुनौती यह है कि हम किस तरह आतंकवाद का सामना करते हुए अपने धार्मिक पूर्वग्रहों से ऊपर उठ सकें। हमें स्वीकारना चाहिए कि दोनों समुदायों में कुछ ऐसे लोग और संगठन हैं, जो हिंसा के जरिए ही समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। ये संगठन अपने समुदाय के लोगों के मन [...]

दलित नेता सुधीर ढवले को बिनायक सेन बनाने की तैयारी

इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और मराठी पत्रिका, ‘विद्रोही ‘ के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे।

देश को फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है

सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। [...]

ये नेता महिलाओं को इस्तेमाल की चीज क्यों मानते हैं?

बिहार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार [...]

“आखिर क्यों हर हिंदू आतंकवादी का रिश्ता आरएसएस से है”

दिसंबर में हुई कांग्रेस की सालाना बैठक में जब से तय हुआ कि आरएसएस के उस रूप को उजागर किया जाए जिसमें वह आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक के रूप में पहचाना जाता है, तब से ही संघ के अधीन काम करने वाले संगठनों और नेताओं में परेशानी का आलम है। जब से आरएसएस के ऊपर [...]

भ्रष्टाचार को समर्पित साल और राजनीति की उतरती आबरू

देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़झाले से गुज़र रही है। कांग्रेस की ढिलाई और हालात पर पकड़ के कमजोर होने की वजह से अगर आज चुनाव हो जाएं तो यूपीए सरकार की हार लगभग पक्की मानी जा रही है। यह बात बहुत सारे कांग्रेसियों को भी पता है। बीजेपी वालों को यह बात सबसे [...]

बहुत हुआ, अब भोजपुरी सिनेमा को बदलना ही होगा!

अगर आप बिहार के रहने वाले हैं, या भोजपुरी भाषी हैं और देश के किसी भी कोने में आप इंजीनियर, डाक्टर, वकील, बैंक अफसर, नौकरशाह, मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, छात्र, घूसखोर किरानी, कालाबाजारू कारोबारी, समाज सेवक, दिल्लीवाला बनने के लिए आतुर हैं, अपने आपको बिहारी कहने से शर्माती हुई लड़की या घुट-घुट के जीने वाले कोई भी व्यक्ति हैं, तो मैं ये बता दूं की ये भोजपुरी फिल्‍में आप ही की कहानी बता रही हैं, और आप हैं कि कहते है की हम देखते नहीं, वो तो बहुत गंदी होती हैं। गंदी तो होती हैं, लेकिन क्यों? क्या इसका आप पर कोई असर होता है?

बॉलीवुड में कहानी पर भारी हैं सितारे, चलो ये व्यवस्था बदलें

मोटे तौर पर यह कहानियों का दशक रहा है। इस दौरान दर्शकों की तरफ से नई और अलग तरह की सामग्री की मांग आई और इसी मांग ने इन कहानियों को सफल बना दिया। ऐसी फिल्में जो अलग हटकर थीं, जो कुछ कहती थीं, दिलचस्प ढंग से कहती थीं, जो लीक से हटकर थीं, वे [...]

भोजपुरी सिनेमा की पहली कथा यहां है, आप दूसरी कहें

यह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन दस्‍तावेजी है, क्‍योंकि इसके पन्‍ने पीले पड़ चुके हैं। भोजपुरी फिल्‍मों का बाजार तो बन गया है, लेकिन जैसा कि समय के दस्‍तावेजीकरण का दुख सब जगह पसरा हुआ है, भोजपुरी भी इससे अछूता नहीं है। कुछ समय पहले वरिष्‍ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने अपने फेसबुक पर [...]

गालिब की जयंती पर उर्दू समाज को सहारा का तोहफा

उर्दू हमारे लिए मजहब नहीं, संस्‍कृति है : ओपी श्रीवास्‍तव, उपप्रबंधक, सहारा इंडिया ♦ अविनाश एक तो शरद के उफान वाले दिन, जिसमें रजाई से निकलने में भी आलस्‍य आता है – उसमें नहाना तो हर दिन टालना ही पड़ता है। कोई बहुत जरूरी मीटिंग या महफिल न हो, तो चीकट आदमी की तरह दिल्‍ली [...]

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