प्रकाश प्रियदर्शी/ राकेश कुमार इंडिया हैबिटेट सेंटर के गुलमोहर सभागार में बहसतलब-6 का आयोजन हुआ।जैसा कि बहसतलब की अपनी एक खास पहचान बन गई है,वक्ता श्रोता के बीच सीधा संवाद। बहसतलब के इस चरण में भी यह बात सही साबित हुई। द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास के मशहूर लेखक पवन कुमार वर्मा अपनी नई किताब [...]
बहसतलब छह में हालांकि श्रोताओं की उतनी गज-गज नहीं थी, जो आमतौर पर हुआ करती है। लोग कम आये थे, लेकिन जो आये थे वे भारतीयता को लेकर ढेर सारी बेचैनियों पर बात करने के लिए आये थे। हमें यह लगा कि वक्त कम है और बातें बेहिसाब। रविकांत, जो कि इतिहासकार हैं, इतिहास के [...]
बहसतलब पांच की चर्चा अभी भी जारी है।उससे जुड़ी खबरें अब भी समाचार माध्यमों में जगह पा रही हैं। कल के दैनिक भास्कर में बहसतलब में सवाल-जवाब को लेकर श्रोताओं के आग्रह-दुराग्रह पर नरेश जी ने लिखा है। हम उनके आभारी हैं। उस लेख को हम जनतंत्र पर भी उपलब्ध करा रहे हैं: मॉडरेटर सवाल [...]
Oct 12 2010 | Posted in
तीर-ए-नज़र,
बहसतलब |
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‘मैं आज मोबाइल के लिए फिल्म बना रहा हूं और तीन-तीन मिनट की इन चार फिल्मों के लिए मुझे इतना पैसा मिल रहा है, जितना आज तक किसी फीचर फिल्म के निर्देशन के लिए नहीं मिला।’ बहसतलब की पांचवीं दो-दिनी सेमिनार में जब अनुराग कश्यप ने यह बात कही, तो कई सुननेवाले थोड़ा असहज हुए। [...]
Oct 6 2010 | Posted in
बहसतलब,
मुद्दा |
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रामकुमार सिंह– यह सिनेमा पर बहस से इतर बहसतलब के माहौल को बताने की कोशिश है। बौद्धिक विमर्श इस पोस्ट में मेहमान की तरह दिख जाए तो बात अलग है, वैसे मैंने उसे शामिल करने की कोशिश नहीं की है क्योंकि अन्य लेखों में ये सब आ ही चुका है। आसमान से टिप टिप पानी [...]
बहसतलब पर आपने अलग अलग लेखकों द्वारा अलग अलग रिपोर्ट की झलक देखी । दरअसल ज्यादातर रिपोर्टों को प्रकाशित करने का हमारा मकसद सिर्फ इतना है कि हमारे पाठक यह जानें की अलग-2 लोगो ने बहसतलब को किस-2 रूप में देखा। इसी कड़ी में उमेश पंत की रिपोर्ट भी प्रकाशित कर रहें हैं.. बहसतल का [...]
चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने जब बोलना शुरू किया तो हमें बैठे-बैठे सिनेमा के सेमिनार में होने के बजाय प्रजापति ब्रह्मकुमारी के प्रभाती संत्संग का ध्यान हो आया जिसे कि सुधीश पचौरी ने चंद्रप्रकाशजी का प्रवचन नाम दिया। चंद्रप्रकाशजी की जानकारी, उनकी पढ़त, चाणक्य जैसे सीरियल और पिंजर जैसी फिल्म के डायरेक्टर के तौर पर हम पहले [...]
सचिन अपनी मां की बात करते हैं जो कि उनके मोबाइल यूट्यूब पर लग जा गले देखने की डिमांड से शुरू होती है। सचिन बताते हैं कि उस वीडियो में हीरोइन का हीरो के प्रति अपील खुलकर फिल्माया गया है। पूरा एप्रोच बोल्ड है जो कि अब सिर्फ एक मुहावरा बनकर रह गया है। मां [...]
मुझे स्त्री-पुरुष संबंध समझ में नहीं आता। मैंने कोशिश भी की है। मैंने महिला पात्र जब भी लिखे हैं, जिन्हें मैं जानता हूं, जिनके साथ मैं बात करता हूं, मेरी जो हिरोइनें पर्सनल लाइफ में रही हैं, वही मेरे फिल्मों में आ गयी हैं। स्क्रीन पर फिल्म में प्रेम दिखते नहीं। वो छूते क्यों नहीं, [...]
Sep 27 2010 | Posted in
बहसतलब,
सुर्ख़ियां |
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इस मामले में बड़ी गड्डमड्ड स्थिति है। हम सिर्फ स्त्री-पुरुष, विवाहेतर संबंधों में फंसकर रह जाते हैं। देवर-भाभी, बहन सब पर फिल्में बनी हैं लेकिन आज नहीं हैं। मां-बेटे के रिश्ते क्यों नहीं दिखाई देते। देवर-भाभी के संबंध में दिखाई क्यों नहीं देते। लेकिन आज जब भी चर्चा करते हैं तो स्त्री कितनी स्वतंत्र हो [...]