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	<title>जनतंत्र &#187; मुद्दा</title>
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	<description>बोल के लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता, सिवाय हिंसा के?</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Jan 2011 19:51:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>

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		<description><![CDATA[राजदीप सरदेसाई हमारे सामने चुनौती यह है कि हम किस तरह आतंकवाद का सामना करते हुए अपने धार्मिक पूर्वग्रहों से ऊपर उठ सकें। हमें स्वीकारना चाहिए कि दोनों समुदायों में कुछ ऐसे लोग और संगठन हैं, जो हिंसा के जरिए ही समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। ये संगठन अपने समुदाय के लोगों के मन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>राजदीप सरदेसाई</strong></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/blast.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/blast-300x199.jpg" alt="" title="INDIA-ASSAM/BLAST" width="300" height="199" class="alignright size-medium wp-image-21515" /></a><strong>हमारे </strong>सामने चुनौती यह है कि हम किस तरह आतंकवाद का सामना करते हुए अपने धार्मिक पूर्वग्रहों से ऊपर उठ सकें। हमें स्वीकारना चाहिए कि दोनों समुदायों में कुछ ऐसे लोग और संगठन हैं, जो हिंसा के जरिए ही समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। ये संगठन अपने समुदाय के लोगों के मन में पैठे डर और असुरक्षा का दोहन करते हैं और उनमें ‘प्रतिशोध’ लेने की भावना पैदा करते हैं।</p>
<p>यदि एसएमएस से देश के मिजाज का अंदाजा लगा पाना संभव हो तो यह साफ है कि हर बार किसी आतंकी हमले के बाद आम धारणा क्या होती है। ‘हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता, लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम होता है’, आतंकी वारदातों के बाद इस तरह के एसएमएस मिलना आम हो जाता है। लेकिन अब स्वामी असीमानंद की इस कथित ‘स्वीकारोक्ति’ के बाद कहानी में नया मोड़ आ सकता है कि पिछले एक दशक में हुए कुछ आतंकी हमलों में हिंदूवादी संगठनों की सहभागिता रही है। अब एक नया एसएमएस चल रहा है, ‘यदि हर आतंकवादी मुस्लिम है तो क्या स्वामी असीमानंद ने इस्लाम कबूल लिया है?’ यदि इस तरह के एसएमएस मानसिकताओं के एक खतरनाक ध्रुवीकरण की ओर संकेत नहीं कर रहे होते तो उन्हें सतही कहकर नकारा जा सकता था। हालांकि एक सफल अभियोजन के लिए कुछ अन्य ठोस स्वतंत्र साक्ष्यों की भी आवश्यकता होगी, लेकिन असीमानंद की यह स्वीकारोक्ति एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा करती है। अभी तक आतंक को सीमा पार से होने वाली घटनाओं या ‘जेहादी’ मानसिकता से ही जोड़कर देखा जाता था, लेकिन यदि अनुसंधानों पर भरोसा करें तो देश के विभिन्न राज्यों में हुई आतंकी वारदातों में से कम से कम दर्जनभर ऐसी हैं, जिनके पीछे हिंदुत्व से प्रेरित संगठनों का दिमाग काम कर रहा था।</p>
<p>यह दुर्भाग्य की बात है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जरूरी सवालों का सामना करने के बजाय इन खुलासों पर राजनीतिक वर्ग की प्रतिक्रिया खंडन और दुर्भावना के आरोपों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। संघ परिवार, फिर चाहे वह आरएसएस हो या भाजपा, ने खंडन का रास्ता अख्तियार किया है। आरोपों को कांग्रेस की ‘साजिश’ और भ्रष्टाचार के मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश बताया जा रहा है। खुलासे की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन आरोपी के बचाव में मुस्तैदी से डट जाना न केवल गलत है, बल्कि एक ऐसे देश की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता को कम करके आंकना भी है, जो आतंक के विरुद्ध लड़ाई में मुब्तिला हैं। दूसरी तरफ संघविरोधी समूहों ने असीमानंद की स्वीकारोक्ति के बाद आरएसएस से जुड़े हर व्यक्ति की प्रामाणिकता पर सवालिया निशान लगाने शुरू कर दिए हैं। बीते कुछ समय में बम विस्फोट की जितनी घटनाएं हुईं, उन सभी की नए सिरे से जांच करने और अल्पसंख्यक समुदाय के आरोपियों को रिहा करने की मांग की जा रही है। कुछ मामलों में जरूर गलती हो सकती है, लेकिन यह जताना कि हर मामले में मुस्लिमों को ही निशाना बनाया गया है, न्यायिक प्रक्रिया में भरोसे की कमी को दर्शाता है। </p>
<p>हैरानी नहीं होनी चाहिए कि पाकिस्तान ने इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। उसने समझौता ट्रेन विस्फोट के मामले में अधिक जानकारी मांगी है। ऐसा करके वह 26/11 के बाद उस पर लगाए गए इन आरोपों का प्रतिशोध ले रहा है कि वह षडयंत्रकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में नाकाम रहा था। चूंकि समझौता एक्सप्रेस पर हुए हमले में आधिकारिक रूप से लश्कर का हाथ बताया गया था, इसलिए ताजा खुलासों ने पाकिस्तान को हमारी प्रामाणिकता पर सवाल खड़े करने का एक मौका दे दिया है।</p>
<p>जबकि सच्चाई यह है कि आतंक के विरुद्ध लड़ाई में किसी किस्म के पक्षपात की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से मिलने गए थे और यह दावा किया था कि साध्वी ‘निर्दोष’ हैं और उन्हें राज्य सरकार द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है, तब उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक पक्ष लिया था, जो कानून के नियमों के अनुरूप नहीं था। क्या उन्होंने या किसी भाजपा नेता ने किसी ऐसे बेकसूर मुस्लिम युवा के प्रति सहानुभूति जताई है, जो शायद इसी तरह के आरोपों का सामना कर रहा हो? इसी तरह जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह एक ऐसी किताब के विमोचन समारोह में सम्मिलित होते हैं, जो 26/11 हमलों को आरएसएस-मोसाद-सीआईए का षडयंत्र बताती है, तब वे केवल उन ताकतों की हरकतों को वैध ठहराने की ही कोशिश करते हैं, जो आतंक को धर्म के चश्मे से देख रही हैं। आखिर वे उन्हें साफ इनकार क्यों नहीं कर देते? आतंक का राजनीतिकरण करते हुए हमारे नेता देश की जांच एजेंसियों का कतई भला नहीं कर रहे हैं, जो राजनीतिक तंत्र से मुक्त होकर अपना काम करना चाहती हैं। जब लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावर नेता ने प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार करने वाले एटीएस चीफ हेमंत करकरे की आलोचना की, तो उन्होंने उन पर लगने वाले इन आरोपों को सही साबित ही किया था कि वे भगवा बंधुत्व का नारा लगाने वालों के नेता हैं, देश के नहीं।</p>
<p>हमारे सामने चुनौती यह है कि हम किस तरह आतंकवाद का सामना करते हुए धार्मिक पूर्वग्रहों से ऊपर उठ सकें। हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि दोनों ही समुदायों में कुछ ऐसे लोग और संगठन हैं, जो हिंसा के जरिए ही समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं। कई बार ये संगठन अपने समुदाय के लोगों के मन में पैठे डर और असुरक्षा का दोहन करते हैं। वे उन्हें यह बताते हैं कि उन्हें ‘निशाना’ बनाया जा रहा है और उनमें ‘प्रतिशोध’ लेने की भावना पैदा करते हैं। इसीलिए असीमानंद की स्वीकारोक्तियां यदि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित हो जाती हैं, तो यह हमारे लिए खतरे की घंटी साबित होनी चाहिए। लंबे समय से हम जहां खुले तौर पर इस्लाम को आतंकवाद से जोड़कर देखते आ रहे हैं, वहीं ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए हम जरा रक्षात्मक हो जाते हैं। इन विरोधाभासी रवैयों के पीछे छिपा पाखंड और दोहरा मापदंड अब नहीं चलेगा। अभिनव भारत जैसे समूहों की गतिविधियों को यह कहते हुए औचित्यपूर्ण ठहराने का कोई मतलब नहीं है कि वे ‘हाशिए’ के तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाशिए के तत्व धर्मस्थलों पर धमाका नहीं करते और न ही वे निर्दोषों की हत्या करते हैं। साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि इंडियन मुजाहिदीन खुफिया एजेंसियों की कपोल कल्पना नहीं, बल्कि एक खतरनाक, सुसंगठित आतंकी संगठन है, जिसका सख्ती से इलाज किया जाना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह कि हमें आतंकवाद को लेकर अपनी पूर्वनिर्धारित धारणाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्या हमें किन्हीं ऐसे एसएमएस पर विचार नहीं करना चाहिए, जो यह स्वीकार करते हों कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता, सिवाय हिंसा के?</p>
<p>पुनश्च : हाल ही में एक टीवी शो के दौरान मैंने आतंकवाद पर विशेषज्ञ राय रखने वाले बी रमन से पूछा कि वे आतंक के विरुद्ध लड़ाई में हमारे राजनेताओं को क्या सलाह देना चाहेंगे? रमन का ‘नो-नॉनसेंस’ जवाब था : ‘उन्हें अपना मुंह बंद रखना चाहिए और जांचकर्ताओं को अपना काम करने देना चाहिए।’</p>
<p><strong>दैनिक भास्कर से साभार<br />
</strong></p>
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		<title>दलित नेता सुधीर ढवले को बिनायक सेन बनाने की तैयारी</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jan 2011 02:13:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और  मराठी पत्रिका, 'विद्रोही ' के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>यह</strong> एक खतरनाक दौर है। सत्ता ने नशे में चूर आले दर्जे के मूर्ख हुक्मरान हर वो आदेश दे रहे हैं जो देश की मूल भावना के खिलाफ जाता है। वो एक तरफ को लूट-खसोट में लिप्त हैं और हजारों-लाखों करोड़ रुपये के घोटाले कर रहे हैं और दूसरी तरफ उन लोगों को उठा कर जबरन जेल में ठूंस रहे हैं जो गरीबों-दलितों के हितों की बात करते हैं। बिनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसके गवाह हम सब हैं और अब महाराष्ट्र में दलित नेता सुधीर ढवले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यही नहीं रविवार को उनके घर पर बिना सर्च वारंट के छापा मारा और घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए तलाशी ली। पुलिस की इस गैरकानूनी कार्रवाई का हम विरोध करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि सुधीर ढवले को तुरंत रिहा किया जाए। &#8211; <strong>मॉडरेटर </strong></p></blockquote>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/sudhir-dhawle.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/sudhir-dhawle.jpg" alt="" title="sudhir dhawle" width="200" height="147" class="alignright size-full wp-image-21463" /></a>महाराष्ट्र पुलिस ने भी छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह गरीबों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी है। इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और  मराठी पत्रिका, &#8216;विद्रोही &#8216; के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। पुलिस ने उनको नक्सलवादी बताकर अपने काम को आसान करने की कोशिश भी कर ली है। <span id="more-21462"></span></p>
<p>अभी पिछले हफ्ते गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने महाराष्ट्र सरकार से आग्रह किया था कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान को तेज किया जाए। सबको मालूम है कि जब पुलिस के ऊपर आला अफसरों का दबाव पड़ता है तो वे सबसे आसान पकड़ उन वामपंथियों को मानते हैं जो गरीब आदमियों के बीच काम कर रहे हों। छत्तीसगढ़ में डॉ बिनायक सेन ऐसे ही शिकार थे और अब महाराष्ट पुलिस ने वही कारनामा कर दिखाया है। सुधीर ढवले ने वर्धा में रविवार को अंबेडकर-फुले साहित्य सम्मलेन को संबोधित किया था और गिरफतारी के समय ट्रेन से वापस मुंबई  जा रहे थे। उन्हें गिरफ्तार करके 12 जनवरी तक पुलिस हिरासत में रखा जाएगा। गोंदिया की पुलिस ने दावा किया है कि कुछ लोगों ने उसे बता दिया था कि सुधीर ढवले किसी नक्सलवादी संगठन के राज्य स्तर के पदाधिकारी हैं। और उनके पास एक कम्प्युटर है जिसमें सारा नक्सलवादी साहित्य रखा हुआ है। सुधीर का कम्प्युटर भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है। सुधीर की गिरफ्तारी को सभ्य समाज के लोग किसी भी विरोधी आवाज को कुचल देने की सरकारी साजिश का हिस्सा मान रहे हैं। </p>
<p>सुधीर ढवले कोई लल्लू पंजू सड़क छाप नेता नहीं है। महाराष्ट्र में दलित अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन के चोटी के नेता हैं। महाराष्ट्र में जाति के विनाश के लिए चल रहे आंदोलन में वे बहुत ही आदर के मुकाम पर विराजमान हैं। 2006 में जब खैरलांजी में दलितों की सामूहिक ह्त्या की गयी थी तो महाराष्ट्र के नौजवानों में बहुत गुस्सा था। उसके बाद 6 दिसंबर 2007 को डॉ अंबेडकर के महापरिनिर्वाण के दिन रिपब्लिकन जातीय अन्ताची चालवाल की स्थापना करके सुधीर ढवले ने जाति के विनाश के डॉ अंबेडकर के अभियान को आगे बढ़ाया था। यह आंदोलन आज मुंबई में एक मजबूत आंदोलन है। इस बात में दो राय नहीं है कि वे सरकार के लिए असुविधाजनक हमेशा से ही रहे हैं। महाराष्ट्र में चल रहे उस आंदोलन की अगुवाई भी वे कर रहे थे जिसमें मुंबई और महाराष्ट्र के सभ्य समाज के लोग डॉ बिनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ लामबंद हो गए थे। सुधीर की गिरफ्तारी के बाद मुंबई के संस्कृति कर्मियों के बीच बहुत गुस्सा है। फिल्मकार आनंद पटवर्धन ने कहा कि सुधीर ढवले बहुत ही भले आदमी  है। उनको भी उसी तर्ज़ पर पकड़ा गया है जिस पर बिनायक सेन को पकड़ा  गया था। फिल्मकार सागर सरहदी ने भी सुधीर ढवले की गिराफ्तारी को गलत बताया है।</p>
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		<title>देश को फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jan 2011 01:48:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आशुतोष</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/manmohan_singh.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/manmohan_singh-300x202.jpg" alt="" title="manmohan_singh" width="300" height="202" class="alignright size-medium wp-image-21459" /></a>सखि सैंया तो बहुते कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है। वर्ष 2009 के चुनाव से ही महंगाई डायन खाए जा रही है। मौजूदा हफ्ते में इसका आंकड़ा 18 प्रतिशत से भी आगे निकल गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु फरमा रहे हैं कि सरकार के पास इससे निपटने का कोई उपाय नहीं है। और ये उस वक्त कहा जा रहा है, जब देश की कमान एक अर्थशास्त्री के हाथों में है।</p>
<p>जिस व्यक्ति के सिर पर वर्ष 2004 से अब तक देश की विकास दर नौ प्रतिशत के आस-पास रखने का सेहरा बंधता है, देश की आर्थिक क्रांति का जनक जिन्हें माना जाता है, ऐसे प्रधानमंत्री के काल में बसु का यह बयान चौंकाता है। मैं यह मानने को तैयार नहीं कि मनमोहन सिंह के पास महंगाई से निपटने का कोई रास्ता नहीं है। </p>
<p>मनमोहन सिंह वह शख्स हैं, जिन्होंने तब देश को राह दिखाई थी, जब देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। राजनेताओं के हाथ-पांव फूल गए थे। तब एक अर्थशास्त्री सामने आया था, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। ऐसे में, जब वर्ष 2004 मे सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी, तो सबको पता था कि राजनीति सोनिया देखेंगी और मनमोहन सिंह एक नौकरशाह की तरह सरकार चलाएंगे। पांच साल तक यह व्यवस्था अच्छी तरह चली। अर्थव्यवस्था भी सरपट भागी और मनमोहन सिंह भी मध्य वर्ग के लाडले बने रहे। विपक्ष औंधे मुंह पड़ा था और मीडिया अपनी राह से भटका हुआ, खासतौर पर टीवी, जो खबरों के अलावा सब कुछ कर रहा था।<span id="more-21460"></span></p>
<p>पिछले आम चुनाव ने मनमोहन सिंह को मैच विनर बना दिया। यहीं से उनकी मुसीबत शुरू हो गई। वर्ष 2004 में लोगों को उनसे कोई अपेक्षा नहीं थी, लेकिन 2009 में उम्मीदें अचानक काफी बढ़ गईं। लोग उनमें एक अर्थशास्त्री के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी खोजने लगे। पार्टी के अंदर और बाहर उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ने लगी। जब तक वह कमजोर व्यक्ति थे, सबको सूट करते थे, लेकिन जैसे ही मजबूत हुए लोगों को खटकने लगे।</p>
<p>विपक्ष विशेषकर बीजेपी भी खड़ी हो गई। मीडिया भी खबरों पर वापस आया, तो एक के बाद एक घोटाले खुलने लगे। सरकार का हनीमून खत्म भी नहीं हुआ कि दिन में तारे नजर आने लगे। आरोपों की हुंकार प्रधानमंत्री के दरवाजे तक गूंजने लगी। इस्तीफा मांगा जाने लगा और ईमानदार प्रधानमंत्री को राजीव गांधी की तरह बयान देना पड़ा कि सीजर की पत्नी को शक से ऊपर रहना चाहिए, इसलिए वह पीएसी के सामने पेश होने को तैयार हैं। यानी उन्होंने जब कोई घोटाला किया ही नहीं, तो किसी भी जांच से डर कैसा? मनमोहन सिंह की यह कमजोरी थी। इसलिए नहीं कि उन्होंने कोई गलती की है, बल्कि इसलिए कि वह राजनीतिज्ञ की तरह बर्ताव नहीं कर रहे और बुरी तरह से एक्सपोज हो रहे हैं। जैसे राजीव गांधी जाल में उलझ गए थे।</p>
<p>राजीव भी स्वभाव से राजनीतिज्ञ नहीं थे। राजनीति की बारीकियों और नेताओं की धूर्तता से वह वाकिफ नहीं थे। उन्हें अहसास नहीं था कि राजनीति में कहा कुछ जाता है, किया कुछ। पीठ पर वार वही करते हैं, जो सबसे करीब होते हैं। राजनीतिज्ञ अपने अलावा किसी और पर भरोसा नहीं करता और कभी अपने हितों के लिए किसी अपने की बलि लेने को तैयार रहता है। संकट आने के पहले ही वह भांप लेता है कि हवा किस तरफ बह रही है और समय से पहले हवा के रुख को दूसरों की तरफ मोड़ने की कोशिश करता है। राजीव यह सब नहीं कर पाए, अब मनमोहन भी नहीं कर पा रहे हैं। राजीव को पॉलिटिकल होना था, वह नहीं हो पाए, इसलिए एक के बाद एक गलतियां करते गए। मजबूरी यह थी कि उन्हें दोनों भूमिका निभानी थी। एक प्रधानमंत्री की और दूसरी पार्टी अध्यक्ष की।</p>
<p>मनमोहन सिंह की यह मजबूरी नहीं है। वह प्रधानमंत्री हैं और सोनिया राजनीति के फैसले करती हैं। पहले पांच साल तो सब कुछ ठीक चला, क्योंकि इस दौरान राजनीतिक चुनौतियां काफी कम थीं, सिवाय न्यूक्लियर डील के। उसमें वो साफ बच निकले, क्योंकि उनका सामना एक ऐसे आदमी से था, जो खुद राजनीति का पक्का घुटा हुआ खिलाड़ी नहीं था। प्रकाश करात उनकी तरह ही पढ़ाकू ज्यादा हैं। मनमोहन को किसी ने नहीं बताया कि काम के बंटवारे के बावजूद प्रधानमंत्री का पद सिर्फ एक नौकरशाह का पद नहीं होता, वह खालिस पॉलिटिकल कुर्सी भी है। नीतिगत और प्रशासनिक फैसले लेने के पहले उन्हें राजनीति के तराजू पर भी तोलना पड़ता है। संकट आने से पहले उसे भांपना होता है।</p>
<p>मनमोहन सिंह को कॉमनवेल्थ घोटाले की भनक मिलने के पहले कदम उठाने थे, 2-जी स्पेक्ट्रम पर राजा और डीएमके की मनमानी के फलितार्थ को समय से पहले समझना था। दोनों ही मामलों में उनकी लेट-लतीफी उनके जी का जंजाल बनी। लोगों ने पूछा कि क्या प्रधानमंत्री को नहीं पता था कि कॉमनवेल्थ गेम्स में क्या हो रहा है? 2-जी स्पेक्ट्रम पर लोगों ने देखा कि कैसे एक क्षेत्रीय पार्टी का मंत्री प्रधानमंत्री समेत पूरी सरकार की खिल्ली उड़ाता रहा और सब कुछ जानते हुए मनमोहन सिंह मौन रहे।</p>
<p>लोग कहने लगे कि यह कैसे प्रधानमंत्री हैं, जो एक मंत्री को नहीं संभाल पाए। घुटे विपक्षी नेताओं को उन्होंने वह मौका दे दिया, जो एक राजनेता शायद कभी नहीं देता। उनकी यही कमजोरी महंगाई पर भी साफ दिख रही है। वह उसे आर्थिक समस्या मानते रहे, जबकि यह मसला राजनीतिक अधिक है। उनको किसी ने बताया नहीं कि प्याज पर दिल्ली की सुषमा स्वराज की सरकार जा चुकी है।</p>
<p>ऐसे में कौशिक बसु के बयान से पहले महंगाई का पॉलिटिकल मैनेजमेंट होना चाहिए था। इसकी जगह उन्होंने अपने ही कैबिनेट मंत्रियों को खुलेआम बयानबाजी का मौका दिया। चिदंबरम की जुबान कुछ कहती है, प्रणब मुखर्जी की कुछ और। राज्य सरकारें उनके कहे पर अमल नहीं करतीं। महंगाई काबू में आए तो आए कैसे? शांति के समय सादगी तो उनकी ताकत हो सकती है, लेकिन संकट में यही सादगी कमजोरी बन गई है।</p>
<p>प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से अगर उसके मंत्री, सहयोगी और विपक्षी डरे नहीं, तो शासन चलता नहीं। राजनीति और प्रशासन में आधा काम तो खौफ से होता है, बाकी के लिए चालाक बनना पड़ता है। कांग्रेस और उसकी सरकार इस वक्त संकट में है। उसे आज फिलॉस्फर मनमोहन की नहीं, पॉलिटिकल मनमोहन की दरकार है। वक्त उनके पास कम है, क्योंकि दिल्ली के गलियारों में इन दिनों कई ब्रूटस दिखाई देने लगे हैं। सीजर की कुर्सी पर कई लोगों की नजर है, जो नहीं चाहते कि महंगाई डायन मरे और घोटालों पर लगाम लगे। </p>
<blockquote><p>लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं और यह लेख हिंदुस्तान से साभार यहां छापा जा रहा है।</p></blockquote>
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		<title>ये नेता महिलाओं को इस्तेमाल की चीज क्यों मानते हैं?</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Jan 2011 01:41:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna.jpg" alt="" title="Rupam-Pathak-in-police-custody-in-Patna" width="200" height="200" class="alignright size-full wp-image-21451" /></a>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">बि</span>हार में सत्ताधारी दल के एक विधायक को उसके घर पर ही चाकू घोंप कर मार डाला गया। जिस महिला ने उनके ऊपर जानलेवा हमला किया, उसने आरोप लगाया है कि विधायक ने उसका यौन शोषण किया था, उसके परिवार को मारा पीटा था, उसको जान से मारने की धमकी दी थी और उसके परिवार की शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया था। उस महिला का नाम रूपम पाठक है और उसने इस अत्याचार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी थी लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। उस पर दबाव डाल कर केस को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया गया। लगता है कि कहीं से भी न्याय की उम्मीद से निराश होने के बाद उसने यह कदम उठाया।</p>
<p><strong>हत्या एक</strong> जघन्य अपराध है और उसकी निंदा की जानी चाहिए। हत्या जैसा जघन्य अपराध करने वाले को भारतीय दंड संहिता के आधार पर दंड दिया जाना चाहिए। ताजा खबर यह है कि अदालत ने रूपम पाठक को चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पत्रकारों से बता दिया है कि मामले के सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है और जुडीशियल जांच की भी कोई जरूरत नहीं है। राज्य की पुलिस पूरी तरह से सक्षम है और वह जांच का काम पूरा कर लेगी। उनके इस बयान के बाद राज्य की पुलिस ने पूरी तत्परता से काम शुरू भी कर दिया है। हर उस आदमी की धर पकड़ शुरू हो गयी है, जो रूपम पाठक के साथ जरा सी भी सहानुभूति रखता है। एक मुकामी अंग्रेजी साप्ताहिक अखबार के संपादक को पकड़ लिया गया है। नवलेश पाठक नाम के इन पत्रकार ने ही कई महीने पहले रूपम पाठक के यौन शोषण की बात को सार्वजनिक कर दिया था। पुलिस का कहना है कि विधायक की हत्या साजिशन की गयी है और यह पत्रकार उस साजिश का हिस्सा है।</p>
<p><strong>इसके पहले कि</strong> विधायक की हत्‍या और उससे जुड़ी दीगर सामाजिक समस्याओं पर नजर डाली जाए, मृतक विधायक के बारे में भी कुछ जानकारी ले लेना जरूरी है। बीजेपी के इस विधायक का नाम राज किशोर केसरी है। अभी संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में यह विधायक जी पूर्णिया जिले से बीजेपी के टिकट पर जीत कर आये थे। चुनाव के समय उन्होंने एक हलफनामा दाखिल करके स्वीकार किया था कि उनके ऊपर आईपीसी की कई आपराधिक धाराओं में मुकदमा चल रहा है। उन्होंने अपने शपथ पत्र में लिखा है कि वे आईपीसी की दफा 147, 148, 149, 323, 332, 341, 353,307,379, 426, 427, 504 में अभियुक्त हैं। आम बोलचाल की भाषा में इन दफाओं का मतलब भी स्वर्गीय विधायक जी ने अपने शपथ पत्र में साफ साफ लिखा है। यह मुकदमे कत्ल की कोशिश, चोरी, अपहरण जैसे संगीन मामलों में दर्ज किये गये हैं। यह मुकदमे किसी विपक्षी पार्टी की सरकार के दौरान नहीं दर्ज किये गये। यह सारे अपराध नीतीश कुमार की पिछली सरकार के दौरान किये गये और अपनी सरकार होने के बावजूद यह राजकुमार केसरी आपराधिक मुकदमों से बच नहीं सके।</p>
<p><strong>लुब्बोलुआब यह है</strong> कि राजकुमार केसरी कोई मामूली आदमी नहीं थे। इलाका उनसे थर्राता था। शायद इसी वजह से रूपम पाठक के ससुर ने ऐलानिया कह दिया कि स्वर्गीय विधायक जी तो बहुत अच्छे आदमी थे, उनकी बहू ने ही गड़बड़ किया था। इस प्रकार से मामला दफन होने की राह पर निकल पड़ा था लेकिन रूपम पाठक की मां, कुमुद मिश्र ने अपनी बेटी की इज्जत को दागदार होने से बचाने का फैसला किया और बिहार के राज्य महिला आयोग में अर्जी लगा दी कि राजकुमार केसरी और उसका चमचा बिपिन राय उनकी बेटी को हमेशा परेशान करते रहते थे। उन्होंने अपनी दरखास्त में लिखा है कि केसरी एक बदमाश आदमी था और सारा पूर्णिया जिला उसके गुनाहों को जानता था और बहुत सारे लोगों को मालूम है कि उसने आतंक का राज कायम कर रखा था। रूपम की मां ने मांग की है कि मामले की सीबीआई जांच करवायी जाए क्योंकि बिहार पुलिस तो गवाहों को डरा-धमका कर फर्जी मामले में रूपम पाठक को फंसा देगी। रूपम पाठक की मां की तरफ से हिम्मत करके आगे आने के बाद तो एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने भी अपने कर्तव्य की पहचान की और उनको टेलीविजन न्यूज का समय दिया। रूपम की मां ने देश को बताया कि राजकुमार केसरी के लोग उनको धमका रहे हैं, बिपिन राय इस गिरोह की अगुवाई कर रहा है। रूपम के बेटों के अपहरण की धमकी दी जा रही है। कुमुद मिश्र ने बताया कि रूपम के पति जो इंफाल में रहते हैं, उनकी जान को भी खतरा है और बिहार पुलिस से न्याय की उम्मीद बिलकुल नहीं है।</p>
<p><strong>जरूरत</strong> इस बात की है कि राजनीतिक नेताओं के महिलाओं के शोषण के प्रति रुख की भी बाकायदा जांच की जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसे सैकड़ों विधायक हैं, जिनके ऊपर महिलाओं के शोषण के आरोप लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में अभी भी सत्ताधारी दल का एक विधायक एक लड़की के अपहरण और शारीरिक शोषण के मामले में पार्टी से निलंबित चल रहा है। उत्तर प्रदेश में कई मंत्रियों के खिलाफ भी इस तरह के मामले चल रहे हैं। मुलायम सिंह की सरकार में मंत्री रहे एक नेता ने एक कवयित्री की हत्‍या करवा दी थी और आजकल जेल में है। इन बातों की जांच की जानी चाहिए कि नेता बिरादारी अपनी सारी बहादुरी महिलाओं को अपमानित करने में ही क्यों दिखाती है। इन अपराधी लोगों को दंडित किया जाना चाहिए और उनका सार्वजनिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति पैदा की जानी चाहिए कि नेताओं की हिम्मत ही न पड़े कि वे किसी लड़की का यौन शोषण करने के बारे में सोच भी सकें। रूपम पाठक के मामले में भी मीडिया को उसी तरह से सामने आना चाहिए, जिस तरह से अन्य कई मामलों में वह आता रहा है।</p>
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		<title>&#8220;आखिर क्यों हर हिंदू आतंकवादी का रिश्ता आरएसएस से है&#8221;</title>
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		<pubDate>Tue, 04 Jan 2011 05:07:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[दिसंबर में हुई कांग्रेस की सालाना बैठक में जब से तय हुआ कि आरएसएस के उस रूप को उजागर किया जाए जिसमें वह आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक के रूप में पहचाना जाता है, तब से ही संघ के अधीन काम करने वाले संगठनों और नेताओं में परेशानी का आलम है। जब से आरएसएस के ऊपर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/gujarat-new1.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/gujarat-new1.jpg" alt="" title="gujarat new" width="400" height="619" class="alignright size-full wp-image-21413" /></a>दिसंबर में हुई कांग्रेस की सालाना बैठक में जब से तय हुआ कि आरएसएस के उस रूप को उजागर किया जाए जिसमें वह आतंकवादी गतिविधियों के प्रायोजक के रूप में पहचाना जाता है, तब से ही  संघ के अधीन काम करने वाले संगठनों और नेताओं में परेशानी का आलम है। जब से आरएसएस के ऊपर आतंकवादी जमातों के शुभचिंतक होने का ठप्पा लगा है वहां अजीबोगरीब हलचल है। संघ ने अपने लोगों को दो भाग में बांट दिया है। एक वर्ग तो इस बात में जुट गया है कि वह संघ को बहुत पाकसाफ संगठन के रूप में प्रस्तुत करे जबकि दूसरे वर्ग को यह ड्यूटी दी गयी है कि वह संघ को सभी हिन्दुओं का संगठन बनाने की कोशिश करे। आरएसएस के पे रोल पर  कुछ ऐसे लोग हैं जो पत्रकार के रूप में अभिनय करते हैं। ऐसे लोगों की ड्यूटी लगा दी गयी है कि वे हर उस व्यक्ति को हिन्दू विरोधी साबित करने में जुट जाएं जो आरएसएस या उससे जुड़े किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहता हो। <span id="more-21412"></span></p>
<p>लगता है कि कांग्रेस ने आरएसएस की पोल खोलने की योजना की कमान दिग्विजय सिंह को थमा दी है। दिग्विजय सिंह ने भी पूरी शिद्दत से काम को अंजाम देना शुरू कर दिया है। देश के सबसे बड़े अखबार में उन्होंने एक इंटरव्यू देकर साफ़ किया कि वे हिन्दू आतंकवाद की बात नहीं कर रहे हैं, वे तो संघी आतंकवाद का विरोध कर रहे हैं। यह अलग बात है कि आरएसएस वाले उनका विरोध यह कह कर करते पाए जा रहे हैं कि दिग्विजय सिंह हिन्दुओं के खिलाफ हैं। लेकिन इस मुहिम में आरएसएस  को कोई सफलता नहीं मिल रही है। दुनिया जानती है कि आरएसएस  ने अपना तामझाम मीडिया में मौजूद अपने मित्रों का इस्तेमाल करके बनाया है। लगता है कि दिग्विजय सिंह भी मीडिया का इस्तेमाल करके आरएसएस  के ताश के महल को ज़मींदोज़ करने का मन बना चुके हैं। उनके इंटरव्यू को आधार बनाकर जो खबर अखबारों में छापी गयी उसमें संघी आतंकवाद को हिन्दू आतंकवाद लिखकर बात को आरएसएस  के मन मुताबिक बनाने की कोशिश की गयी। </p>
<p>बीजेपी के कुछ नेताओं ने दिग्विजय के हिन्दू विरोधी होने पर बयान भी देना शुरू कर दिया। लेकिन लगता है कि दिग्विजय ने भी खेल को भांप लिया और देश की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी, पी टी आई के मार्फत अपनी बात को पूरे देश के अखबारों में पंहुचा दिया। ज़्यादातर अखबारों में  छपा है कि दिग्विजय सिंह ने इस बात का खंडन किया है कि कि वे हिन्दू धर्म के खिलाफ हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित अखबार, द हिन्दू में  पी टी आई के हवाले से जो बयान छपा है वह आरएसएस के खेल में बहुत बड़ा रोड़ा साबित होने की क्षमता रखता है। दिग्विजय सिंह ने कहा है कि उन्होंने कभी भी आतंकवाद को किसी धर्म से नहीं जोड़ा। उनका दावा है कि आतंकवाद बहुत गलत चीज़ है। वह चाहे जिस  धर्म के लोगों की तरफ से किया जाए। उन्होंने कहा कि हर हिन्दू आतंकवादी नहीं होता लेकिन पिछले दिनों जो भी हिन्दू आतंकवादी घटनाओं  में शामिल पाए गए हैं, वे सभी आरएसएस या उस से संबद्ध संगठनों के सदस्य हैं। यानी वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिन्दू नहीं आरएसएस वाला आदमी आतंकवादी होता है। उन्होंने बीजेपी और आरएसएस से अपील भी की है कि वे आत्मनिरीक्षण करें और इस बात का पता लगाएं कि हर आदमी जो भी आतंकवादी घटनाओं में पकड़ा जा  रहा है, उसका सम्बन्ध आरएसएस से ही क्यों होता है। उन्होंने कहा कि वे हिन्दू धर्म का विरोध कभी नहीं करेगें क्योंकि वे खुद हिन्दू धर्म का बहुत सम्मान करते हैं। उनके माता पिता हिन्दू हैं और उनके सभी बच्चे हिन्दू हैं। लेकिन वे सभी आरएसएस  के घोर विरोधी हैं। </p>
<p>ज़ाहिर है दिग्विजय सिंह एक ऐसे अभियान पर काम कर रहे हैं जिसमें यह सिद्ध कर दिया जाएगा कि आरएसएस एक राजनीतिक जमात है और उसका विराट हिन्दू समाज से कुछ लेना देना नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को गंभीर चुनौती मिल रही है। भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेल कर सत्ता तक पंहुचने वाली बी जे पी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बी जे पी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिलकुल नहीं स्वीकार करते। आरएसएस को भगवा या हिंदू धर्म का पर्यायवाची भी नहीं बनने दिया जाएगा। दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से भी कहा है कि भगवा रंग बहुत ही पवित्र रंग है और उसे किसी के पार्टी की संपत्ति मानने की बात का मैं विरोध करता हूं। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था के बल पर मैं राजनीतिक फसल काटने के पक्ष में नहीं हूं और न ही किसी पार्टी को यह अवसर देना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि हिन्दू धर्म पर हर हिन्दू का बराबर का अधिकार है और उसके नाम पर आरएसएस और बी जे पी वालों को राजनीति नहीं करने दी जायेगी।  और अगर कांग्रेस अपनी इस योजना में सफल हो गयी तो और बी जे पी की उस कोशिश को जिसके तहत वह हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अपने को स्लाट कर रही थी,  नाकाम कर दिया तो इस देश की राजनीति का बहुत भला होगा।</p>
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		<title>भ्रष्टाचार को समर्पित साल और राजनीति की उतरती आबरू</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Jan 2011 09:14:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>शेष नारायण सिंह</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़झाले से गुज़र रही है। कांग्रेस की ढिलाई और हालात पर पकड़ के कमजोर होने की वजह से अगर आज चुनाव हो जाएं तो यूपीए सरकार की हार लगभग पक्की मानी जा रही है। यह बात बहुत सारे कांग्रेसियों को भी पता है। बीजेपी वालों को यह बात सबसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/raja-kalmadi.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/raja-kalmadi-300x165.jpg" alt="" title="raja-kalmadi" width="300" height="165" class="alignright size-medium wp-image-21400" /></a>देश की राजनीतिक स्थिति बहुत ही गड़बड़झाले से गुज़र रही है। कांग्रेस की ढिलाई और हालात पर पकड़ के कमजोर होने की वजह से अगर आज चुनाव हो जाएं तो यूपीए सरकार की हार लगभग पक्की मानी जा रही है। यह बात बहुत सारे कांग्रेसियों को भी पता है। बीजेपी वालों को यह बात सबसे ज्यादा मालूम है। शायद इसी वजह से जेपीसी के नाम पर वे सरकार को घेरे में लेना चाहते हैं। वैसे इस बात में दो राय नहीं है कि 2010  में अपने देश में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़े गए हैं। भ्रष्टाचार और घूस की रकम को इनकम मानने का रिवाज तो बहुत पहले शुरू हो चुका है, लेकिन घूसखोर थोड़ा संभलकर रहता था। भले आदमियों की नजर बचाकर रहता था। लेकिन जब से संजय गांधी ने अपराधियों को राजनीति में इज्जत देना शुरू किया, घूस को गाली मानने वालों की संख्या में भारी कमी आई थी। लेकिन भ्रष्टाचार को सम्मान का दर्जा कभी नहीं मिला। <span id="more-21399"></span></p>
<p>पिछले बीस साल में जब से केंद्र में गठबंधन सरकार की परंपरा शुरू हुई है, भ्रष्टाचार और घूस को इज्जत हासिल होने लगी है। घूसखोर आदमी अपने आप को सम्मान का हकदार मानने लगा है। राजनीति में शामिल लोगों की आमदनी कई गुना बढ़ गयी है और भ्रष्ट होना अपमानजनक नहीं रह गया है। जब तक बीजेपी वाले विपक्ष में थे,  माना जाता था कि यह ईमानदार लोगों की जमात है। लेकिन कई राज्यों में और केंद्र में 6 साल तक सरकार में रह चुकी  बीजेपी भी अब बाकायदा भ्रष्ट मानी जाने लगी है। बीजेपी में फैले भ्रष्टाचार को उनके बड़े नेता कांग्रेसीकरण कहते हैं और उपदेश देते हैं कि पार्टी को कांग्रेसीकरण की बीमारी से बचाएं। यह अलग बात है कि बीजेपी को भ्रष्टाचार की आदत से बचा पाने की हैसियत अब किसी की नहीं है। वह अब विधिवत भ्रष्ट हो चुकी है और वह जब भी सत्ता में होगी भ्रष्टाचार में लिप्त पायी जायेगी। लेकिन भ्रष्टाचार की इस भूलभुलैया में भी सन 2010 का मुकाम बहुत ऊंचा है। </p>
<p>इस  साल देश में आर्थिक भ्रष्टाचार के सारे पुराने रिकार्ड टूट गए हैं। कामनवेल्थ खेलों में सुरेश कलमाड़ी के नेतृत्व में जमकर लूट मची। शुरू में बीजेपी ने जांच के लिए बहुत जोर भी मारा लेकिन जब जांच के शुरुआती दौर में ही बीजेपी के कुछ नेताओं का गला फंसने लगा तो मामला ढीला पड़ गया। अब तो  लगता है कि कांग्रेस ही कामनवेल्थ के घूस को उघाड़ने में ज्यादा रूचि ले रही है। ऐसा शायद इसलिए कि उनका तो केवल एक मोहरा, सुरेश कलमाड़ी मारा जाएगा जबकि बीजेपी के कई बड़े नेता कॉमनवेल्थ घूस कांड की जद में आ जाएंगे। सुरेश कलमाड़ी को राजनीतिक रूप से खत्म करके देश के सत्ताधारी वंश का कुछ नहीं बिगड़ेगा। 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले की जांच में अब बीजेपी और कांग्रेस के शामिल होने की जांच का काम शुरू हो गया है। ज़ाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही इस जांच से जो भी दोषी होगा, दुनिया के सामने आ जाएगा। शायद इसलिए मध्यवाधि चुनाव को लक्ष्य बनाकर बीजेपी वाले जेपीसी जांच की बात को आगे बढ़ा रहे हैं।</p>
<p>बीजेपी के नेताओं को उम्मीद है कि जेपीसी जांच के दौरान मीडिया में अपने लोगों की मदद से कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाया जा सकेगा। और उसका असर सीधे चुनाव प्रचार पर पड़ेगा। कुल मिलाकर हालात ऐसे बन रहे हैं कि देश की सत्ता की राजनीति रसातल की तरफ बढ़ रही है। दोनों ही मुख्य पार्टियां बुरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं। </p>
<p>कांग्रेस पार्टी की राजनीति में सारी ताकत राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान में झोंकी जा रही है। महात्मा गांधी और सरदार पटेल की कांग्रेस के परखचे उड़ रहे हैं। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत पता नहीं कहां दफन हो गए हैं। आलाकमान  कल्चर हावी है और सुप्रीम नेता से असहमत होने का रिवाज ही खत्म हो गया है। राजनीतिक जागरूकता के बुनियादी ढांचे में कहीं कुछ भी निवेश नहीं हो रहा है। ठोस बातों की कहीं भी कोई बात नहीं हो रही है। पार्टी के बड़े नेता चापलूसी के सारे रिकार्ड तोड़ रहे हैं और आजादी के बुनियादी सिद्धातों की कोई परवाह न करते हुए अमरीकी पूंजीवाद के कारिंदे के रूप में देश की छवि बन रही है। </p>
<p>बीजेपी में भी हालात बहुत खराब हैं। कई गुटों में बंटी हुई पार्टी में किसी तरह का अनुशासन नहीं है। नागपुर के बल पर पार्टी  अध्यक्ष बने एक मामूली नेता को कोई भी इज्जत देने को तैयार नहीं है। वह नेता भी अपने अधिकार को बढाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू देकर पार्टी अध्यक्ष ने अपनी ताकत को दिखाने की कोशिश की है। साफ कह दिया है कि लाल कृष्ण आडवाणी अब उनकी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं रहेंगे। भला बताइये, 2009 के लोकसभा चुनावों में पूरे देश में भावी प्रधानमंत्री का अभिनय करते हुए व्यक्ति को एक इंटरव्यू देकर खारिज  कर देना कहां का राजनीतिक इंसाफ है।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि अपने आपको  प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से दूर रख कर अध्यक्ष ने आडवाणी गुट के की कई  नेताओं का नाम आगे कर दिया है। जाहिर है उनके दिमाग में भी आडवाणी गुट में फूट डालकर उनकी ताकत को कमजोर करने की रणनीति काम कर रही है। ऐसी हालात में देश की राजनीति में तिकड़मबाजों और जुगाड़बाजों का बोलबाला चारों तरफ बढ़ चुका है। अब तक बीजेपी वाले नीरा राडिया के हवाले से कांग्रेस को खींचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अब लगता है कि नीरा राडिया के बीजेपी के बड़े नेताओं से ज्यादा करीबी संबंध रह चुके हैं। कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि अब कोई चमत्कार ही देश की राजनीति की आबरू बचा सकता है।</p>
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		<title>बहुत हुआ, अब भोजपुरी सिनेमा को बदलना ही होगा!</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Jan 2011 04:54:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>नितिन चंद्र</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>अगर आप</strong> बिहार के रहने वाले हैं, या भोजपुरी भाषी हैं और देश के किसी भी कोने में आप इंजीनियर, डाक्टर, वकील, बैंक अफसर, नौकरशाह, मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, छात्र, घूसखोर किरानी, कालाबाजारू कारोबारी, समाज सेवक, दिल्लीवाला बनने के लिए आतुर हैं, अपने आपको बिहारी कहने से शर्माती हुई लड़की या घुट-घुट के जीने वाले कोई भी व्यक्ति हैं, तो मैं ये बता दूं की ये भोजपुरी फिल्‍में आप ही की कहानी बता रही हैं, और आप हैं कि कहते है की हम देखते नहीं, वो तो बहुत गंदी होती हैं। गंदी तो होती हैं, लेकिन क्यों? क्या इसका आप पर कोई असर होता है?]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>हम इन दिनों भोजपुरी सिनेमा की दुनिया खंगालने की कोशिश कर रहे हैं। <a href="http://www.janatantra.com/news/2010/12/31/history-of-bhojpuri-cinema-part-one/" target="_blank">आलोक रंजन ने <strong>पहली फिल्‍म की कहानी</strong> बतायी</a>, नितिन आने वाले वक्‍त की तस्‍वीर साफ कर रहे हैं। वे खुद फिल्‍मकार हैं और भोजपुरी सिनेमा की नयी भाषा को लेकर सजग हैं। उन्‍हें दुख है कि भोजपुरी सिनेमा का मौजूदा परिदृश्‍य भोजपुरी समाज की मिट्टी खराब कर रहा है। उनका गुस्‍सा रचनात्‍मक है और हम उनकी इस बेचैनी में खुद को शामिल करते हैं : <strong>मॉडरेटर</strong></em></p></blockquote>
<p style="text-align: center;"><strong>भोजपुरी सिनेमा बनाने वालों द्वारा भोजपुरी भाषा और संस्‍कृति का बाजारीकरण</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong><em>(सिर्फ वयस्‍कों के लिए)</em></strong></p>
<p style="text-align: center;"><span style="font-size: large;"><span style="color: #ff0000;">Disclaimer</span></span></p>
<p><span style="color: #aa0000;"><strong>ये लेख सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो सिनेमा को एक कला की तरह भी देखते हैं और भोजपुरी सिनेमा में पसरी हुई गंदगी के प्रति चिंतित हैं, या नहीं चिंतित हैं…</strong></span></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Poster.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-21390" title="Deswa-Poster" src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Poster-234x300.jpg" alt="" width="234" height="300" /></a></p>
<p><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times, serif, Georgia;">क</span>ई बार जब आप पटना के गांधी मैदान, बांस घाट, रेलवे स्टेशन या मुंबई के अंधेरी, दादर, बांद्रा या दिल्ली के लाजपत नगर, कनाट सर्कल की तरफ से गुजरेंगे तो आपको बड़े भद्दे से, भड़कीले रंगों में, अजीब से चहरों और नामों वाली फिल्‍मों के पोस्टर दिखेंगे। ये हैं भोजपुरी, आपकी भाषा की फिल्मों के पोस्टर्स। शायद आपका आभिजात्य आग्रह, शिक्षा और पारिवारिक पृष्‍ठभूमि ऐसे पोस्टर्स की तरफ आपका ध्‍यान जाने से रोके लेकिन उन पोस्‍टर्स में प्रचारित कहानी बिहार और पूर्वांचल में रहने वाले हर अमीर, गरीब, नेता, अभिनेता, कलाकार, बैंक क्‍लर्क, स्‍कूल शिक्षक, गांव की लड़की, सुमो और मारुति गाड़ी में घूमने वाले ऊंची सोसाइटी के लोग… भोजपुरिया और बिहारी पहचान से ताल्‍लुक रखते हैं। शायद आप अपनी भाषा और पहचान से मुकर जाएं और मुंह बिचका के निकल जाएं, ठीक वैसे ही जैसे कचरे की गंध को सूंघ कर हम नाक बंद करके चल देते हैं, लेकिन वही कचरा जब संक्रमण का रूप लेता है, तब हम जागते हैं या हमेशा के लिए सो जाते हैं। बड़ी अजीब बात है कि इस कचरे के फैलने में आपका भी हाथ है, माने या न मानें। अगली बार जब आप इन भोजपुरी फिल्‍मों के पोस्टर्स को देखें तो थोड़ा बेशर्म होकर गाड़ी, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि को रोक लें (अगर आपके साथ कोई नाबालिग लड़का या लड़की हो तो ऐसा न करें) और एक नजर भर के देखें। आप सामान्यतः तीन चीजें देखेंगे…</p>
<p><strong>1.</strong> एक अधनंगी लड़की, जिसने पता नहीं किस मजबूरी में अपने विदलन (स्तनों के बीच का भाग) दिखाये होंगे</p>
<p><strong>2.</strong> खून से लथपथ हीरो और विलेन (सोचिए, फोटो खिंचवाते समय कितना खून पी जाते होंगे) और नकली बंदूक या चाक़ू… और हां बहुत सारे दूसरे लोग भी दिखेंगे… उन पर ज्यादा ध्यान न भी दें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ये जो उच्चतम दर्जे की भोजपुरी फिल्‍में हैं, वो अस्सी के दशक की “सी ग्रेड” हिंदी फिल्‍मों जैसी हैं। हालांकि वो फिल्‍में भी तकनीकी स्तर पर आज की भोजपुरी फिल्‍मों से आगे थीं।</p>
<p><strong>इन फिल्‍मों के</strong> नाम पर भी हम आएंगे। भोजपुरी सिनेमा का तिबारा जन्म (दो बार वह मर चुकी थी) हुआ, “ससुरा बड़ा पैसा वाला” नामक एक फिल्म से और उसके बाद भोजपुरी फिल्‍मों एक नया दौर शुरू हुआ। इसमें अमिताभ बच्चन के सचिव से लेकर, बिहार के कुछ नेता, दिल्ली के नौकरशाह से लेकर, Ex – Spotboy या देश के किसी भी कोने या भाषा-भाषी का इंसान हो, उसने इस धंधे में पैसा लगाया और कमाया। आज सबको पता है कि किस भाषा की फिल्‍मों को कामुकता का मसाला और अश्लीलता का तड़का लगा दें तो कुछ बेचारे गरीब, अनपढ़ लड़के, रिक्शा, ठेला वाले, स्‍कूल से भागे बच्चे और इस अफीम रूपी सिनेमा के नशे से ग्रसित लोग देखने आ ही जाएंगे। दस-दस रुपये के टिकट खरीद कर फिल्म देखने वाले ये लोग, जो बेचारे तमाम सुविधाओं से वंचित हैं और इतने शिक्षित भी नहीं हैं कि अपना भला बुरा सोच सकें, जानते ही नहीं कि इनके साथ क्या हो रहा है। इनकी सोचने-समझने की शक्ति को इतनी सूक्ष्मता से मारा जा रहा है कि ये जान भी नहीं पाएंगे कि ये असर सिनेमा का है या किसी और चीज का।</p>
<p><strong>कुछ हाल ही में</strong> प्रदर्शित भोजपुरी फिल्‍मों के नाम हैं, “मार देब गोली केहू न बोली”, “जरा देब दुनिया तहरा प्यार में”, “देवरा बड़ा सतावेला”, “लहरीया लुटs ऐ राजाजी”, आदि। “रणभूमि” जैसी सशक्त मुद्दों पर बनी फिल्‍मों में भी बेहद अश्‍लील गाने हैं। हालांकि नाम इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी बड़ी समस्‍या इन फिल्‍मों में दिखायी जाने वाली विषय सामग्री। क्या मैं कुलीन और उच्च वर्ग के बिहारी की तरह बातें कर रहा हूं? नहीं, मैं सिर्फ बिहार का रहने वाला और भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी से प्रेम करने वाला एक साधारण बिहारी हूं, जो भोजपुरी फिल्मों के द्वारा हो रहे भोजपुरिया समाज और बिहार की संरचना और उसकी संस्‍कृति पर हो रहे प्रहार को लेकर चिंतित है।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Image.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-21391" title="Deswa-Image" src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/Deswa-Image.jpg" alt="" width="300" height="693" /></a><strong>आखिर</strong> माजरा क्या है? सब पैसे का खेल है। यही सोच रहे होंगे आप। सही सोच रहे हैं आप।</p>
<p><strong>एक भाषा</strong> सिर्फ भाषा नहीं होती, सिर्फ बात पहुंचाने का साधन नहीं होती है बल्कि एक समाज का अंग, उस सभ्यता की प्रतिनिधि होती है। उसके बोलने वालों की संस्कृति को अपने हर शब्द से बयान करती है। सिनेमा, या किसी भी रूप में जन-संचार, या वो टीवी, रेडियो, अखबार, इंटरनेट हो, अपने में बड़ा ही बलवान होता है। आज के सामाजिक परिवेश में उसका बहुत महत्त्व है और लोग उसे विश्‍वसनीय भी मानते हैं। सिनेमा इनमें से एक बहुत ही सार्थक और सशक्त संचार का माध्यम है। भारतीय समाज पर सिनेमा का असर कितना रहा है, ये तो सभी जानते हैं। भोजपुरी भाषा और इस माध्यम का मिलन हुआ सन 1962 में। बड़े उत्साह से हमारे पूर्वजों ने भोजपुरी सिनेमा की नींव रखी। बड़े-बड़े कलाकार, गायक वगैरह आये और इसका बीज बोया। लेकिन आज क्या हालत है? और इसका जिम्मेदार कौन है?</p>
<p><strong>अगर आप</strong> बिहार के रहने वाले हैं, या भोजपुरी भाषी हैं और देश के किसी भी कोने में आप इंजीनियर, डाक्टर, वकील, बैंक अफसर, नौकरशाह, मंत्री, नेता, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, छात्र, घूसखोर किरानी, कालाबाजारू कारोबारी, समाज सेवक, दिल्लीवाला बनने के लिए आतुर हैं, अपने आपको बिहारी कहने से शर्माती हुई लड़की या घुट-घुट के जीने वाले कोई भी व्यक्ति हैं, तो मैं ये बता दूं की ये भोजपुरी फिल्‍में आप ही की कहानी बता रही हैं, और आप हैं कि कहते है की हम देखते नहीं, वो तो बहुत गंदी होती हैं। गंदी तो होती हैं, लेकिन क्यों? क्या इसका आप पर कोई असर होता है?</p>
<p><strong>मेरे एक</strong> पहचान के व्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि कला पहले अपने बेडौल रूप में रहती है, फिर धीरे-धीरे बारीक और सुंदर होती है। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं, लेकिन एक हद तक। सिर्फ ये कह कर कि सब ठीक हो जाएगा और भोजपुरी सिनेमा अभी परिवर्तन के चरण में है, सारी बहस को समाप्त नहीं किया जा सकता। आज का भोजपुरी सिनेमा, बिहार और भोजपुरिया समाज की क्या छवि बना रहा है, ये एक व्यक्तिपरक (subjective) बात हो सकती है लेकिन मैं इसे एक गंभीर समस्या मानता हूं। आज बिहार और पूर्वांचल के हिस्सों में मैथिली, मगही, अंगिका, बज्जिका और अवधी भाषाएं बोली जाती हैं लेकिन सिनेमा के माध्यम से भोजपुरी भाषा की फिल्‍में ही छवि बना रही हैं या बिगाड़ रही हैं। आज बिहार भोजपुरी सिनेमा का सबसे बड़ा बाजार है। आज भोजपुरी सिनेमा बेहद प्रतिगामी (regressive) है, और अपने घिसे-पिटे संगीत और गीत से सस्ता और हानिकारक मनोरंजन कर रहा है। और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज की भोजपुरी फिल्मों ने अपने लिए हजारों दर्शक खड़े कर लिये हैं, जो इस नशे से बीमार हैं। क्या मजाल कि आज एक अच्छी सोच का निर्माता/निर्देशक भोजपुरी में एक साफ-सुथरी फिल्म बनाने की सोच सके। हालांकि कुछ फिल्‍मे बनी भी हैं।</p>
<p><strong>कभी आपने</strong> सोचा है के ऐसे फिल्मी पोस्टर्स और टीवी पर ट्रेलर्स को देख रहा एक गैर बिहारी या भोजपुरिया, हमारे समाज के बारे में क्या छवि बनाता होगा?</p>
<p><strong>पूरी दिल्ली</strong>, गुड़गांव और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बिहार के लोगों से पटा पड़ा है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय और तमाम ऑफिसेस, कॉल सेंटर्स, कॉरपोरेट्स आदि जगहों पर बिहार के लोग भरे पड़े हैं। लेकिन क्या ये लोग भोजपुरी फिल्‍में देखते हैं? बिलकुल नहीं। दिल्ली या मुंबई में रह रहे बंगाली तो देखते हैं अपनी भाषा की फिल्‍में। दिल्ली में रहने वाला तमिल आदमी भी देखता है, जब उसकी भाषा की फिल्‍में सिनेमा घरों में लगती हैं। मराठी, कन्नड़, मलयाली, असमिया, उड़‍िया वगैरह सब अपनी भाषा की फिल्‍में देखते हैं, लेकिन बक्सर जिले में रहने वाला एक पढ़ा-लिखा भोजपुरी बोलने वाला इंसान भोजपुरी फिल्‍में नहीं देखता। आश्चर्य है न? क्‍योंकि भोजपुरी भाषा का इस्तेमाल तो अश्लीलता बेचने के लिए किया जा रहा है और अनपढ़-गरीब जनता को और भ्रष्ट बनाया जा रहा है। और उन बनाने वालों से पूछो, तो कहते हैं कि पब्लिक की डिमांड है तो हम बनाते हैं। पब्लिक की “डिमांड” तो बहुत कुछ होगी तो क्या सब करेंगे? नहीं न! आप youtube पर जाइए और एक क्लिक करते ही आपको भोजपुरी के “सुपर हिट” गाने मिलने शुरू हो जाएंगे। कुछ गाने इस प्रकार से हैं, “तनी धीरे धीरे डाला, सील बा… तनी हौले हौले डाला, दुखाता राजाजी…”, “लहंगा उठा देब रिमोट से..”, “सैय्यां लेके बहियां में मारेलन काचा कच कच कच…”, “काहे नाही आये सईयां, रतियां में बोलकर, बईठल रहनी पिछली कोठरिया में खोलकर…” खैर ये एक अंतहीन सूची है।</p>
<p><span style="font-size: large;">आखिर ये कौन लोग है?</span></p>
<p><strong>ज्यादातर</strong> भोजपुरी बोलने वाले लोग हैं। कोई पटना से है, कोई बेतिया, मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, रांची से है। अपने लोग हैं जो अपने जीवन का महत्त्व नहीं समझ रहे हैं, और संस्कृति का सामूहिक रूप से संहार कर रहे हैं। कल्लू नाम का एक 14 वर्षीय बालक, आज भोजपुरी का सबसे प्रसिद्ध गायक है। उसकी उपलब्धि ये है कि उसने भोजपुरी के कुछ सबसे अश्‍लील गाने गाये हैं। उसके परिवार वालों का कहना है कि कल्लू एक निहायत मासूम और अबोध बच्चा है। “लगा दी चोलिया के हुक राजाजी” और “सकेत होता राजाजी” उसकी गायकी के कुछ नायाब नमूने हैं। अधेड़ उम्र के लोग उसके गानों पर नाचते हुए दिख जाएंगे। इस धंधे में ज्यादातर बिहार के ही लोग हैं, जो पैसे के लिए अपनी संस्कृति, अपने लोगों और अपनी आत्मा को बेचते हैं।</p>
<p><strong>आइए जरा</strong> भोजपुरी फिल्मों के इतिहास पर एक नजर डालें। विश्वनाथ शाहबादी ने 1962 में “गंगा मइया तोरे पियरी चढ़इबो” से शुरुआत की थी। इस वक्त तक दूसरे क्षेत्रीय भाषा की फिल्‍मों को आये हुए 30-40 साल हो गये थे और भोजपुरी नया था। लेकिन शुरुआत की फिल्‍मों में भिखारी ठाकुर जैसे लोग खुद नजर आये थे। महेंदर मिसिर के गानों का रस था, निर्गुण पर नृत्य होता था और पूरबी और बिरहा की तान थी। बिदेसिया, लोहा सिंह, लागी नाही छूटे रामा, जैसी कुछ बहुत ही सुंदर और सामाजिक फिल्‍में बनीं। लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे जैसे गायक और चित्रगुप्त जी जैसे संगीतकार थे। वो था बीता हुआ कल।</p>
<p><strong>आज तेलुगु</strong>, तमिल, मलयाली, मराठी इत्यादि भाषाओं की फिल्म राष्ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म समारोहों में जा रही है। ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में भारत की लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषा की फिल्‍में जा चुकी हैं। मराठी सिनेमा के अंदर उमेश कुलकर्णी, केदार शिंदे, तेलुगु में शेखर कमुल्ला, तमिल में मणिरत्‍नम, आमिर सुलतान, मलयालम में अदूर गोपालकृष्णन, कन्नड़ में गिरीश कसारावल्ली, बांग्ला में रितुपर्णो घोष, अपर्णा सेन, गौतम घोष इत्यादि लोग हैं, जिन्होंने अपनी भाषा की फिल्मों को राष्‍ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है, अपनी संस्‍कृति को और सुसज्जित किया है। मैं किसी भी भोजपुरी निर्देशक का नाम नहीं जानता। भोजपुरी वालों की तरह भोजपुरी रूपी अपनी मां का बीच चौराहे पर चीरहरण नहीं किया है। जब भी मैं भोजपुरी के किसी पोस्टर या ट्रेलर को देखता हूं तो ऐसा लगता है जैसे भोजपुरी रूपी मां अपने बच्चो से चीख चीख कर कह रही हो कि मेरा बलात्कार मत करो, मुझे थोड़ी इज्जत दो। लेकिन शायद कोई सुनने वाला नहीं है।</p>
<p><strong>भोजपुरी फिल्मकारों को</strong> क्या हुआ? सच तो ये है कि भोजपुरी में कोई फिल्मकार ही नहीं है। मैं, बिहार के भोजपुर क्षेत्र से आता हूं। चंपारण से भी उतना ही गहरा रिश्ता है। लेकिन मैंने आजतक कोई भी भोजपुरी फिल्म सिनेमाघर में नहीं देखी है। मैं बाकी सारी भाषाओं की फिल्‍में सिनेमाघर में देखता हूं। ये हास्य से ज्यादा दुःख की बात है। कैसे इन फिल्मकारों ने मुझे और करोड़ों पढ़े-लिखे लोगों को भोजपुरी सिनेमा से अलग कर दिया और बिहार और भोजपुरी समाज के आभिजात्य वर्ग ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया। कह देते हैं कि भी हम तो नहीं देखते भोजपुरी, हां घर में बात करते हैं जरूर भोजपुरी में। लेकिन मैं कहता हूं कि “अरे ऐसा बोलने वाले बेवकूफो, छवि तो तुम्हारी ही बन रही है दुनिया के सामने”। आधे बदन के कपड़े पहने वो लड़की कौन है, उस पोस्टर पर? ध्यान से देखो? वही भोजपुरी है। छाती ठोंक कर कहते हैं न आप, डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति थे, उनकी भाषा थी भोजपुरी! भिखारी ठाकुर का नाम तो सुना होगा, उनकी भाषा थी भोजपुरी। मुंशी प्रेमचंद, मंगल पांडे, वीर कुंवर सिंह, जयप्रकाश नारायण, बिस्मिल्लाह खान, शिव नारायण राम गुलाम की भाषा है भोजपुरी! ये हम सबकी मां है। अगली बार अपनी मां को देखिए और दीवार पर लगे उन पोस्टर्स को देखिए। पैसे के लिए तन या मन को बेचने को ही वेश्यावृत्ति कहते हैं। लेकिन…</p>
<p><strong>शर्म उनको</strong> मगर नहीं आती!!!</p>
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		<title>बॉलीवुड में कहानी पर भारी हैं सितारे, चलो ये व्यवस्था बदलें</title>
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		<pubDate>Fri, 31 Dec 2010 06:39:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आमिर खान</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[मोटे तौर पर यह कहानियों का दशक रहा है। इस दौरान दर्शकों की तरफ से नई और अलग तरह की सामग्री की मांग आई और इसी मांग ने इन कहानियों को सफल बना दिया। ऐसी फिल्में जो अलग हटकर थीं, जो कुछ कहती थीं, दिलचस्प ढंग से कहती थीं, जो लीक से हटकर थीं, वे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/aamir-khan1.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/aamir-khan1.jpg" alt="" title="aamir-khan1" width="399" height="279" class="alignright size-full wp-image-21376" /></a>मोटे तौर पर यह कहानियों का दशक रहा है। इस दौरान दर्शकों की तरफ से नई और अलग तरह की सामग्री की मांग आई और इसी मांग ने इन कहानियों को सफल बना दिया। ऐसी फिल्में जो अलग हटकर थीं, जो कुछ कहती थीं, दिलचस्प ढंग से कहती थीं, जो लीक से हटकर थीं, वे सभी सफल हुईं। कहानियों का बोलबाला रहा, जो अच्छी बात है और होना भी यही चाहिए।</p>
<p>वैसे यह शुरुआत 90 के दशक से ही हो गई थी, दर्शक सामान्य कहानियों से बिदकने लगे थे। और मैंने पाया कि नई पीढ़ी अच्छे सिनेमा की ओर जा रही है। इससे भारतीय सिनेमा में एक नई संवेदना जगी और इस दशक में तो वह पूरी तरह जमीन पर उतर आई। आज हम इस दशक के आखिरी वर्ष की संध्या वेला में हैं, इसलिए अब यह सोचने का समय है कि फिल्म उद्योग किस तरफ जा रहा है। मुझे लगता है कि हमें इसके लिए तीन चीजों पर ध्यान देना चाहिए।<span id="more-21375"></span></p>
<p>पहला तो मुझे यह लगता है कि हमें ऐसा माहौल, ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें नौजवान फिल्मकारों को ऐसी छोटी फिल्में बनाने का मौका मिले, जिसमें बड़े स्टार न हों। हमें यह कोशिश करनी होगी कि नई प्रतिभाएं न सिर्फ यहां आएं, बल्कि फलें-फूलें भी। मुझे चिंता इस बात की है कि मौजूदा बाजार वाले माहौल में यह हो नहीं सकता।</p>
<p>दर्शक तो ऐसी फिल्मों के लिए पहले से ही तैयार हैं, लेकिन बाजार की उस व्यवस्था को बदलना होगा जो स्टारकास्ट पर ही सारा ध्यान देती है। जब एक फिल्मकार फिल्म बना रहा हो, तो उसके दिमाग पर यह डर हावी नहीं होना चाहिए कि उसकी फिल्म में बड़े स्टार नहीं हैं, इसलिए इसे कौन खरीदगा, कौन इसका वितरण करेगा और कौन इसे दिखाएगा? हमारे पास ऐसे स्टूडियो तो हैं जो नए फिल्मकारों को प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन हमें ऐसे मल्टीप्लैक्स भी चाहिए जो ऐसी फिल्मों को दिखाएं।</p>
<p>बल्कि मुझे तो लगता है कि मल्टीप्लैक्स को छोटी फिल्मों को ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिए। अभी तक जो व्यवस्था है वह बड़ी फिल्मों की तरफ ज्यादा झुकी हुई है। ऐसे माहौल में छोटी फिल्म के लिए सफलता का कोई मौका नहीं है। छोटी फिल्म को सारा प्रचार एक दूसरे की बातचीत और कहने-सुनने से ही मिलता है, अगर इन्हें ज्यादा समय न मिले तो इनके पास आर्थिक रूप से कामयाब होने का मौका आएगा। इनमें ताजा दौर की वे फिल्में भी हैं, जिन्हें लोग सिर्फ जज्बे की वजह से बना रहे हैं।</p>
<p>हमें सिर्फ आंकड़ों पर ध्यान नहीं देना होगा, क्योंकि इसका तो मतलब होगा बहुत छोटी दूरी की सोच। अभी तो यह है कि अगर मैं एक छोटी फिल्म बनाऊं तो मैं सोचूंगा कि यह फिल्म दिखाई कहां जाएगी? इसके कितने शो होंगे? किन शर्तो पर? तीन दिन बाद ही फिल्म को सिनेमा हॉल के बाहर कर दिया जाएगा। नौजवान प्रतिभाएं चाहती हैं कि उनकी फिल्म को कम से कम इतना समय तो मिले कि लोग उसे देख सकें। यहां मैं उन सारी प्रतिभाओं की बात कर रहा हूं जो अभिनेता हैं, निर्माता हैं, निर्देशक हैं या लेखक हैं।</p>
<p>दूसरी बात यह है कि नौजवान प्रतिभाओं को अपनी फिल्म की आर्थिक कामयाबी या नाकामी की जिम्मेदारी भी खुद ही लेनी होती है। जिन्होंने इस कारोबार में खासा नाम कमा लिया है और लोग उनकी साख के कारण उनकी फिल्म देखने आते हैं, उन्हें यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी चाहिए। अगर फिल्म चल जाती है तो उसकी कमाई पर आपका अधिकार है, नहीं चलती तो घाटा भी झेलना ही होगा।</p>
<p>काम की गुणवत्ता का जज्बा हममें होना चाहिए। हमने अगर अपने काम के कारण उद्योग में अपनी जगह बना ली है, और अपनी मर्जी के हिसाब से काम की आजादी चाहते हैं तो हमें यह जिम्मेदारी लेनी ही होगी। बदकिस्मती से बहुत सारे सितारे ऐसे हैं जो अपने काम के लिए भारी कीमत चाहते हैं। मेरा कहना है कि वे ऐसी परियोजनाओं की लागत न बढ़ाएं।</p>
<p>तीसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपने लेखकों को ज्यादा महत्व देना चाहिए। इसे मैं पिछले कई साल से कह रहा हूं। जब तक हम यह नहीं करते हम बहुत महान फिल्में बनाने की उम्मीद नहीं रख सकते। उन्हें ज्यादा पैसे दीजिए, उनमें निवेश कीजिए और फिर उनसे महान काम मांगिए। इस निवेश के फल आपको तुरंत नहीं मिलेंगे, लेकिन आप इससे दीर्घकालिक फायदों की नींव जरूर रख देंगे।</p>
<p>मानवीय संवेदनाएं हमारे पास सदियों से हैं। उनकी नए ढंग से व्याख्या करना ही लेखन का काम है। पर आपको ईमानदार होना पड़ेगा। ईमानदारी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है। बॉक्स आफिस की बात तो इसके बाद शुरू होती है।</p>
<p>मेरे हिसाब से एक अच्छी कहानी में एक मजबूत और स्पष्ट धारणा होनी चाहिए, साथ ही चाहिए तुरंत शुरू हो जाने वाला एक जोरदार अंतर्विरोध, जो कहानी को लक्ष्य की ओर ले जाए, दिलचस्प चरित्र, दिलचस्प अंतर्कथाएं और एक ऐसा अंत जो कहानी की धारणा को पुष्ट करता हो। पर सबसे बड़ी बात है कि अच्छी कहानी के कड़े नियम नहीं होते हैं। </p>
<p>फिल्म बनाना कहानी कहना ही है, लेकिन अगर आप एक ही कहानी को हर रोज कहेंगे तो वह कितनी दिलचस्प रह जाएगी? इस उद्योग की फितरत ही ऐसी है कि आपको कुछ नया देना ही होगा। यह कोई टूथपेस्ट नहीं है, कुछ नया कहना ही होगा। हममें से ज्यादातर को पता है कि कहना क्या है, दिक्कत यह है कि हम कामयाब की ओर देखते हैं और वही कहानी बार-बार कहते हैं।</p>
<p>धन्यवाद उन लेखकों का जिन्होंने एक सिरे से नई चीज रची। उनका काम ज्यादा मुश्किल है। मैं अभिनेता हूं, मैं दस बजे पहुंचता हूं और मेरे पास कई पटकथाओं में से चुनने की आजादी होती है। लेखकों और निर्देशकों को एक सिरे से यह काम शुरू करना होता है। मेरा काम इतना कठिन नहीं है। और अंत में इतना ही कि अगर हम नौजवान प्रतिभाओं को आगे लाते हैं, तो इससे विविधता आएगी। इस उद्योग की स्वस्थ तरक्की के लिए यह बहुत जरूरी है।</p>
<p><strong>((साभार- आमिर खान का ये लेख आज हिंदुस्तान में छपा है और इसकी प्रस्तुति नवीन कुमार ने की है।)) </strong> </p>
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		<title>भोजपुरी सिनेमा की पहली कथा यहां है, आप दूसरी कहें</title>
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		<pubDate>Fri, 31 Dec 2010 06:13:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक रंजन</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[रागरंग]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[यह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन दस्‍तावेजी है, क्‍योंकि इसके पन्‍ने पीले पड़ चुके हैं। भोजपुरी फिल्‍मों का बाजार तो बन गया है, लेकिन जैसा कि समय के दस्‍तावेजीकरण का दुख सब जगह पसरा हुआ है, भोजपुरी भी इससे अछूता नहीं है। कुछ समय पहले वरिष्‍ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने अपने फेसबुक पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>यह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन दस्‍तावेजी है, क्‍योंकि इसके पन्‍ने पीले पड़ चुके हैं। भोजपुरी फिल्‍मों का बाजार तो बन गया है, लेकिन जैसा कि समय के दस्‍तावेजीकरण का दुख सब जगह पसरा हुआ है, भोजपुरी भी इससे अछूता नहीं है। कुछ समय पहले वरिष्‍ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने अपने फेसबुक पर भोजपुरी के पहले सिनेमा की कहानी का यह पहला पन्‍ना जारी किया था। उनकी टिप्‍पणी थी&#8230;</em></p>
<p><em></p>
<div style="padding-right: 15px; padding-left: 15px; float: right; padding-bottom: 3px; margin: 5px; width: 530px; line-height: 165%; padding-top: 3px; border: #127312 0px solid;">कल भोजपुरी के मौखिक इतिहासकार आलोक रंजन के साथ बैठक हुई। पच्‍चीस साल पहले उनके लिखे एक पायनियर लेख का पहला पृष्‍ठ&#8230; क्‍या आप नहीं चाहेंगे कि वे भोजपुरी फिल्‍मों का कालक्रमिक इतिहास लिखें? प्‍लीज, उनसे आग्रह करें कि वे इस इतिहास को लिपिबद्ध करें।</div>
<p></em><em><span style="color: #c0c0c0;">-</span><br /> <br />
आलोक जी इतिहास तो जरूर लिखें, लेकिन आप तमाम पाठकों से भी अनुरोध है कि भोजपुरी फिल्‍मों के जो छुपे हुए या कम जाने पन्‍ने आपलोगों के पास पड़े हुए हैं, उन्हें हमारे साथ जनतंत्र पर साझा करें। हम इसे प्रिंट वर्जन में भी लाएंगे : <strong>मॉडरेटर</strong></em></p>
</blockquote>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo.jpg" alt="" title="ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo" width="300" height="301" class="alignright size-full wp-image-21381" /></a>
<p><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times, serif, Georgia;">19</span>87, यानी भोजपुरी फिल्‍मों का रजत जयंती वर्ष। 24 वर्षों की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय करने के बाद भोजपुरी फिल्‍में आज उस सुखद ऐतिहासिक स्थिति में पहुंच गयी है, जहां उसके सांस्‍कृतिक अस्तित्‍व और व्‍यावसायिक महत्‍व से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन इसी फिल्‍म महानगरी में पांचवें दशक के अंत तक किसी को इस बात का यकीन नहीं था कि उत्तर पूर्व भारत की इस लोकप्रिय बोली में कभी किसी फिल्‍म का निर्माण भी किया जा सकता है। इस शंका और अविश्‍वास के पीछे मूल रूप से यही धारणा काम कर रही थी कि भोजपुरी एक ऐसी ग्रामीण बोली है, जो लोकगीतों और धुनों के लिहाज से तो बेशक समृद्ध है, परंतु, सामाजिक संदर्भ में बातचीत के दौरान जिसका इस्तेमाल व्‍यक्ति को फूहड़ और गंवार ही जाहिर करता है। भोजपुरी की सांस्‍कृतिक परंपराओं एवं इसके प्रकाशित साहित्‍य से अनजान होने की अज्ञानता इस अधकचरी जानकारी की मूल वजह थी। उस वक्‍त किसी से भोजपुरी फिल्‍म निर्माण की संभावना पर विचार करने कहना भी एक तरह से अपना माखौल उड़वाना ही था। इसलिए वैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में इस नयी भाषा में फिल्‍म बनाने की कोशिश वही शख्‍स कर सकता था, जिसे एक तरफ जहां इसकी संस्‍कृति और परंपरा से गहरा लगाव हो, वहीं दूसरी ओर इसके परिवेश और संस्‍कारों के साथ उसकी गहरी आत्‍मीयता भी हो। सौभाग्‍य से हिंदी फिल्‍मोद्योग में तब तक कुछ ऐसी प्रतिभाओं ने अपनी पुख्‍ता पहचान बना ली थी। ऐसे लोगों में सर्वाध‍िक चर्चित व्‍यक्तित्‍व था, गाजीपुर निवासी नजीर हुसैन का। वे सिर से पांव तक भोजपुरी के संस्‍कारशील रंगों में रंगे हुए थे। भोजपुरी उनकी मातृभाषा थी और उन्‍हें अपनी इस बोली तथा इसकी सांस्‍कृतिक परंपराओं से वैसा ही सच्‍चा, गहरा लगाव था, जैसा मां-बेटे के पवित्र, नि:स्‍वार्थ संबंध में होता है।</p>
<p><span style="font-size: large;">जद्दनबाई की दस्‍तक</span></p>
<p><strong>यों</strong>, ऐतिहासिक तथ्‍यों की दृष्टि से भोजपुरी फिल्‍म का ख्‍याल सबसे पहले जिसके जहन में आया, वह शख्‍सीयत थी अपने वक्‍त की अजीम फिल्‍मी हस्‍ती और मशहूर अदाकारा नरगिस की मां जद्दनबाई। हिंदी फिल्‍मों में पूरबी गीत-संगीत तथा संवादों के व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍याप्‍त इसकी लोकप्रियता ने जद्दनबाई के दिल में यह कसक पैदा कर दी थी कि उनकी इस अपनी मीठी-शोख बोली में कोई फिल्‍म क्‍यों नहं बनती है? जब अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्‍में बनायी जा सकती हैं, तब भोजपुरी जैसी विस्‍तृत क्षत्र में बोली-समझी जाने वाली भाषा में फिल्‍म क्‍यों नहीं बनायी जा सकती है? इसी कसक से उद्वेलित होकर वे अपने संपर्क में आये हर भोजपुरी बोलने, समझने वाले फिल्‍मकर्मी को इस बाबत प्रेरित करती रहती थीं। वे समझाती थीं कि भोजपुरी बोलने और समझने वाले तो तकरीबन संपूर्ण हिंदी प्रदेशों में कमोबेश फैले हुए हैं। इसलिए आर्थिक दृष्टि से भी यह सौदा घाटे का नहीं होगा। जरूरत महज इस बात की है कि कोई साहसी, धैर्यवान और मेहनती आदमी इस ओर पहल करे। जद्दनबाई के अलावा विशुद्ध बनारसी और विलक्षण प्रतिभाशाली कलाकार कन्‍हैयालाल भी इस दिशा में पांव आगे बढ़ाने के लिए लोगों को प्रेरित करते रहे। फिल्‍म बनाने के मुताबिक ये दोनों अगर व्‍यावहारिक स्‍तर पर स्‍वयं कोई सार्थक कोशिश नहीं कर पाये तो इसकी एकमात्र वजह थी, इनकी निजी सीमाएं और उम्रगत विवशताएं।</p>
<p><span style="font-size: large;">ख्‍वाब को हकीकत में बदलने की तड़प</span></p>
<p><strong>जद्दनबाई</strong> और कन्‍हैयालाल ने उत्‍प्रेरक की भूमिका निभाते हुए चाहे चंद लोगों को ही सही, पर इस ओर कम से कम सोचने को बाध्‍य तो कर ही दिया। तब इन्‍हें पता नहीं था कि भोजपुरी में फिल्‍म निर्माण का जो खयाल इनकी आंखों में किसी सुनहरे ख्‍वाब की शक्‍ल में बसा हुआ था, उसे हकीकत में तब्‍दील करने के लिए भोजपुरी मिट्टी का एक सच्‍चा सपूत बहुत जल्‍द ही अपनी कमर कस कर निकल पड़ेगा। वह शख्‍स, जिसके पूरे वजूद को इस खयाल ने रूहानी और जिस्‍मानी दोनों तौर पर बेहद बेचैन और परेशान कर रखा था, उसका नाम था, नजीर हुसैन। उन्‍हें भोजपुरी फिल्‍म बनाने की प्रेरणा देशरत्‍न डॉ राजेंद्र प्रसाद के सान्निध्‍य से मिली थी। सबसे पहले उन्‍होंने राजेंद्र बाबू के समक्ष जब अपना यह विचार प्रकट किया था, तब देशरत्‍न ने कहा था, &#8220;बात तs बहुत नीक बा, बाकी एकरा ला बहुत हिम्‍मत चाहीं। ओतना हिम्‍मत होखे तs जरूर बनाईं।&#8221; राजेंद्र बाबू की इसी बात ने जल्‍दी से जल्‍दी भोजपुरी फिल्‍म बनाने के लिए उन्‍हें परेशान कर रखा था।</p>
<p><strong>नजीर साहब</strong> हिंदी फिल्‍मों के मशहूर चरित्र अभिनेता होने के साथ साथ एक संवेदनशील लेखक भी थे। ग्रामीण पृ‍ष्‍ठभूमि से संबंधित होने के कारण उन्‍होंने भोजपुरी भाषी क्षेत्रों की विवश स्थितियों और सामाजिक समस्‍याओं को न सिर्फ करीब से देखा-परखा था बल्कि अंदरूनी तौर पर उनकी तपिश भी महसूस की थी। इसी तपिश को उन्‍होंने एक ऐसी कहानी के सांचे में ढाला था, जो उनकी जुबान से सुनने पर कहानी नहीं वरन भोजपुरी इलाकों को साफ, सच्‍ची और जीती जागती तस्‍वीर मालूम पड़ती थी। इसके ग्राम्‍यबोध के कारण वे इसे भोजपुरी में ही बनाने को संकल्पित थे। इसी भावना के साथ उन्‍होंने यह कहानी कई निर्माताओं को सुनायी। कई लोग हिंदी में इसके फिल्‍मांकन के लिए तैयार हो गये लेकिन, भोजपुरी जैसी नयी भाषा में फिल्‍म बनाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। सब की नजरों में यह एक जोखिम भरा काम था। जहां लीक पीटने की प्रवृत्ति कई दशकों से स्‍वभाव और संस्‍कार में शामिल हो चुकी हो, वहां एक नयी लीक गढ़ने में ऐसी मुश्किलों से वास्‍ता पड़ना बहुत सहज-सामान्‍य बात ही थी। इसी कारण हर ओर से मिलती निराशा के बावजूद नजीर साहब हताश नहीं हुए। विमल राय जैसे ख्‍यातिलब्‍ध निर्देशक ने उस कहानी पर हिंदी फिल्‍म बनाने की पेशकश की पर, इस सम्‍मानजनक प्रस्‍ताव की कद्र करते हुए भी उन्‍होंने अपना इरादा बदस्‍तूर बरकरार रखा। पता नहीं किस आत्मिक शक्ति की वजह से उन्‍हें बराबर यह यकीन बना रहा कि कभी न कभी तो कोई ऐसा व्‍यक्ति मिलेगा, जो उन्‍हीं की तरह बुलंद हौसलेवाला सच्‍चा भोजपुरिया होगा। नतीजन वे अपनी जिद पर अड़े रहे कि, इ फिलिमिया चाहे जहिया बनी, बाकी बनी तs भोजपुरिये में।</p>
<p><strong>वक्‍त की रफ्तार</strong> के साथ-साथ निर्माता ढूंढ़ने की कोशिश भी अनवरत आगे बढ़ती रही। यह एक ऐसी अंधेरी यात्रा थी, जिसकी सुबह कब, कैसे और कहां होगी, सिवा ऊपरवाले के और किसी को इसकी कोई खबर नहीं थी। चारों ओर बस एक दर्दीला सन्‍नाटा पसरा हुआ था। ऐसे अंधेरे सफर में नजीर साहब के हमसफर बने असीम कुमार, जो तब हिंदी फिल्‍मों के एक नामचीन अदाकार हो चुके थे। बनारसी होने और विमल राय की कई फिल्‍मों में साथ काम करने के कारण इन दोनों में अच्छी नजदीकी कायम हो गयी थी। नजीर साहब ने अपनी इस भावी फिल्‍म में उन्‍हें हीरो बनाने का फैसला भी कर लिया था। उन दिनों अपनी हर मुलाकात में वे असीम कुमार को कहते, &#8220;अरे असीमवा! कोई मिल जाय त कइसहुं इ फिलिमिया बना लीहीं&#8230;&#8221; निर्माता तो खैर वर्षों तक नहीं मिला, पर इसी दरम्‍यान नजीर हुसैन से मिलने एक ऐसे सज्‍जन आये जो जद्दनबाई से प्रेरित होकर खुद ही भोजपुरी फिल्‍म के सूत्रधार बनने के कल्‍पनालोक में पूरी तरह खोये हुए थे। ये थे, मुंगेर, बिहारवासी बच्‍चा लाल पटेल। यों तो पटेल ने लंकादहन जैसी कुछ पौराणिक फिल्‍मों में अभिनय भी किया था लेकिन मूलत: वे फिल्‍मों के निर्माण-प्रबंधन, नियंत्रण और वितरण कार्यों से संबंधित थे। इसलिए बिहार, बंगाल के कई फिल्‍म वितरकों से उनकी अच्‍छी-खासी जान-पहचान थी। फिल्‍मोद्योग में नजीर साहब की कहानी की चर्चा ही उन्‍हें उन तक खींच लायी थी। उन्‍होंने कहानी सुनी और पसंद भी कर ली। बावजूद इसके बात आगे नहीं बढ़ पायी, क्‍योंकि पूरी फिल्‍म बनाने लायक पूंजी पटेल के पास भी नहीं थी। लेकिन वे एक जुगाड़ी आदमी थे और उन्‍हें अपनी इस प्रतिभा पर पूरा ऐतबार था। लिहाजा नजीर साहब को आश्‍वस्‍त कर वे अपने ढंग से किसी ऐसे पूंजीदाता की तलाश में लग गये जो इस मुतल्लिक उनकी सहायता कर सके। इस आशावादी मुलाकात से रोमांचित हुए बगैर नजीर हुसैन आगे की यात्रा तय करते रहे क्‍योंकि फिल्‍मोद्योग के अपने पुराने अनुभवों से वे जान चुके थे कि यहां जब तक कुछ घटित न हो जाए, तब तक उसका भरोसा नहीं किया जा सकता।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/Bhojpuri-Cinema-First-Page.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/Bhojpuri-Cinema-First-Page-225x300.jpg" alt="" title="Bhojpuri-Cinema-First-Page" width="225" height="300" class="alignright size-medium wp-image-21382" /></a>
<p><span style="font-size: large;">योगदान &#8220;गंगा जमुना&#8221; का</span></p>
<p><strong>वक्‍त</strong> गुजरता रहा और उसके साथ ही नजीर साहब की अंदरूनी छटपटाहट बढ़ती रही। अब तक असीम कुमार भी निर्माता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक चुके थे। अब हर पल मन में बस यही कामना कसकती रहती कि कहीं से कोई फरिश्‍ता आये और इस अंतहीन मानसिक चिंता से उन्‍हें उबार ले। नजीर साहब को शुरू से ही इसका पक्‍का विश्‍वास था कि जिस दिन उनकी कहानी उनके मिजाज से फिल्‍मांकित होकर भोजपुरी क्षेत्रों के सिनेमाघरों के पर्दों तक पहुंच जाएगा, लोग इसे जरूर पसंद करेंगे और तब भोजपुरी फिल्‍मों का बंद पड़ा निर्माण द्वार जरूर खुल जाएगा। एक ओर था इतना प्रबल आत्‍‍मविश्‍वास और दूसरी ओर कड़वे यथार्थ की मटमैली, रूखी और निराशाजनक सच्‍चाइयां! फिर भी अपनी स्‍पष्‍ट सोच के साथ तमाम नाकामयाबियों को झेलते और सहते हुए वे आगे बढ़ते ही रहे। तब उन्‍हें क्‍या पता था कि हमेशा की तरह वे जिस एक और फिल्‍म में अभिनय करने जा रहे हैं, वही कल को भोजपुरी फिल्‍मों के निर्माण की नींव बनने में सहायक सिद्ध होगी और उसी से एक नये भविष्‍य की पृष्‍ठभूमि तैयार होगी। यह फिल्‍म थी &#8220;गंगा जमुना&#8221; और इसके निर्माता थे अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के भाई नारिस खां।</p>
<p><strong>&#8220;गंगा जमुना&#8221;</strong> एक ऐसी फिल्‍म थी, जिसमें पूरेपन में अवधी संवादों का व्‍यवहार किया गया था। हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था। संगीत निर्देशक नौशाद की सूझ, प्रेरणा, जिद और सहयोग की वजह से ही अवधी से पूर्णरूपेण प्रभावित इस पहली हिंदी फिल्‍म का निर्माण संभव हो पाया था। फिल्‍म और फिल्‍म संगीत, दोनों ही दृष्टि से &#8220;गंगा जमुना&#8221; सुपरहिट रही। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इसकी ईर्ष्‍याजनक व्‍यावसायिक सफलता ने पहली बार विश्‍वास उत्‍पन्‍न किया कि अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं की तरह उत्तर भारतीय बोलियों-भाषाओं में भी फिल्‍में बनायी जा सकती हैं। तब इस संदर्भ में चर्चाओं और बहस-मुबाहिसों का बाजार काफी गर्म हो उठा। परंतु तमाम गहमागहमी के बावजूद बंबई फिल्‍मोद्योग का कोई निर्माता एक नयी राह गढ़ने की हिम्‍मत नहीं जुटा सका। यह हिम्‍मत और हिमाकत जिस शख्‍स ने की, वह बंबई से लगभग दो हजार किलोमीटर दूर गिरिडीह, बिहार में कोयला खानों के व्‍यवसाय से संबंधित था और उसे तब फिल्‍म निर्माण का कोई अनुभव नहीं था। बंधुछपरा, शाहाबाद (बिहार) निवासी इस दिलेर हस्‍ती का नाम था, विश्‍वनाथ प्रसाद शाहाबादी।</p>
<p><strong>शाहाबादी</strong> एक पक्‍के भोजपुरिया थे। तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के व्‍यक्तित्‍व ने उन पर भी काफी गहरा प्रभाव डाला था। राजेंद्र बाबू की आदत थी कि जब भी कोई भोजपुरी भाषी उनसे मिलता, वे बगैर किसी संकोच या हिचक के स्‍वयं ही भोजपुरी में बात करना शुरू कर देते थे। भारत के प्रथम नागरिक होने का आभिजात्‍य या गौरव इस भाषाप्रेम में कभी उनके आड़े नहीं आया। वैसे भी सरलता, सहजता और सादगी तो देशरत्‍न की बहुचर्चित विशिष्‍टताएं थीं हीं, परंतु इन सबसे ज्‍यादा उनके भाषाप्रेम ने शाहाबादी को मन की भीतरी तहों तक अभिभूत कर रखा था। इसीलिए उनके हृदय में भी अपनी इस भाषा के सम्‍मान और विकास के लिए कुछ सार्थक काम कर गुजरने की आकांक्षा काफी भीतर तक पैठ चुकी थी। तलाश थी तो सिर्फ उचित अवसर और अनुकूल परिवेश की। संयोगवश गगा जमुना की सफलता ने उनकी इस आकांक्षा को फलीभूत करने के लिए सही स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी।</p>
<p><span style="font-size: large;">सपने साकार हुए</span></p>
<p><strong>1961</strong> के वर्षांत में शाहाबादी अपने एक मित्र के साथ जब बंबई आये, तब बच्‍चा लाल पटेल द्वारा उन्‍हें नजीर हुसैन की कहानी और भावी भोजपुरी फिल्‍म की योजना के बारे में पता चला। अपनी आंतरिक आकांक्षा के कारण सहज ही इस योजना में उनकी गंभीर रुचि उत्‍पन्‍न हो गयी। चूंकि &#8220;गंगा जमुना&#8221; की सफलता ने पहले से ही उन्‍हें उद्वेलित कर रखा , इसलिए इस संदर्भ में निर्णय लेने में उन्‍हें देर नहीं लगी। उस वक्‍त फिल्‍मोद्योग की कई अनुभवी हस्तियों ने उनकी अनुभवहीन स्थिति देखते हुए इस बाबत काफी रोका-टोका। लोगों ने समझाया कि पहली बार निर्माण क्षेत्र में प्रवेश करने के साथ ही इतना बड़ा खतरा मोल लेना उनके पूरे भविष्‍य को अंधेरे में डुबो सकता है, परंतु अपने भाषाप्रेम के कारण शाहाबादी इन फिल्‍मी नसीहतों से बेअसर रहे। नफा-नुकसान की परवाह किये बगैर उन्‍होंने फिल्‍म निर्माण की शुरुआत के लिए नजीर हुसैन को हरी झंडी दिखा दी।</p>
<p><strong>जनवरी 1961</strong> में इस प्रथम भोजपुरी फिल्‍म के निर्माण की आरंभिक तैयारियां नजीर हुसैन के मार्गदर्शन में शुरू हुई। फिल्‍म का नाम रखा गया, &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221;। असीम कुमार, बच्‍चालाल पटेल, रामायण तिवारी और भगवान सिन्‍हा जैसे हिंदी फिल्‍मों से जुड़े भोजपुरीभाषियों ने इस पवित्र यज्ञ को सकुशल संपन्‍न कराने के लिए अथक परिश्रम किया। आपसी सहयोग के आधार पर इन सबों ने उत्तर भारतीय फिल्‍मकर्मियों की एक सूची तैयार कर कलाकारों और तकनीशियनों का चयन किया। इसी आधार पर निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार का नाम तय हुआ। चूंकि लेखक नजीर हुसैन की स्क्रिप्‍ट पहले से ही पूरी तरह तैयार थी, इसलिए शेष तैयारियों के बाद शाहाबादी और कुंदन कुमार ने तुरंत ही शूटिंग शुरू कर देने का फैसला कर लिया। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्‍मारक पर फिल्‍म का मुहूर्त समारोह संपन्‍न हुआ और अगले दिन से शूटिंग शुरू हो गयी। फिल्‍म से संबंधित सारे लोगों ने समर्पण की भावना के साथ अपना-अपना योगदान दिया। इस सम्मिलित, समर्पित प्रयास का ही नतीजा था कि समय-समय पर आयी आर्थिक रुकावटों के बावजूद निर्माण की गति में कभी शिथिलता नहीं आयी। पहले से निर्धारित बजट से कुल खर्च काफी ज्‍यादा बढ़ गया, पर शाहाबादी ने इस पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ा और फिल्‍म के निर्माण स्‍तर के साथ कोई गलत समझौता नहीं किया। निर्माण की सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद अंतत: 1962 के वर्षांत में यह फिल्‍म सबसे पहले बनारस के प्रकाश टॉकीज में प्रदर्शित हुई। अगले सप्‍ताह ही वहां आलम यह हो गया कि दूरदराज के गांव, कस्‍बों और शहरों से लोग खाना-पीना साथ लेकर बनारस पहुंचने लगे। थिएटर के बाहर मेले का दृश्‍य उपस्थित हो गया और एक नयी कहावत चल पड़ी, &#8220;गंगा, नहाs, बिसनाथ दरसन करs, गंगा मइया&#8230; देखs, तब घरे जा&#8230; !&#8221;</p>
<p><strong>प्रदर्शन के</strong> कुछ ही दिनों बाद &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221; ने क्षेत्रीय फिल्‍मों की सफलता के इतिहास में एक उज्‍ज्‍वल, अनछुआ और स्‍वर्णिम पृष्‍ठ जोड़ दिया। इसके द्वारा भोजपुरी भाषी इलाकों में व्‍याप्‍त दहेज, बेमेल विवाह, नशेबाजी, सामंती संस्‍कारों तथा अंधविश्‍वासी परंपराओं से उत्‍पन्‍न सामाजिक समस्‍याओं का ऐसा सही और संवेदनशील चित्र उपस्थित हुआ कि दर्शकों को यह महज फिल्‍म नहीं बल्कि अपनी ही जिंदगी की अनकही कहानी लगी। इस फिल्‍म से दर्शकों का आत्‍मीय संबंध कायम करने में सबसे अहम भूमिका रही गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार चित्रगुप्‍त की। &#8220;काहे बंसुरिया बजवले&#8221;, &#8220;सोनवां के पिंजरा में बंद भइल हाय राम&#8221;, &#8220;मोरी कुसुमी रे चुनरिया इतर गमके&#8221;, &#8220;अब हम कइसे चलीं डगरिया&#8221; तथा &#8220;हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो संइया से कर दे मिलनवा&#8221; जैसे भोजपुरी लोकसंगीत के रस में डूबे मीठे, दर्दीले और शोख गीतों ने कुछ ऐसा समां बांधा कि वर्षों तक हर ओर बस &#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221; की ही गूंज रही। आज भी इन गीतों का जादू बिल्‍कुल उसी तरह बरकरार है, जैसा तब था।</p>
<p><span style="font-size: large;">उज्‍ज्‍वल भविष्‍य की ओर</span></p>
<p><strong>यह सच है</strong> कि नजीर हुसैन, रामायण तिवारी, लीला मिश्रा, शैलेंद्र, चित्रगुप्‍त, असीम कुमार और कुमकुम के फिल्‍म कैरियर की शुरुआत हिंदी फिल्‍मों से हुई थी और वहां अपनी अपनी सीमाओं में उनकी सुदृढ़ व्‍यावसायिक पहचान भी बनी हुई थी, बावजूद इसके यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन्‍हें सम्‍मान और सफलता की जो ऊंचाई भोजपुरी फिल्‍मों से मिली, वह हिंदी फिल्‍मों से बढ़चढ़ कर ही रही। कम से कम नजीर हुसैन, तिवारी, चित्रगुप्‍त, असीम कुमार और कुमकुम के संदर्भ में तो यह बात पूरे विश्‍वास के साथ कही जा सकती है। ये सभी भोजपुरी के स्‍टार, सुपर स्‍टार रहे। असीम कुमार और कुमकुम आज भले ही पर्दे पर दिखाई न पड़ें, पर एक वक्‍त था जब यह जोड़ी दिलीप कुमार-मीना कुमारी और राजकपूर-नर्गिस की तरह ही दर्शकों में लोकप्रिय थी। चित्रगुप्‍त तो आज भी भोजपुरी के अकेले सिरमौर संगीत निर्देशक हैं, जिन्‍होंने सबसे ज्‍यादा हिट फिल्‍में दी हैं। इन सबों को सफलता के शीर्ष की छुअन का सुख हासिल कराने में सबसे महत्‍वपूर्ण योगदान &#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221; का ही रहा, क्‍योंकि उसी ने भोजपुरी फिल्‍मों के निर्माण द्वार को पहले पहल खोला और एक नये भविष्‍य की रचना की। कुमारी पद्मा के रूप में जो नवोदित प्रतिभ वहां पहली बार पर्दे पर अव‍तरित हुई थी, आज वही पद्मा खन्‍ना बन कर उपलब्धियों के एक विस्‍तृत आकाश को अपने दामन में समेट चुकी है। हिंदी में जो स्‍थान नर्गिस या मधुबाला का रहा है, भोजपुरी में अपनी वैसी ही जगह बनाने के बाद पद्मा खन्‍ना एक भावप्रवण नर्तकी और अविस्‍मरणीय अभिनेत्री के रूप में आज भी सक्रिय है।</p>
<p><strong>&#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221;</strong> के विषय में फिल्‍म इतिहासकार फिरोज रंगूनवाला ने अपनी पुस्‍तक <strong>A Pictorial History of Indian Cinema</strong> में लिखा है -</p>
<blockquote><p><em>Directed by Kundan Kumar, the film was a typical romantic melodrama but the novelty of its language and folk music made it such a sensational hit that it let loose a flood of films in this and its sister dialects.</em></p>
<p><em> </em><em>For a time, the industry had its Bhojpuri Craze (like any other phase that succeds by success). About 18 films were made up until 1966 and one Avadhi in 1964, two Chettisgadhi after 1965 and two Magadhi in 1964-65.</em></p>
</blockquote>
<p><strong>अपनी अन्‍य</strong> विशिष्‍टताओं के अलावा &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221; की चरम उपलब्धि यह रही कि सिर्फ भोजपुरी ही नहीं बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्‍यप्रदेश की अन्‍य आंचलिक बोलियों-भाषाओं में भी फिल्‍म निर्माण की प्रवृत्ति को इसने प्रेरित तथा उत्‍साहित किया।</p>
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		<title>गालिब की जयंती पर उर्दू समाज को सहारा का तोहफा</title>
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		<pubDate>Tue, 28 Dec 2010 05:55:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविनाश दास</dc:creator>
				<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[उर्दू हमारे लिए मजहब नहीं, संस्‍कृति है : ओपी श्रीवास्‍तव, उपप्रबंधक, सहारा इंडिया ♦ अविनाश एक तो शरद के उफान वाले दिन, जिसमें रजाई से निकलने में भी आलस्‍य आता है &#8211; उसमें नहाना तो हर दिन टालना ही पड़ता है। कोई बहुत जरूरी मीटिंग या महफिल न हो, तो चीकट आदमी की तरह दिल्‍ली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: large;"><span style="color: #339966;">उर्दू हमारे लिए मजहब नहीं, संस्‍कृति है :</span> <span style="color: #008000;">ओपी श्रीवास्‍तव,</span> <span style="color: #339966;"><em>उपप्रबंधक, सहारा इंडिया</em></span></span></p>
<p><strong>♦ अविनाश</strong></p>
<p><span style="float:left;color:#000000;font-size:40px;line-height:35px;padding-top:3px; padding-right:3px;font-family: Times, serif, Georgia;">ए</span>क तो शरद के उफान वाले दिन, जिसमें रजाई से निकलने में भी आलस्‍य आता है &#8211; उसमें नहाना तो हर दिन टालना ही पड़ता है। कोई बहुत जरूरी मीटिंग या महफिल न हो, तो चीकट आदमी की तरह दिल्‍ली की सड़कों पर निकलने में कोई हर्ज नहीं है। झूठे आत्‍मविश्‍वास के लिए इस मुश्किल काम को करने का कोई मतलब नहीं।</p>
<p><strong>27 दिसंबर</strong> को नहाना टालते हुए तीसरा दिन था और कुछ काम निपटाने यूं ही निकल पड़े थे कि शाम चार बजे के आसपास सहारा से रीतेश का फोन आया, आज शाम आ रहे हैं न। यह रीतेश का अपना अंदाज है &#8211; पहले आगमन तय कर देते हैं, फिर उद्देश्‍य बताते हैं। उन्‍होंने बताया कि आज उर्दू के पहले न्‍यूज चैनल आलमी सहारा की लॉन्चिंग पार्टी है, ली मेरिडियन होटल में। हमने कह तो दिया कि आ जाएंगे लेकिन जब खुद पर नजर पड़ी, तो तीन दिन पुरानी देह, तीन दिन पुराना कपड़ा और तीन दिन के बेपॉलिश जूते मुझ पर हंसते हुए नजर आये।</p>
<p><strong>हमने ठान लिया</strong>, महान और पवित्र सभ्‍यताओं की ऐसी की तैसी &#8211; हम ऐसे ही जाएंगे।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010001.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010001-1024x768.jpg" alt="" title="मुनव्वर राना" width="623" height="467" class="aligncenter size-large wp-image-21366" /></a></p>
<p><strong>ली मेरिडियन</strong> में पहला ही माहौल अनौपचारिक मिल गया, जब अपने सबसे अजीज शायर मुनव्‍वर राना किसी के हाथों का सहारा लेकर खड़े मिल गये। मैंने उन्‍हें पहली बार 2006 में सुना था और उसके बाद उनसे इस कदर दोस्‍ती कर ली थी कि हर दो-तीन महीने पर उन्‍हें फोन मिला लेता था। इधर कुछ ज्‍यादा महीने हो गये हैं, लेकिन वे जब भी कोई नया शेर बनाते हैं और उन्‍हें लगता है कि नये पत्रकारों के लिए मुफीद है, वे एसएमएस कर देते हैं। ऐसे एक दर्जन एसएमएस मेरे मोबाइल में सुरक्षित है। उन्‍हें भी खुशी हुई। कहा कि आज तो नौजवानों से ही इस शाम की रौनक बढ़ेगी।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010008.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010008-1024x768.jpg" alt="" title="पाणिनी आनंद और दीपू राय " width="623" height="467" class="aligncenter size-large wp-image-21367" /></a></p>
<p><strong>उसके बाद</strong> स्त्रियों के लिए आधी नहीं, पूरी जमीन मांगने वाली मनीषा मिल गयीं, गंभीर बातों में भी मसखरी के मसाइल सोच सोच कर हमेशा हंसने वाले दीपू राय मिल गये, फकीराना बेलौस के ठसकदार पाणिनी आनंद मिल गये&#8230; तो लगा कि यहां सब तो अपने ही हैं &#8211; तीन दिन क्‍या, सब कुछ छह दिन पुराना भी चल सकता था।</p>
<p><strong>जो जनाब</strong> संचालन कर रहे थे, वही बता रहे थे कि कौन कौन आ गये हैं और किन किन से इस महफिल को इज्‍जत मिल रही है। एक तरफ से अगर उन सबका नाम लिया जाए, तो उनमें सलमान खुर्शीद, राशिद अल्‍दी, फारुख अब्‍दुल्‍ला, जगदंबिका पाल, जतिन प्रसाद, शोएब इलियासी, शाहनवाज़ हुसैन, सलमा जैदी, मोहम्‍मद अजरुद्दीन, सुहैल हाशमी &#8230; &#8230; &#8230; वगैरा वगैरा। पहले हॉल में जितनी खाली कुर्सियां दिख रही थीं और जिसके बारे में दोस्‍तों ने हड़का दिया था कि इनकी तस्‍वीर मत लेना, वे सबकी सब भर गयीं। जाने कहां से अचानक मेहमानों की पूरी फौज आ गयी थी? जबकि सहारा मीडिया के एडिटर और न्‍यूज डाइरेक्‍टर उपेंद्र राय ने ये राज बता दिया था कि तीन दिन पहले इस समारोह के बारे में सोचा गया और आज ही आमंत्रण की कार्रवाई की गयी।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010011.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/27122010011-1024x768.jpg" alt="" title="27122010(011)" width="623" height="467" class="aligncenter size-large wp-image-21368" /></a>
<p><strong>27 दिसंबर</strong>। मिर्जा गालिब की जयंती। उपेंद्र राय ने कहा कि उनकी इच्‍छा थी कि इस चैनल को एक ऐसी तारीख से जोड़ पाएं जो वाकई एक तारीख हो और मिर्जा गालिब की जयंती से बेहतर कोई दिन हो नहीं सकता था। खैर&#8230;</p>
<p><strong>हम कुछ</strong> बदजुबान पत्रकारों के सवालों का जवाब सहारा इंडिया के उपप्रबंधक ओपी श्रीवास्‍तव ने दिया और कहा कि उर्दू हमारे लिए मजहब नहीं संस्‍कृति है।</p>
<p><strong>सात बजने में</strong> जब 15 सेकंड बचे थे, तो 15 काउंटडाउन के बाद आलमी सहारा शुरू हो चुका था। पर्दे पर सहारा के प्रथम पुरुष सुब्रत राय सहारा पहला संदेश दे रहे थे। एक दो सेकंड की देर से ही सही, हमने अपने मोबाइल में इसे रिकॉर्ड कर लिया।</p>
<p><object width="580" height="469"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/2O0A2Jve2J4?fs=1&amp;hl=en_US"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://anonymouse.org/cgi-bin/anon-www.cgi/http://www.youtube.com/v/2O0A2Jve2J4?fs=1&amp;hl=en_US" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="580" height="469"></embed></object></p>
<p><strong>फिर एक</strong> न्‍यूज हेडलाइंस था और उसके बाद आलमी सहारा को शुभकामना संदेश देते शीला दीक्ष‍ित से लेकर नीतीश कुमार, अलका लांबा से लेकर सुहेल सेठ जैसे देश के नामचीन लोग थे। लेकिन हमने शुभकामनाएं देते जिनकी तस्‍वीर उतारी, वो थीं पाकिस्‍तानी एक्‍ट्रेस वीना मलिक।</p>
<p><strong>हम ठहरे थे</strong> कि इस पूरी महफिल में मुनव्‍वर राना की एक खामोश शिरकत रहती है या उनका असर भी जलवाफरोश किया जाता है &#8211; यह देखने। उपेंद्र राय ने हमारा इंतजार खत्‍म किया। दरअसल इस मौके पर पांच सौ से अधिक शेरों वाला उनका मोहाजिरनामा जारी किया गया। मुनव्‍वर साहब ने पाकिस्‍तान का एक किस्‍सा सुनाया कि 2008 में वे पाकिस्‍तान गये थे। एक अंतरराष्‍ट्रीय मुशायरा था। मुशायरा अपने अंतिम दौर में था और वे स्‍टेज के पीछे वॉश रूम की तरफ सिगरेट पीने की गरज से गये। वहां एक सज्‍जन मिले और फरमाया कि राना साहब, परसों हैदराबाद सिंध का आलमी मुशायरा है, आपको इसमें तशरीफ लाना है। राना साहब ने उनसे अपनी सेहत का हाल बताया और कहा कि मुश्किल है &#8211; नहीं आ सकता। उन सज्‍जन ने चारा फेंकते हुए कहा कि आज सादाते-अमरोहा में आपको जितना नजराना मिल रहा है, हैदराबाद सिंध में इसका दुगना नजराना पेश किया जाएगा। राना साहब इस पेशकश से दुखी हो गये। मोहाजिरनामा में वही दुख छलक कर आ गया है। उन्‍होंने कुछ शेर सुनाये&#8230; आप भी पढिए, देखिए और सुनिए। यहां उन्‍हें लिख रहा हूं और वीडियो भी लगा रहा हूं&#8230;</p>
<p><object width="580" height="469"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/vmqwvw_Ro0U?fs=1&amp;hl=en_US"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://anonymouse.org/cgi-bin/anon-www.cgi/http://www.youtube.com/v/vmqwvw_Ro0U?fs=1&amp;hl=en_US" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="580" height="469"></embed></object></p>
<p><em>मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आये हैं<br /> <br />
	तुम्‍हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आये हैं</p>
<p>मुहाजिर कह के दुनिया इसलिए हमको सताती है<br /> <br />
	कि हम आते हुए कब्रों में शजरा छोड़ आये हैं</p>
<p>अभी तक बारिशों में भीगते ही याद आता है<br /> <br />
	कि हम छप्‍पर के नीचे अपना छाता छोड़ आये हैं</p>
<p>ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी<br /> <br />
	कि हम बिस्‍तर पे इक हड्डी का ढांचा छोड़ आये हैं</p>
<p>किसी की आरजू के पांव में जंजीर डाली थी<br /> <br />
	किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आये हैं</p>
<p>भतीजी, अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी<br /> <br />
	वहीं, झूले में हम जिसको हुमकता छोड़ आये हैं</p>
<p>तू इतनी बेरुखी से चांद हमसे बात करता है<br /> <br />
	हम अपनी झील में एक चांद उतरा छोड़ आये हैं</p>
<p>वो इंजन के धुएं से पेड़ का उतरा हुआ चेहरा<br /> <br />
	वो डिब्‍बे से लिपट कर सबको रोता छोड़ आये हैं</em></p>
<p><strong>और भी</strong> कुछ शेर हैं, जो मोहाजिरनामा किताब से उठा कर हम आपकी नज्र कर रहे हैं&#8230;</p>
<p><em>वो सोंधी रोटियां हमको यहां कैसे मयस्‍सर हों<br /> <br />
	वो मिट्टी से बना हम अपना चूल्‍हा छोड़ आये हैं</p>
<p>पका कर रोटियां रखती थी मां जिसमें सलीके से<br /> <br />
	निकलते वक्‍त वो रोटी की डलिया छोड़ आये हैं</em></p>
<p><strong>मोहाजिरनामा</strong> के कुछ शेर पढ़ कर मुनव्‍वर कट रहे थे, लेकिन जनाब संचालक महोदय ने उन्‍हें जाने नहीं दिया और मुनव्‍वर साहब ने दो गजलें और पढ़ी और आलमी सहारा की महफिल लूट ली। हमने उन दो गजलों को वीडियो में उतारा है, आप देख लें &#8211; सुन लें।</p>
<p><object width="580" height="469"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/aMWG3vu7rjE?fs=1&amp;hl=en_US"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://anonymouse.org/cgi-bin/anon-www.cgi/http://www.youtube.com/v/aMWG3vu7rjE?fs=1&amp;hl=en_US" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="580" height="469"></embed></object></p>
<p>पार्टी बेजोड़ थी &#8211; शराब नहीं थी &#8211; नशा खूब था। आलमी सहारा वतन के हवाले हो चुका था।</p>
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