♦ विष्णु खरे हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता है कि हम कुछ विचारों, वस्तुओं और व्यक्तियों को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये पूर्वग्रह कभी सकारण होते हैं और कभी नितांत निरंकुश, जिनके लिए उर्दू में ‘बुग्ज-ए-लिल्लाही’ जैसा खूबसूरत पद है। हमें कुछ लोगों का जिक्र करने, उन्हें देखने, उनके साथ [...]
अब, जबकि अधिकतर लोगों ने इंटरव्यू पढ़ लिया है, मुझे लगता है उसमें उठाये गए प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिए। संक्षेप में कहूं तो मेरे मन में मुख्य शंका यह है कि महिला लेखन में देह-केंद्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए। एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरूषों के लेखन पर भी उठना चाहिए। सही है, पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिए पर पहुंचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है।
भाषासेतु— साक्षात्कार में उपयुक्त आपत्तिजनक शब्दों की हम भर्त्सना करते हैं, फिर भी संपादक और लेखक द्वारा खेद प्रकट करने के बावजूद कुछ रचनाकारों द्वारा एक संचार पत्र समूह विशेष में लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।
विभूति नारायण राय का घेराव तेज हो रहा है। लेखिकाओं को छिनाल कह कर पूरे हिंदी समाज को अपमानित करने वाले विभूति नारायण राय के विरुद्ध अभियान को तेज करने का फैसला लिया गया है। इसी सिलसिले में आज दिल्ली के कॉफीहाउस में बैठक हुई। इस बैठक में मैत्रयी पुष्पा, अंजलि सिन्हां, अनीता भारती, तब्बसुम, [...]
आज जनसत्ता में एक सूची छपी है। उन लोगों की जो हिंदी साहित्य के छिनाल-विभूति अध्याय के विरुद्ध खड़े हैं। वो मानते हैं कि विभूति नारायण राय ने हिंदी लेखिकाओं को छिनाल कह कर अपनी मानसिकता का परिचय दिया है और ऐसे मानसिक रोगी को किसी भी विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहने [...]
बेवफा बुद्ध, बेवफा शमशेर रवींद्र कालिया जब से ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक बने हैं तब से हिंदी कहानी को तो उनकी नजर लग ही गई है। साथ ही उसके बाजारू होने की गति भी तेज हो ही गई है। पर कवियो, सावधान। हिंदी कविता पर भी कालिया की नजर पड़ चुकी है। ‘नया ज्ञानोदय’ के [...]
जब-जब हाशिये पर माने जाने वाले लोग उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने लगते हैं और सहज रास्ते बनाते हैं, ताकतवर और असरदार लोग गहरे सदमे में आ जाते हैं। उस सदमे से हुंकार उठती है और उनके ही दायरों में फैलने लगती है। माहौल दहशतनाक हो जाता है, वे डर जाते हैं। डरा हुआ व्यक्ति [...]
हिंदी के बृहत्तर समाज की पृष्ठभूमि सामंती है। यह पृष्ठभूमि सामंती मानसिकता को जन्म देती है। दरअसल, हिंदी क्षेत्र से जो लोग सरकारी नौकरियों में आते हैं, वे कड़ी मेहनत करके तो आते हैं, लेकिन उनकी सामंती मानसिकता नहीं बदल पाती है। यानी अपनी जमीन छोड़ कर सरकारी नौकरियों में ऊंचे पदों पर आ जाने [...]
यह दुखद और किसी हद तक शर्मनाक है कि नामवर सिंह जैसे ‘भद्र’ और वरिष्ठ आलोचक ने अभी तक इस मसले पर न तो कुछ कहा है, न ही कुलाधिपति पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने कुलाधिपति की हैसियत में कुलपति से कोई जवाब तलब तक नहीं किया है, जबकि केंद्रीय मंत्री ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। अगर नामवर जी ने किया है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए।
उनके हॉस्टल में रुकोगी, तो वे तुम्हें हड़प लेंगे विभूति नारायण राय के एक शब्द पर भले ही घमासान मचा है, उक्त इंटरव्यू में बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिससे राय की मध्ययुगीन कुत्ता मानसिकता का पता चलता है। मसलन वर्धा विश्वविद्यालय की छात्राओं का जिक्र करते हुए वे कहते हैं : ‘अभी हाल में [...]