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	<title>जनतंत्र &#187; साहित्य</title>
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	<description>बोल के लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>मलयाली कवि कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Feb 2011 16:51:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राकेश कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मलयाली कवि और गीतकार ओ एन वी कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया है। मलयाली साहित्य में अमूल्य योगदान के लिये सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार ओ एन वी कुरूप को शुक्रवार को तिरूवनंतपुरम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2007 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर प्रदानमंत्री ने कहा कि केरल ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/kurup.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/kurup.jpg" alt="" title="kurup" width="265" height="230" class="alignright size-full wp-image-21564" /></a><strong>मलयाली </strong>कवि और गीतकार ओ एन वी कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया है।</p>
<p><strong>मलयाली </strong>साहित्य में अमूल्य योगदान के लिये सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार ओ एन वी कुरूप को शुक्रवार को तिरूवनंतपुरम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2007 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>इस </strong>अवसर पर प्रदानमंत्री ने कहा कि केरल ने देश की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहर और रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने की दिशा में उत्कृष्ठ योगदान दिया है।</p>
<p><strong>उन्होंने </strong>कहा कि भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन दिये जाने का कार्य एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें काफी काम किये जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘ भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इसके विभिन्न आयामों की समझ होना जरूरी है जो हमारी समावेशी संस्कृति की झलक पेश करता हो।’’</p>
<p><strong>सिंह </strong>ने कहा कि शिक्षित भारतीय पश्चिम के प्रसिद्ध लेखकों की कृति से परिचित है लेकिन उन्हें भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ठ योगदान देने वाले साहित्यकारों के बारे में कम जानकारी है। हाल के वर्षो में भारतीय लेखकों ने अंग्रेजी में देश और देश से बाहर अपनी ख्याति अर्जित की है लेकिन भारतीय भाषाओं में प्रतिभाओं को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है।</p>
<p><strong>प्रधानमंत्री </strong>ने कहा कि कुरूप की कविताओं का बंगाली, मराठी अथवा अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। कुरूप को मलयाली साहित्य के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए 43वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। कुरूप मलयाली साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले केरल के पांचवें साहित्याकार है।</p>
<p><strong>प्रधानमंत्री </strong>मनमोहन सिंह ने तिरूवनंतपुरम में एक समारोह में कुरूप को पुरस्कार प्रदान किया। पुरस्कार के तहत एक प्रशस्तीपत्र, कांसे से बनी देवी सरस्वती की प्रतिमा और धनराशि प्रदान की जाती है। समारोह में अन्य लोगों के अलावा केरल के राज्यपाल आर एस गवई और मुख्यमंत्री वी एस अच्यूतानंदन भी उपस्थित थे।</p>
<p><strong>कुरूप</strong> मलयाली साहित्य के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है जिन्हें पद्मश्री और पद्म विभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। मलयाली सिनेमा में उनका उल्लेखनीय योगदान है और उन्होंने 232 फिल्मों के लिये 900 से अधिक गाने लिखे हैं। फिल्म वैशाली में उनके लिखे गीत को 1989 में राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका अहम योगदान है और वह विभिन्न स्तरों पर प्राध्यापक रह चुके हैं।</p>
<p>एजेंसियां</p>
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		<title>कवि दिनेश कुमार शुक्ल को पहला सीता स्मृति सम्मान</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Oct 2010 06:17:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<description><![CDATA[हिंदी लेखन के लिए प्रथम सीता स्मृति सम्मान जाने-माने हिंदी कवि दिनेश कुमार शुक्ल को मिला है। उन्हें यह सम्मान कविता संग्रह &#8220;ललमुनिया की दुनिया&#8221; के लिए मिला है। डॉ सीता श्रीवास्तव मशहूर शिक्षाविद और राजनीतिशास्त्र की विद्वान थीं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय की मैत्रेयी कॉलेज की 15 वर्ष से ज्यादा समय तक प्रधानाचार्य रहीं। वाशिंगटन [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/dinesh-kumar-shukla-new.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/dinesh-kumar-shukla-new-150x150.jpg" alt="" title="dinesh kumar shukla new" width="150" height="150" class="alignright size-thumbnail wp-image-19527" /></a><strong>हिंदी </strong>लेखन के लिए <strong>प्रथम सीता स्मृति सम्मान</strong> जाने-माने हिंदी कवि दिनेश कुमार शुक्ल को मिला है। उन्हें यह सम्मान कविता संग्रह <em><strong>&#8220;ललमुनिया की दुनिया&#8221;</strong></em> के लिए मिला है। </p>
<p><strong>डॉ सीता श्रीवास्तव</strong> मशहूर शिक्षाविद और राजनीतिशास्त्र की विद्वान थीं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय की <strong>मैत्रेयी कॉलेज</strong> की 15 वर्ष से ज्यादा समय तक प्रधानाचार्य रहीं। वाशिंगटन डीसी स्थित <strong>अमेरिकन यूनीवर्सिटी</strong> में वरिष्ठ फुल ब्राइट स्कॉलर और लिंचबर्ग के रांडोल्फ मेकन विमेन कॉलेज में विज़िटिंग प्रोफेसर भी थीं। इससे पहले सीता श्रीवास्तव बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र पढ़ाती थीं और वहां के महिला महाविद्यालय में राजनीतिशास्त्र की विभागाध्यक्ष थीं। उन्होंने छात्र जीवन में लखनऊ में रहते हुए आजादी के आंदोलन में भी हिस्सा लिया था और जेल गईं थीं। उनका शोध राज्य-सभा पर था। वो शोध आगे चल कर पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुआ और काफी लोकप्रिय रहा। <span id="more-19520"></span></p>
<p><strong>डॉ सीता श्रीवास्तव</strong> ने दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाली गरीब महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और बेहतरी के लिए पेशेवर प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के माध्यम से कई विकास कार्यक्रम चलाए। </p>
<p><strong>वह एक</strong> कवयित्री भी थीं और हिन्दी साहित्य से उनका गहरा जुड़ाव था। मैत्रेयी कॉलेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने हिन्दी गद्य और कविता दोनों में गंभीर लेखन किया। उनकी 23 पुस्तकें हैं जिनमें कुछ कविता संग्रह भी शामिल हैं। उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जीवनी भी लिखी। कई पुस्तकों के लिए उन्हें पुरस्कार और सम्मान मिले। सीता श्रीवास्तव की शादी जाने-माने अधिकारी रजनी कान्त से हुई थी। </p>
<p><div id="attachment_19529" class="wp-caption alignleft" style="width: 160px"><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/Dr-Sita.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/Dr-Sita-150x150.jpg" alt="" title="Dr Sita" width="150" height="150" class="size-thumbnail wp-image-19529" /></a><p class="wp-caption-text">डॉ सीता श्रीवास्तव </p></div><strong>हिन्दी साहित्य</strong> के प्रति डॉ सीता श्रीवास्तव के लगाव के कारण ही उनके परिवार ने उनके नाम पर एक वार्षिक पुरस्कार की घोषणा की है। इसमें एक साहित्यकार को प्रशस्ति पत्र और 51,000 रुपये दिए जाएंगे। पुरस्कार के लिए प्रमुख हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन देकर प्रविष्टियां आमंत्रित की गई थीं। हिन्दी लेखकों और प्रकाशकों की ओर से 77 प्रविष्टियां आयीं। <strong>वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह और कथाकार ममता कालिया</strong> के प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने 2009-10 के सीता स्मृति पुरस्कार विजेता का चयन करने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया अपनायी। कई दौर की परिचर्चा और व्यापक कसौटियों पर प्रविष्टियों के सतर्क मूल्यांकन, परीक्षण तथा छंटनी के बाद प्रतिष्ठित निर्णायक मंडल ने दिनेश कुमार शुक्ल के काव्य-संग्रह <strong>“ललमुनिया की दुनिया”</strong> को प्रथम सीता स्मृति सम्मान के लिए चुना है। </p>
<p><strong>दिनेश कुमार शुक्ल</strong> जाने-माने समकालीन हिन्दी कवि हैं। इनकी कविताएं और आलेख तकरीबन सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित हुए हैं। इनकी अद्भुत शैली ने समकालीन कविता के साहित्यिक मानकों से समझौता किए बगैर कविता को आम लोगों के करीब लाने का काम किया है। पारंपरिक साहित्यिक व लोकरूपों के प्रयोग ने दिनेश कुमार शुक्ल की कविताओं को एक नई धार दी है। इन्हें यह पुरस्कार नई दिल्ली में 2010 के अंत में दिया जाएगा।</p>
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		<title>जब हिंदी में खूब पैसा आ जायेगा तो आत्मविश्वास भी बढ जायेगा</title>
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		<pubDate>Wed, 15 Sep 2010 11:43:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>प्रकाश प्रियदर्शी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इस बार हिन्दी दिवस पर गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने कुछ देर तक हिन्दी में भाषण दिया। खूब तालियां बजीं।चिदम्बरम हिन्दी भाषी क्षेत्र से नहीं आते इसलिए साल में एक दिन उन्होंने जो प्रयास किए उसके लिए उनका हौसला अफजाई करना वाजिब है। हर साल सितम्बर महीने में भारत सरकार के कार्यालयों औऱ स्कूलों में हिन्दी पखवाड़ा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/hindi.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/hindi-231x300.jpg" alt="" title="hindi" width="231" height="300" class="alignright size-medium wp-image-18001" /></a><strong>इस </strong>बार हिन्दी दिवस पर गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने कुछ देर तक हिन्दी में भाषण दिया।  खूब तालियां बजीं।चिदम्बरम हिन्दी भाषी क्षेत्र से नहीं आते इसलिए साल में एक दिन उन्होंने जो प्रयास किए उसके लिए उनका हौसला अफजाई करना वाजिब है। हर साल सितम्बर महीने में भारत सरकार के कार्यालयों औऱ स्कूलों  में हिन्दी पखवाड़ा भी मनाया जाता है। हिंदी के विकास के लिए जारी किये गये रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि हर साल सरकार हिन्दी के उत्थान औऱ प्रचार –प्रसार के लिए करीब 37 करोड़ रूपय खर्च करती है।विशेष बात यह है कि इसमें विदेशों में प्रचार के लिए सरकार की तरफ से जिन विशिष्ट लोगों को भेजा जाता है उनके खर्चे इसमें शामिल नहीं है। </p>
<p><strong>एक </strong>समाचार पत्र ने कुछ शहरों में रिपोर्टरों को भेजकर करीब दो हजार लोगों से बातचीत के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि भारत में हिन्दी बोलने वाले 65 प्रतिशत लोग इस  भाषा के इस्तेमाल में शर्म  महसूस नहीं करते और इसे अपना सबसे प्रिय भाषा मानते हैं। अखबार ने यह भी दावा किया कि 25 प्रतिशत लोगों की राय है कि भारत में प्राथमिक शिक्षा के बाद हिन्दी की पढाई नहीं होनी चाहिए।</p>
<p><strong>लेकिन </strong>जहां हर मां-बाप चाहता है कि उसका बच्चा फर्राटेदार अंग्रेजी बोले। साधन संपन्न लोग शुरूआत से ही अपने बच्चे को अंग्रेजी का विद्वान बनाने की हरसंभव कोशिश करते हैं। जो बच्चे सरकारी स्कूलों में पढते हैं उनका वहां पढना कोई भाषा प्रेम नहीं बल्कि महंगे अंग्रजी स्कूलों में न पढ पाने की मजबूरी है। अंग्रजी पर पकड़ रखने वाला हिन्दी क्षेत्र का हर व्यक्त अपने को असाधारण समझता है।</p>
<p> <strong>हिन्दी </strong>भाषी क्षेत्र के बच्चों की अंग्रजी न जानेने की कुंठा को भुना रहे इंग्लिश कोचिंग सेंटरों की संख्या पर गौर कीजिए ।यह छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरो तक एक बड़ा व्यावसाय का रूप ले चुका है। ऐसे में इस सर्वे की सत्यता पर संदेह भले न हो पर इसमें राय देने वाले लोगों की ईमानदारी पर संदेह जरूर है ।</p>
<p><strong>अंग्रेजी </strong>का जो हौव्वा लोगों के मन में है वह दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है।  सूचना क्रांति के विकास के बाद अब  किसी भी क्षेत्र की जानकारी आसानी से उपलब्ध है। ऐसे में उच्च शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम औऱ उसके माध्यम की रूप रेखा देखकर हिंदी भाषी क्षेत्रों के बच्चों के हाथ पांव पहले ही फूल जाते हैं। </p>
<p><strong>हम </strong>अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में उच्चशिक्षा का माध्यम क्या है।मेडिकल ,इजीनियरिंग, एलएलबी आदि की पढाई सिर्फ अंग्रजी में होती है। यहां किसी वकील को हिंदी में बहस करने के लिए जज से विषेश आदेश लेनी होती है। विदेश नीति पर हिंदी में पीएचडी करने के लिए वेद प्रताप वैदिक जैसे पत्रकार को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। अपनी भाषा को लेकर इतनी उदासीनता किसी भी देश  में नहीं है।पार्टियों के हिंदी भाषी प्रवक्ता भी अपनी बात अंग्रजी में रखना चाहते हैं । बाइट कलेक्टरों को कहना पड़ता है कि सर हिंदी में बोल दीजिए।</p>
<p><strong>अंग्रेजी </strong>का विरोध करने वाले नेता भी अपने बच्चों को महंगे अंग्रेजी स्कूलों मे पढाते हैं।और जो हिंदी का विरोध की बदौलत अपनी राजनीतिक दूकान चलाते  हैं वे भी अपने बच्चों  को अंग्रजी की तालीम ही देना चाहते हैं।</p>
<p> <strong>हिंदी </strong>और अंग्रजी  अखबारों के बीच के फर्क को ज्यादा उछालने की जरूरत नहीं है। मुट्ठी भर पाठक संख्या वाला अंग्रेजी अखबार रेवेन्यू के मामले में किसी बड़े हिंदी अखबार से आगे है। कहने के लिए बॉलिवुड ने हिन्दी का खूब भला किया है लेकिन अपनी रोजी रोटी हिंदी से चलाने वाले सिने कलाकार हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं। इसमें कई तो  जबर्दस्ती अंग्रजी बोलते हैं चाहे अच्छी अंग्रेजी नहीं भी जाने तो भी ।इसमें से ज्यादातर हिंदी की स्क्रिप्ट देवनागरी के बजाय रोमन में पढते हैं।</p>
<p> <strong>हिन्दी </strong>दिवस पर आयोजित एक सेमिनार में मशहूर अंग्रेजी पत्रकार राजदीप सरदेशाई ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण मसले को उठाया । उन्होंने कहा कि हिन्दी टीवी पत्रकारों को भी अंग्रेजी वालों के बराबर तनख्वाह मिलती है पर उनमें आत्मविश्वास की कमी है । वे अपने उपर भरोसा नहीं कर पाते। राजदीप ने वह बात कह दी जो समस्या की जड़ है । अपने उपर भरोसा करने के बजाय ,और अपनी भाषा को इज्जत देने के बजाय ये  लोग अंग्रेजी न जानने की कुंठा से लड़ रहे हैं।</p>
<p><strong>जब </strong>तक लोगों के अन्दर हिंदी भाषी होने की  घृणा खत्म नहीं होगी तब तक उनका आत्मविश्वास नहीं बढेगा ।अपने जबान के प्रति गर्व की भावना के बगैर स्थिति में सुधार की उम्मीद बेमानी है।</p>
<p><strong>शायद </strong>हिंदी तेजी से बाजार की भाषा बन जाये ।इसमें तेजी से खूब पैसा आ जाये। तब शायद स्थितियां बदले क्योंकि पैसे में बहुत ताकत है, हिंदी हासिये पर इसी वजह  से है। जब हिंदी में भी खूब पैसा आ जायेगा तो लोगों का आत्मविश्वास भी अपने आप बढ जायेगा।</p>
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		<title>मैं लज्जित हूं, देश भी लज्जित है, अभी तक उसे हटाया क्यों नहीं?</title>
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		<pubDate>Mon, 23 Aug 2010 21:26:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[<strong>रघुवंश प्रसाद सिंह  ♦ </strong>मैं लज्जित हूं उस शब्द का सदन में उच्चारण करने में कि उन्होंने क्‍या कहा। … ((व्यवधान)) … सारा देश लाज्जित है। देश भर के 150 लेखकों ने एक साथ कहा कि उसको हटाया जाए। अभी तक सरकार ने क्‍यों नहीं हटाया है? महिला लेखिका के प्रति किन शब्दों का उच्चारण किया है? एक वाइस चांसलर ने ऐसा किया और क्‍यों उस पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है? ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em><strong>कपिल सिब्बल </strong>ने एक बार कंस्टिट्यूशन क्लब में अपने भाषण में कहा था कि तुम (हिंदी के पत्रकार) लिखते रहो हमें (सत्ता को) कोई फर्क नहीं पड़ता। बात सही है। सड़क से लेकर संसद तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से <strong>विभूति नारायण राय </strong>को हटाने की मांग हो चुकी है। लेकिन बेशर्म सरकार और बेशर्म मंत्री कान में रूई ठूंस कर बैठे हैं। वर्धा में उस तानाशाह का राज कायम है। बहुत से बड़े पत्रकारों और साहित्यकारों की भूमिका भांट जैसी नज़र आ रही है। इसी महीने की 21 तारीख को वरिष्ठ नेता<strong> रघुवंश प्रसाद सिंह</strong> ने लोकसभा में<strong> छिनाल विभूति कांड</strong> पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि वर्धा के कुलपति की वजह से पूरा देश लज्जित हैं, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वैसे संसद में सवाल उठ जाने के बाद भी कोई कार्रवाई होगी, इसकी गारंटी नहीं। &#8211; <strong>मॉडरेटर</strong> </em></p></blockquote>
<p><span id="more-16809"></span></p>
<p><span style="font-size: large;"><span style="background-color: #fce5cd; color: black;">रघुवंश प्रसाद सिंह  ♦ </span></span></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/raghuvansh.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/raghuvansh-300x174.jpg" alt="" title="raghuvansh" width="300" height="174" class="alignright size-medium wp-image-16810" /></a>माननीय अध्यक्ष महोदया, माननीय सदस्यों ने सरकार की प्रशंसा की है कि बड़ा भारी विमैन इंपावरमैंट हो रहा है। महोदया, बुद्धकाल में जब भगवान बुद्ध वैशाली में आये थे, विमैन इंपावरमैंट वहीं वैशाली से शुरू हुआ। मैं वहां से आता हूं इसलिए अधिकारपूर्वक बताना चाहता हूं। जब कभी महिलाओं को इजाजत नहीं थी बौद्धिक संघ में जाने की, वहीं से शुरुआत हुई थी और वहीं से उनकी मां गौतमी, उनकी पत्नी और सभी का प्रवेश हुआ था बौद्ध धर्म के संघ में। लेकिन अब यह दावा इन्होंने किया है और विमैन इंपावरमैंट की बात कर रहे हैं, जिसकी माननीय सदस्य भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं। अभी के समय में जितना महिलाओं फर अन्याय, अत्याचार और जुल्म हो रहा है, अबसे पहले कभी नहीं हुआ। मेरा पहला सवाल यह है कि महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय है, उसके वाइस चांसलर हैं वीएन राय। क्‍या लिखा है उन्होंने और महिला लेखकों के प्रति उनकी क्‍या टिप्‍पणी है? मैं लज्जित हूं उस शब्द का सदन में उच्चारण करने में कि उन्होंने क्‍या कहा। … ((व्यवधान)) … सारा देश लाज्जित है। देश भर के 150 लेखकों ने एक साथ कहा कि उसको हटाया जाए। अभी तक सरकार ने क्‍यों नहीं हटाया है? महिला लेखिका के प्रति किन शब्दों का उच्चारण किया है? एक वाइस चांसलर ने ऐसा किया और क्‍यों उस पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है? हम यह पहला सवाल उठाते हैं। ये कहते हैं कि महिला का सशक्‍तीकरण कर रहे हैं और कहते हैं कि सभी ऊंचे पदों पर महिलाओं को बैठाएं। सरकार इसका जवाब दे कि क्‍यों नहीं उसे हटाया गया, जिसने महिला लेखिका के प्रति इस तरह से कुशब्द कहे हैं, अमर्यादित टिप्‍पणी की है। देश भर में लेख छाप दिया महिला लेखिका के खिलाफ। देश भर के लेखक, साहित्यकार, कलाकार, रचनाकार सब लोग मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। यह सवाल मैं उठाना चाहता हूं।</p>
<p><strong>अध्यक्ष महोदया :</strong> आपका समय समाप्त हो गया है</p>
<p><span style="font-size: large;"><span style="background-color: #fce5cd; color: black;">रघुवंश प्रसाद सिंह का वीडियो </span></span></p>
<p><object width="660" height="525"><param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/X0Qk_xdaJmc?fs=1&amp;hl=en_US&amp;rel=0&amp;border=1"></param><param name="allowFullScreen" value="true"></param><param name="allowscriptaccess" value="always"></param><embed src="http://www.youtube.com/v/X0Qk_xdaJmc?fs=1&amp;hl=en_US&amp;rel=0&amp;border=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="660" height="525"></embed></object></p>
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		<title>&#8220;हिंदी प्रोफेसरों ने हिंदी का खाना खराब किया है&#8221;</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Aug 2010 10:32:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[बहसतलब]]></category>
		<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[सुर्ख़ियां]]></category>

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		<description><![CDATA[हिंदी समाज का कोई संगठित चेहरा हमारे सामने नहीं है, इसलिए उसकी कोई बड़ी पहल हमें कभी नजर नहीं आती। इसलिए हमारी साहित्यि पत्रिकाओं और हमारे साहित्‍य के गुनीजन बड़ी तादाद में हमें नजर नहीं आते। कवि मंगलेश डबराल ने मंगलावार की शाम, इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में बहसतलब चार के मंच से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab-4-1.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab-4-1-300x225.jpg" alt="" title="bahastalab 4 1" width="300" height="225" class="alignright size-medium wp-image-16429" /></a><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab4-2.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab4-2-300x225.jpg" alt="" title="bahastalab4 2" width="300" height="225" class="alignright size-medium wp-image-16430" /></a><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab4-3.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/bahastalab4-3-300x225.jpg" alt="" title="bahastalab4 3" width="300" height="225" class="alignright size-medium wp-image-16431" /></a>
<p><strong>हिंदी समाज का कोई</strong> संगठित चेहरा हमारे सामने नहीं है, इसलिए उसकी कोई बड़ी पहल हमें कभी नजर नहीं आती। इसलिए हमारी साहित्यि पत्रिकाओं और हमारे साहित्‍य के गुनीजन बड़ी तादाद में हमें नजर नहीं आते। कवि मंगलेश डबराल ने मंगलावार की शाम, इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में बहसतलब चार के मंच से बोलते हुए ये बातें कहीं। उन्‍होंने मराठी के कथाकार भालचंद्र नेमाडे के नये उपन्‍यास हिंदू का जिक्र करते हुए कहा कि तीन खंडों के इस उपन्‍यास का पहला भाग आया है और देखते ही देखते इसकी पांच हजार कॉपी बिक गयी है। हिंदी में ऐसा कभी संभव ही नहीं हुआ।</p>
<p><strong>मंगलेश डबराल ने कहा</strong> कि कहने को हिंदीभाषियों की संख्‍या 45 करोड़ है &#8211; लेकिन हिंदी साहित्‍य को पढ़ने-समझने वाले ज्‍यादातर विश्‍वविद्यालयों के हिंदी विभाग के प्रोफेसर है &#8211; जिन्‍होंने दरअसल हिंदी का खाना खराब किया है। उन्‍होंने कहा कि हमारे बड़े लेखकों ने बहुत प्रतिबद्धता के सा‍था साहित्यिक पत्रकारिता की है। प्रेमचंद ने तीन पत्रिकाएं निकालीं &#8211; माधुरी, हंस और जागरण। परसाई ने भी वसुधा और मतवाला मंडल से एक माहौल बनाया। इन तमाम लोगों के समय तक हिंदी पत्रकारिता में भरी-पूरी साहित्यिक सुरुचि थी, लेकिन बाद की पत्रकारिता मास मीडिया में बदल गयी। फिर तो सनसनी ही सनसनी बची, साहित्‍य नहीं बचा।</p>
<p><strong>मंगलेश डबराल ने</strong> करगिल युद्ध का उदाहरण देते हुए एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त का जिक्र खुलेआम किया कि कैसे सेना के अधिकारियों के मना करने के बावजूद उन्‍होंने मोर्चे पर फ्लैश का इस्‍तेमाल किया और जिसकी वजह से पाकिस्‍तानी सरहद से गोली चली और हमारे कुछ जवानों को हमसे छीन लिया। मंगलेश डबराल ने कहा कि मास मीडिया की पत्रकारिता का सामाजिक दायित्‍व न्‍यून है, जबकि हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएं अभी भी सरोकारों की बात करती है।</p>
<p><strong>कवयित्री अनामिका ने</strong> पूरी दुनिया के किस्‍से बताते हुए और हिंदी पत्रकारिता के पुराने वक्‍तों की याद करते हुए कहा कि परंपरा को समझे बगैर हम किसी भी तरह की नयी पहलकदमी नहीं ले सकते। हम अपने वर्तमान को भी नहीं समझ सकते। अभी प्रिंट से लेकर वेब तक के हर मोर्चे पर लोगों के पास कहने को इफरात बातें हैं। हर जगह सजग लोग हैं, जो बड़े सृजनात्‍मक काम करना चाहते हैं। अनामिका ने ऐसे सजग लोगों का एक गुरिल्‍ला समूह तैयार करने की जरूरत को अपने वक्‍तव्‍य में रेखांकित किया।</p>
<p><strong>कथाकार और समयांतर</strong> के संपादक पंकज बिष्‍ट ने कहा कि हिंदी समाज जितना बड़ा है, उतना ही अनपढ़ है। शिक्षा फैल रही है और अंग्रेजी ने बहुत सारा स्‍पेस हमारे समाज में ले लिया है। पूरा दृश्‍य ऐसा है &#8211; जैसे हमारा समाज अस्मिताविहीन समाज हो। पंकज बिष्‍ट ने कहा कि हिंदी की कुछ पत्रिकाएं ऐसी रहीं, जिसका सम्‍मान हिंदी क्षेत्र के बाहर भी रहा। उन्‍होंने इस क्रम में धर्मयुग का जिक्र किया, जिसकी प्रसार संख्‍या चार लाख तक पहुंची। पंकज जी ने बताया कि मालिकों को जब तक लगता रहा है कि हिंदी समाज की मुख्‍यधारा में आ सकती है, उन्‍होंने धर्मयुग, सारिका और साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान जैसी पत्रिकाएं निकाली &#8211; लेकिन जैसे ही लगा हिंदी का खेल खत्‍म है, उन्‍होंने अपने को समेट लिया। पंकज बिष्‍ट ने कहा कि आज भले धर्मयुग नहीं है, लेकिन सैकड़ों ऐसी छोटी-छोटी पत्रिकाएं हैं &#8211; जो छोटे-छोटे शहरों से निकल रही है। इनका निरंतर निकलते रहना बताता है कि हिंदी समाज बहुत व्‍यग्रता से अपने माध्‍यम तलाश रहा है।</p>
<p><strong>पंकज बिष्‍ट ने कहा</strong> कि हिंदी के बारे में अक्‍सर लोग कहते हैं कि इसमें किताबें नहीं बिकतीं। हिंदी मर रही है। लेकिन सच तो ये है कि दुनिया भर में साहित्‍य का स्‍थान घटा है। दूसरी भारतीय भाषाओं का हाल भी हिंदी से अलग नहीं है।</p>
<p><strong>कुछ बुनियादी सवाल पत्रकार</strong> और विचारक मनीषा ने उठाये। उन्‍होंने कहा कि साहित्‍य हाशिये पर क्‍यों चला गया, क्‍योंकि साहित्‍य का गलियारा वन वे हो गया है। लेखक ये समझना ही चाहते कि पाठकों के मन में क्‍या है। वो क्‍या चाहता है? उन्‍होंने कहा कि टेलीविजन पर हमने सास-बहू के सीरियल को खूब गाली दी &#8211; लेकिन एकता कपूर के उसी सीरियल को लाखों लोगों ने देखा। उसने रिकॉर्ड तोड़ टीआरपी दी, क्‍योंकि एकता कपूर को पता था कि दर्शक क्‍या चाहता है। हमारे लेखकों को भी पाठक की सुध लेनी होगी। उन्‍होंने यह भी कहा कि नये मीडिया माध्‍यमों में ये सुविधा है कि वहां पाठक जैसे चाहे, जब चाहे रिएक्‍ट कर सकता है और उसका रिएक्‍शन दर्ज भी हो सकता है लेकिन पुराने माध्‍यमों के साथ ये सुविधा नहीं है। बल्कि पाठकीय प्रतिक्रियाओं को भी चापलूसी तक सीमित कर दिया गया है। मनीषा ने कहा कि जमाना आगे बढ़ रहा है और हमारे लेखक अभी भी गांव की पुरानी पगडंडियों, नदियों की संवेदनाओं में उलझे हुए हैं। अगर ऐसा ही रहा, तो साहित्‍य का हाशिया और बड़ा होगा।</p>
<p><strong>इसके बाद सवाल-जवाब</strong> का लंबा दौर चला। लीलाधर मंडलोई, रमणिका गुप्‍ता, अजय नावरिया, रंजीत वर्मा, आशीष कुमार अंशु, विनीत कुमार ने अपने सवाल पूछे। बहसतलब की शुरुआत हमेशा की तरह पावर प्‍वाइंट प्रजेंटेशन से हुई, जिसे इस बार तैयार किया मध्‍यप्रदेश के सिंगरौली में रह रहे युवा कथाकार राकेश बिहारी ने। यात्रा बुक्‍स की प्रकाशक नीता गुप्‍ता ने साहित्‍य‍िक पत्रकारिता पर आयोजित इस बहसतलब के कुछ संदर्भ बिंदु सबसे पहले रखे और आखिर में पेंग्विन हिंदी के संपादक निरुपम ने श्रोताओं, दर्शकों को धन्‍यवाद दिया।</p>
<p><strong>ऑडिएंस में इस बार</strong> सलमा ज़ैदी, अचला शर्मा और परवेज़ आलम, गिरधर राठी, नमिता गोखले, मै‍त्रेयी पुष्‍पा, अजय कुमार और ओम थानवी शामिल थे। राजेंद्र यादव अपनी अस्‍वस्‍थता के चलते नहीं आ पाये। उन्‍हें बहसतलब चार में वक्‍ता की हैसियत से शामिल होना था।</p>
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		<title>स्कूली लड़कों सी फब्तियां और &#8220;डैडी कूल&#8221; दिखने की चाहत</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Aug 2010 10:14:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मृणाल पांडे</dc:creator>
				<category><![CDATA[छिनाल "विभूति" कांड]]></category>
		<category><![CDATA[ब्लॉग]]></category>
		<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>

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		<description><![CDATA[उत्कट सामाजिक तथा राजनीतिक आलोड़नों से भरपूर उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के भारतीय लेखक-लेखिकाओं की जिंदगी कई बार उनके साहित्य से अधिक दिलचस्प लगने लगती है और वह है भी। लेकिन किसी भी लेखक या लेखिका का मूल्यांकन करते हुए उसके जीवन को साहित्य से अलग करके उसके कुल अवदान का अधकचरा ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक विवेचन कई [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>उत्कट सामाजिक तथा राजनीतिक आलोड़नों से भरपूर उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के भारतीय लेखक-लेखिकाओं की जिंदगी कई बार उनके साहित्य से अधिक दिलचस्प लगने लगती है और वह है भी। लेकिन किसी भी लेखक या लेखिका का मूल्यांकन करते हुए उसके जीवन को साहित्य से अलग करके उसके कुल अवदान का अधकचरा ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक विवेचन कई तरह के खतरे न्योतता है। पुरुषों के प्रसंग में ऐसा थोथापन बहुत कम दिखता है। अलबत्ता महिला लेखन की बात छिड़ते ही जिद-सी ठान ली जाती है कि उसमें अपने अस्तित्व या देह को लेकर व्यक्त प्रश्नाकुलता और यौन रिश्तों की साफगोई के साथ की गयी पड़ताल है। खुले मन से पढ़ा जाए, तो अनेक लेखिकाओं का आत्मकथात्मक लेखन हमें गहरे से विचलित कर सकता है। पर उसके साथ आलोचकीय न्याय तभी हो सकता है, जब समालोचक इस पूर्वग्रह से मुक्त हों कि स्त्री सामान्य पुरुष की तुलना में सिर्फ एक उपभोग्य शरीर या बहुत करके श्रद्धा, करुणा या विश्वास रजत नभ पगतल में बहने वाला पीयूष वीयूष सरीखा छायावादी अमूर्तन ही ठहरती है। स्त्री का आत्मचिन्तन तो अकल्पनीय है।<span id="more-16422"></span></p>
<p>हिंदी पट्टी का एक विलक्षण गुण है कि जिन चीजों को हमारा बुद्धिजीवी सबसे कम समझता है, उन पर उसकी सबसे तेज प्रतिक्रिया आती है। आलोचकीय स्तर पर यह तेवर शर्मनाक फूहड़पन के उदाहरण पेश करता है। हाल में एक ऐसे ही साक्षात्कार की कृपा से नारीवाद तथा नारीवादी लेखन दोनों विषयों की अधकचरी समझ रखने वालों के बीच अजीब-सी लट्ठमलट्ठा हमने देखी। अब तक वह साक्षात्कार देने-लेने तथा छापने वाले माफी मांग चुके हैं। अत: मामला औपचारिक स्तर पर निबटा मान लिया जा सकता है पर फिर भी प्रकरण में काफी कुछ है, जो समझदार लोगों के बीच एक संवेदनशील बहस का मुद्दा बनना चाहिए। महिला लेखन को लेकर जब विवाद उठता है, तो पक्ष या विरोध में बोलने वालों में से अधिकतर सिर्फ शब्‍दों का घटाटोप फैलाकर स्त्रियों या निजी दुश्मनों के प्रति अपने मन में अन्यान्य वजहों से पल रही चिड़चिड़ाहट का सार्वजनिक विरेचन कर देते हैं। बहस जड़ तक नहीं जा पाती। हिटलर ने तो इस बाबत (विभूति नारायण राय से भी बहुत पहले) कह दिया था : “जब एक स्त्री अपने अस्तित्व के बाबत सोचने लगती है तो यह कोई अच्छी बात नहीं होती… कुछ देर बाद उसकी यह चेष्टा हम पुरुषों के स्नायु तंत्र पर बोझ बनकर हमें चिड़चिड़ा देती है।” (टेबल टॉक से)</p>
<p>यह नितांत सम्भव है कि किसी बडे़ साहित्यिक न्यास का कर्मी या पूर्व पुलिसकर्मी होने के बावजूद कोई शख्‍स ईमानदार, परिश्रमी और पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति भी हो, मगर पत्रिका के विशेषांक का नाम, वर्धा विवि के कुलपति से पूछे गये सवालों तथा उनके जवाबों से जाहिर है कि पत्रिका के संपादक के अलावा बेवफाई सरीखे विषय को चुनकर लंबी बात करने वाले दोनों साहित्यकार स्त्रियों ही नहीं, नाजुक मानवीय संबंधों के बारे में भी खासे स्थूल तरीके से ही विचार कर पाते हैं। पिछले छह दशकों के तमाम जटिल सामाजिक बदलावों को इतने पास से देख पाने के बाद भी लेखक-पुलिस अफसर-कुलपतिजी के अंतर्मन में निहित महिला लेखन पर स्कूली लड़कों के स्तर की फब्तियां कसकर चंद मर्दवादियों के आगे “डैडी कूल” दिखने की यह भदेस चाह विस्मित करती है। स्त्री हो या पुरुष, संस्कृतियों के संक्रमण काल में किसी भी एक जमात का संकट समूची लोकतांत्रिक संस्कृति का संकट होता है। जिन तमाम प्रश्नों, रचनाओं को इस साक्षात्कार ने ठिलठिलाते हुए खारिज कर दिया है, उनको यदि मर्दाना आत्मग्रस्तता से मुक्‍त होकर संवेदना से समझा गया होता तो शायद दिखाई देता कि हमारे घोषित तौर से समतावादी लोकततंत्र में कितनी तरह की परततंत्रता के कितने स्वायत्त द्वीप मौजूद हैं। स्त्री-पुरुष, जाति-धर्म की तमाम अदृश्य विषमताओं के चलते आज भी सामंती तथा उदारवादी संस्कृतियों के बीच खड़ी एक पढ़ी-लिखी औरत कितनी वजहों से एक नहीं, अनेक स्तरों पर जीने और कई बार जीने का स्वांग करने को अभिशप्‍त होती है। महिला लेखन के आगे आज सबसे बड़ा सवाल पाठकों तक पहुंचने तथा साहित्यिक प्रसिद्धि पाने का नहीं रहा। वह ताला तो महादेवी, मन्नूजी तथा शिवानी जैसी लेखिकाएं पहले ही सफलतापूर्वक तोड़ चुकी हैं। आज की चुनौती तो यह है कि महिला लेखन नाजुक सामाजिक मसलों पर निजी अनुभवों की अनदेखी कर समाज स्वीकृत मूल्यों का पक्ष लेकर अपनी खाल बचाये या फिर मुक्तिबोध के शब्‍दों में तमाम गढ़ और मठ तोड़कर वह प्रयोगधर्मी बने और शब्‍द की असीम संभावनाओं तथा खतरों से सहजता से खेले।</p>
<p>इस बिंदु पर खड़े हर विवेकी रचनाकार को उसका जमीर एक चाबुक की तरह सरलीकृत और परंपरा स्वीकृत किंतु बासी नुस्खे अपनाने से रोक देता है। तभी वह नये और कुछ अटपटे लगने वाले तरीके से पूरी ईमानदारी के साथ अपना अनूठा जीवनानुभव व्यक्‍त कर पाता है। लेखिकाएं भी अपवाद नहीं। तस्लीमा, मन्नू भंडारी से लेकर प्रभा खेतान या मैत्रेयी तक सभी लेखिकाओं के आत्मकथात्मक आख्‍यान व उपाख्‍यान हमारे आगे बार-बार भारतीय समाज तथा मानव मन का एक बिल्कुल नया चेहरा उजागर करते हैं। उनमें से सभी रचनाएं उनकी उत्कृष्टतम न भी हों, पर उनका अपना महत्व है, खासकर महिलाओं की नयी पीढ़ी के लिए, जिसे आज भी अपनी बात खुलकर कहने को बहुत कम प्रोत्साहन या प्रेरणा मिलती है। आधुनिकता की चमक-दमक, प्रेम के क्षणों के बीचोंबीच अचानक फैल जाने वाली उदास आत्मकेंद्रितता, उत्कट कामना और भय का जो द्वैत इन रचनाओं में मौजूद है, वह उपहास या निषेध की बजाय पाठकों तथा आलोचकों, दोनों से गंभीर और समझदार विवेचन की मांग कर रहा है। महिला लेखन का यह ताजा खुलापन आने वाली पीढ़ियों के लेखन को मुक्‍त करेगा या नष्ट, यह बूझना एक सूक्ष्म विवेक तथा गम्भीर चिंतन की मांग करता है।</p>
<p>कुल मिलाकर इस पूरे अशालीन प्रसंग ने एक बार फिर हमारे समाज के अनेक वर्गों में पैठे सेक्‍स, आधुनिकता तथा आधुनिक स्त्री को लेकर व्याप्‍त खौफ का एक अजीब सा चेहरा बेनकाब किया है। ताकतवर बनती स्त्री के आगे अपनी घटती ताकत के अहसास से घबराये एक वर्ग को तो कुछ मायनों में किसी हिटलर के ही पुनरावतरण का इंतजार है, जो शिक्षित और शहरी महिलाओं के रूप में घरों को घेर रहे इस बीहड़ संकट से उनका उद्धार करे। पर क्‍या घड़ी की सुइयों को पीछे सरकाया जा सकता है?</p>
<p>यहां आकर लगता है कि शायद इन नामवर आलोचकों के चिड़चिड़ेपन की असली वजह महिला लेखन की तथाकथित अनैतिकता नहीं, बल्कि रचनाधर्मी स्त्री के द्वारा त्यागे गये नैतिक वर्जनाओं के पुराने चीथड़ों (वासांसि जीर्णानि) के प्रति खुद उनका अपना गहरा मोह है। ((दैनिक भास्कर से साभार)) </p>
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		<title>गिरिराज और प्रियंवद के बाद अशोक वाजपेयी भी ज्ञानपीठ से अलग हुए</title>
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		<pubDate>Wed, 18 Aug 2010 09:47:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
				<category><![CDATA[छिनाल "विभूति" कांड]]></category>
		<category><![CDATA[मुद्दा]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[Ashok Bajpai]]></category>
		<category><![CDATA[Chhinal controversy]]></category>
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		<category><![CDATA[vn rai]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>♦ अशोक वाजपेयी ♦ </strong>
मैं ‘कभी-कभार’ स्तंभ में दूसरे लेखकों से भारतीय ज्ञानपीठ का बहिष्कार करने की मांग करने के साथ ही, ज्ञानपीठ से अपनी दोनों पुस्तकें ‘शहर अब भी संभावना है’ और ‘कवि कह गया है’ वापस ले चुका हूं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>इसी महीने</strong> की २३ तारीख को ज्ञानपीठ के न्यासियों की बैठक है। उसमें छिनाल कांड की वजह से उत्पन्न हालात पर चर्चा होगी। लेकिन उससे ठीक पहले अशोक वाजपेयी ने ज्ञानपीठ से अपनी दोनों पुस्तकें वापस लेकर रवींद्र कालिया के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ा दिया है। उनसे पहले गिरिराज किशोर और प्रियंवद भी अपनी पुस्तकें वापस ले चुके हैं। अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता को पत्र भेज कर कहा है कि उन्होंने नैतिक आधार पर ज्ञानपीठ से अपने रिश्ते तोड़े हैं। उनका पत्र आज की चौपाल में प्रकाशित हुआ है। &#8211; <em>मॉडरेटर</em></p></blockquote>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Jansatta-Chaupal.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Jansatta-Chaupal.jpg" alt="" title="Jansatta-Chaupal" width="183" height="239" class="alignright size-full wp-image-16417" /></a><br />
&#8220;जनसत्ता&#8221; (17 अगस्त) में छपे दिनेश मौर्य के पत्र के संदर्भ में यह कहना है कि नेक काम है या नहीं, मैं ‘कभी-कभार’ स्तंभ में दूसरे लेखकों से भारतीय ज्ञानपीठ का बहिष्कार करने की मांग करने के साथ ही, ज्ञानपीठ से अपनी दोनों पुस्तकें ‘शहर अब भी संभावना है’ और ‘कवि कह गया है’ वापस ले चुका हूं। उसके एक आजीवन न्यासी के इस कदम पर पुनर्विचार करने के आग्रह को अस्वीकार भी कर चुका हूं। गिरिराज किशोर और प्रियंवद पहले ही अपनी पुस्तकें वापस ले चुके हैं। अब बाकी लेखक आगे आएंगे, इसका इंतजार है। </p>
<p>♦ अशोक वाजपेयी, दिल्ली</p>
]]></content:encoded>
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		<title>विभूति-कालिया का बचाव कर रहे हैं तीन तरह के लोग</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Aug 2010 07:18:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राकेश बिहारी</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Vibhuti-Narayan-Rai2.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Vibhuti-Narayan-Rai2-300x161.jpg" alt="" title="Vibhuti-Narayan-Rai" width="300" height="161" class="alignright size-medium wp-image-16223" /></a>नया ज्ञानोदय के बेवफाई सुपर विशेषांक-2 में विभूतिनारायण राय की स्त्री लेखकों के बारे में की गई अश्लील टिप्पणी के मद्देनजर उनकी और रवींद्र कालिया की बर्खास्तगी को लेकर आंदोलन का रूप ले चुके लेखकीय-पाठकीय प्रतिरोध के बीच कुछ लोगों के पर्दे के पीछे से उनके बचाव में आ खड़े होने की कोशिश ने हिंदी समाज की कई विशेषताओं और विसंगतियों को एक साथ उजागर कर दिया है। एक तरफ जहां हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार अपने धड़ों और मठों की लक्ष्मण रेखाओं को लांघ कर देश भर से सैकड़ों लेखक एक अहाते में खड़े नजर आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ एक तबका वह भी है, जिसे समय और सच्चाई से ज्यादा संबंधों के समीकरण और ईमान से ज्यादा बिगाड़ की चिंता खाए जा रही है। वे कौन से लोग हैं जो आज विभूतिनारायण राय के तथाकथित माफीनामे से संतुष्ट हैं या उन्हें रवींद्र कालिया की मुंहजोर गलती और ढीठ अपराध के लिए ज्यादा से ज्यादा लापरवाही जैसा आसान-सा शब्द सूझ रहा है? <span id="more-16222"></span></p>
<p>उत्तर बहुत आसान है। इस जमात में तीन तरह के लोग हैं। एक वे जो इन दोनों संस्थानों में नौकरी करते हैं या किसी न किसी तरह इन दोनों लोगों से उपकृत हैं, दूसरे वे जो इन दोनों के पुराने मित्र हैं, या फिर तीसरे वे जिन्हें अब भी इन दोनों ‘महापुरुषों’ से किसी विशेष कृपा की उम्मीद है। गौरतलब है कि इन तीनों श्रेणी के लोगों के बीच एक समानता यह भी है कि इनमें से किसी ने विभूतिनारायण राय के इन ‘महान’ विचारों के प्रकाशन और उसके बाद इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर उसके पक्ष में बेशर्मी से दलील देने पर भूल से भी कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है।</p>
<p>एक तबका राजेंद्र यादव जैसे लोगों का भी है, जो हिंदी समाज में स्त्री अस्मिता संघर्ष के सबसे बड़े पक्षधर माने जाते रहे हैं। आज इस माफीनामे ने उन्हें भी पिघला दिया है। उनके दु:खों का कारण भी सहज ही समझा जा सकता है। या तो अतीत में ऐसी ही गलतियों के कारण हुई अपनी भर्त्सना की पीड़ादायक यादों ने इन्हें इन ‘विभूतियों’ के प्रति सदाशय बना दिया है या फिर उनके लेखक और उनके भीतर के पुरुष की लड़ाई में उनका पुरुष जीत गया है। मामला जो भी हो, लोकतंत्र और माफी के नाम पर उनकी चुप्पी हम जैसे उन सभी लोगों के लिए दु:खद है, जो ऐसे मसलों पर हमेशा से उनकी तरफ देखते रहे हैं।</p>
<p>आश्चर्य होता है जब निर्मला जैन जैसी वरिष्ठ महिला आलोचक को विभूतिनारायण राय का साक्षात्कार स्त्रियों के पक्ष में नजर आता है और वे छिनाल जैसे आपत्तिजनक शब्द तक आते-आते इतनी नरम पड़ जाती हैं कि इस बात की जांच करवाना चाहती हैं कि आखिर यह राय की गलती है या ज्ञानपीठ की लापरवाही! अव्वल तो राय की दलील के बाद इसमें जांच कराने जैसी किसी राजनीतिक पैंतरेबाजी की कोई जरूरत नहीं नजर आती, और अगर गेंद ज्ञानपीठ के पाले में ही जाती है तो यह लापरवाही नहीं आपराधिक साजिश का मामला बनता है। स्त्रीवादियों के पक्ष में खड़ा न हो पाने की उनकी कोई निजी या वैचारिक मजबूरियां हो सकती हैं, लेकिन स्त्री और उस पर भी लेखक होने के नाते पितृसत्तात्मक शब्दावलियों के पीछे से झांकती मानसिकता को इस तरह नजरअंदाज करके ऐसे आपत्तिजनक और प्रायोजित बयान के पक्ष में खड़ा हो जाना सिर्फ निराशाजनक ही नहीं, आश्चर्यजनक भी है।</p>
<p>मैनेजर पांडे की बात भी समझ से परे है। वे इस तरह की बयानबाजी को अपराध तो मानते हैं, लेकिन अपराध के लिए सजा की मांग नहीं करना चाहते। कारण कि उनका विश्वास है, बर्खास्तगी और इस्तीफा दोनों का ही जन आंदोलनों से कोई रिश्ता नहीं होता। उन्हें नहीं पता है कि इस तरह का गोल-मोल बयान देकर वे उन लाखों-करोड़ों लोगों के साथ नाइंसाफी ही नहीं कर रहे, जो तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी लोकशाही में अटूट भरोसा रखते हैं, बल्कि विभूतिनारायण राय और रवींद्र कालिया जैसी मानसिकता वाले लोगों को आसानी से छूट जाने के लिए सुरक्षित स्पेस भी मुहैया करा रहे हैं। प्रेमचंद की दुहाई देते हुए वे कहते हैं कि प्रेमचंद स्त्री अस्मिता की रक्षा के लिए हत्या तक को जायज ठहरा जाते हैं। लेकिन कमाल है कि पांडे स्त्री अस्मिता के पक्ष में एक कुलपति और संपादक की बर्खास्तगी की मांग तक नहीं कर सकते। दोनों तरफ की रोटी में हिस्सेदारी के इस सुनियोजित खेल को हिंदी समाज जितनी जल्दी समझ जाए यह उसके हक में है। </p>
<p>कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विभूतिनारायण राय को उनके पद से हटाने के तो पक्ष में हैं, लेकिन रवींद्र कालिया को हटाने की मांग को जायज नहीं मानते। उल्लेखनीय है कि राय का जो बयान छपा है, उसे रवींद्र कालिया अपने उसी अंक के संपादकीय में ‘बेबाक’ करार दे चुके हैं। बेबाक एक सकारात्मक शब्द है। मतलब यह कि जिन बयान को लेकर नौकरी जाने के भय से राय माफी मांग चुके हैं रवींद्र कालिया सोच-समझ कर उसे सही ठहराते हैं। अब दो हμते के बाद इस प्रकरण पर रवींद्र कालिया का माफीनामा भी झूठ के आवरण में लिपट कर आया है, जिसमें बड़ी बेशर्मी से उन्होंने पूरी जिम्मेवारी ‘गर मैं होता तो ऐसा नहीं होता’ की तर्ज पर प्रत्यक्षत: अपनी अनुपस्थिति पर और परोक्षत: अपनी संपादकीय टीम पर डाल दी है। जबकि खबरें यह भी हैं कि रवींद्र कालिया गोवा जाने की पूर्वसंध्या में ही नया ज्ञानोदय का उक्त अंक छपने के बाद अपनी आंखों से देख चुके थे। वैसे भी रवींद्र कालिया के खाते में यह   पहली गलती नहीं है। इसके पहले भी वे लगातार अपने लेखकों का न सिर्फ अपमान करते रहे हैं, बल्कि ज्ञानपीठ जैसे संस्थान में बैठ कर लेखकों की जड़ काटने से लेकर ज्ञानपीठ की साख को बट्टा लगाने तक का काम भी कर चुके हैं जिसके लिए ज्ञानपीठ के न्यासियों को बार-बार अपने लेखकों के आगे शर्मसार भी होना पड़ा है। चाहे वह युवा लेखकों के घोर आपत्तिजनक परिचयों का मामला हो या कृष्णा सोबती और नासिरा शर्मा जैसी वरिष्ठ लेखिकाओं की अवमानना का, इस तरह की ढेर हरकतें लापरवाहियों की नहीं, जानबूझ कर की गई गलतियों की फेहरिस्त हैं, जिनमें से किसी के लिए आज तक उन्हें कोई पछतावा नहीं हुआ।</p>
<p>जब गलती और तथाकथित माफी किसी व्यक्ति के चाल-चरित्र का हिस्सा हो जाए तो उसे माफ करना भी अपराध हो जाता है। भारतीय ज्ञानपीठ, जो अपने लेखकों के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के मानक और प्रतीक के रूप में जाना जाता है, के लिए यह आत्ममंथन का मौका है, अन्यथा देर-सबेर यह प्रश्न भी उठने लगेगा कि वे कौन से कारण हैं कि ज्ञानपीठ जैसी धवल परंपरा वाली संस्था अपने निदेशक-संपादक की इतनी कारगुजारियों के बाद भी उससे मुक्त नहीं होना चाहती? हद तो तब हो जाती है जब विभूतिनारायण राय और रवींद्र कालिया के प्रतिरोध में की गई टिप्पणियों को के. बिक्रम सिंह अशालीन और अशिष्ट बताते हुए इनके पक्ष में थोथी दलीलें देने से भी बाज नहीं आते। उन्हें याद है कि उनकी दादी उन लड़कियों को छिनाल कहा करती थीं, जो बगैर इजाजत लिए या अकेली घर से बाहर चली जाती थीं। कहने की जरूरत नहीं है कि इस शब्द का अर्थ तब भी यही था जो आज समझा जा रहा है, जिसे राय ने खुद आगे की पंक्तियों में ‘कितने बिस्तरों पर कितनी बार’ कह कर खुद ही स्पष्ट कर दिया है। दुखद और खतरनाक है कि निजी हितों के खेल में लगे बुद्धिजीवी आज न सिर्फ शब्दों से उनके अर्थ छीन लेना चाहते हैं, बल्कि उनकी पीठ पर मनमाना अर्थ भी टांकने की कोशिश कर रहे हैं। <em><strong>((जनसत्ता से साभार))</strong></em></p>
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		<title>काशी विद्यापीठ में विभूति को बर्खास्त करने की मांग</title>
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		<pubDate>Sat, 14 Aug 2010 20:43:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[<strong>विजय विनीत ♦ </strong>
छिनाल प्रकरण पर अब पूर्वांचल में भी विरोध तेज हो गया है। वाराणसी में ढाई सौ लेखकों ने विभूति नारायण राय के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया। बैठक की और राष्ट्रपति से इस मामले में न्यायिक जांच करा कर उन्हें बर्खास्त करने की मांग की। नया ज्ञानोदय पत्रिका के सुपर बेवफाई विशेषांक में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय साक्षात्कार पर काशी विद्यापीठ के सभा कक्ष में काशी के सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन हुआ। हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो श्रद्धानन्द ने लेखिकाओं को लेकर विभूति नारायण राय की टिप्पणी को अमर्यादित तथा अशोभनीय करार दिया। उन्होंने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की। सभा में संचालन का दायित्व प्रो सत्यदेव त्रिपाठी को दिया गया। उन्होंने इस विषय पर चर्चा की शुरुआत कराई।

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			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ विजय विनीत ♦ </strong></p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/vibhut-with-shekhawat.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/vibhut-with-shekhawat-300x190.jpg" alt="" title="vibhut with shekhawat" width="300" height="190" class="alignright size-medium wp-image-16229" /></a>छिनाल प्रकरण पर अब पूर्वांचल में भी विरोध तेज हो गया है। वाराणसी में ढाई सौ लेखकों ने विभूति नारायण राय के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया। बैठक की और राष्ट्रपति से इस मामले में न्यायिक जांच करा कर उन्हें बर्खास्त करने की मांग की। नया ज्ञानोदय पत्रिका के सुपर बेवफाई विशेषांक में महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय साक्षात्कार पर काशी विद्यापीठ के सभा कक्ष में काशी के सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन हुआ। हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो श्रद्धानन्द ने लेखिकाओं को लेकर विभूति नारायण राय की टिप्पणी को अमर्यादित तथा अशोभनीय करार दिया। उन्होंने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की। सभा में संचालन का दायित्व प्रो सत्यदेव त्रिपाठी को दिया गया। उन्होंने इस विषय पर चर्चा की शुरुआत कराई।</p>
<p>काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक रामाज्ञा राय ने राय की टिप्पणी को स्त्रियों के विरुद्ध अशोभनीय और अमर्यादित कहा। उन्होंने विभूति नारायण राय को शासन से तत्काल बर्खास्त करने की मांग की। साहित्यकार वाचस्पति ने भी वीएन राय के वक्तव्य की घोर निन्दा की। उन्होंने विष्णु खरे को भी आड़े हाथों लिया। विष्णु खरे ने पूर्वांचल के साहित्यकारों को ‘हुडुक लूलू’ लिखा था। </p>
<p>उर्दू लेखिका शाहिना रिजवी ने कहा कि महिलाओं को छिनाल कहने के लिए विभूति नारायण राय को कड़ा दंड मिलना चाहिए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रो और कवि बलराज पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं राय की टिप्पणी की निन्दा करता हूँ। उन्होंने कुछ हिन्दी के पत्रिकाओं के सम्पादकों पर कुछ महिला लेखिकाओं  को अयोग्य रहते हुए आवश्यकता से अधिक सह देकर प्रमोट करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने हिन्दी साहित्य में घटिया लेखन पर चिंता जताई।</p>
<p>काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की चन्द्रकला त्रिपाठी ने कहा कि महिलाओं के ऊपर राय की भद्दी टिप्पणी कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। उन्होंने मांग की कि राय को उनके पद से तत्काल बर्खास्त किया जाए ताकि भविष्य में यह दुबारा दुहराया न जाए। चम्पा सिंह और श्रद्धा सिंह ने छिनाल कांड को अपमानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया। युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने कहा कि  राय की टिप्पणी महिला  विरोधी है। समूचे स्त्री समाज को अपमानित करना चिंताजनक है और उन्हें सरकार को तत्काल पद से बर्खास्त करना चाहिए। </p>
<p>साहित्यकार दीनबन्धु तिवारी, वशिष्ट नारायण त्रिपाठी, सुरेन्द्र प्रताप चतुर्भुज तिवारी, योगेन्द्र सिंह, रामआसरे यादव, विनीता सिंह, सिद्धार्थ राय ने भी विचार रखे। सबका यही मानना है कि स्त्रियों का अपमान और असंसदीय टिप्पणी के कारण कुलपति का पद कलंकित हुआ है। सभी ने कहा कि वीएन राय के ख़िलाफ़ पूर्वांचल के साहित्यकारों का अभियान जारी रहेगा और जल्दी ही 250 हस्ताक्षरों के साथ एक ज्ञापन मानव संसाधन मंत्रालय और राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। </p>
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		<title>&#8220;छिनाल&#8221; विभूति कांड में राष्ट्रपति भवन तक जुड़ते तार!</title>
		<link>http://www.janatantra.com/news/2010/08/14/sanjeev-chandan-report-on-vibhuti-episode/</link>
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		<pubDate>Sat, 14 Aug 2010 09:38:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजीव चंदन</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह दौरा इतना गुप्त रखा गया कि राष्ट्रपति के पति होने के नाते यह दौरा जिले के पब्लिसिटी ऑफिसर को भी नहीं पता था। दूसरे दिन अखबारों से खबर मिली। शेखावत साहब का यह दौरा अत्यंत चालाकी से संपन्न करवाया गया ताकि विश्वविद्यालय के ढांचागत विकास में खायी गयी रकमों की जानकारी उन्हें न मिले, अब सारी निगाहें मैडम राष्ट्रपति पर टिकी हैं कि वे हिंदी के तमाम मूर्धन्य लेखकों का सम्मान करते हुए राय को अपदस्थ करती हैं या नहीं। हिंदी के अधिकांश चिंतक यदि इस कुलपति के खिलाफ हैं, तो उन्‍हें बनाये रखना किये जा रहे घोटालों को प्रश्रय देना होगा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>♦ संजीव चंदन</strong></p>
<p><div id="attachment_16145" class="wp-caption aligncenter" style="width: 590px"><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/vibhuti-with-shekhawat.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/vibhuti-with-shekhawat.jpg" alt="" title="vibhuti with shekhawat" width="580" height="358" class="size-full wp-image-16145" /></a><p class="wp-caption-text">वर्धा में देवी सिंह शेखावत के साथ विभूति नारायण राय </p></div>
<p><strong>भारत के राष्ट्रपति की</strong> अपनी गरिमा होती है। इस पद पर पहुंच कर व्यक्ति अपने संबंधों से परे हो जाता है। यह हम सब के लिए एक सुखद प्रतीकात्मक संदेश था कि देश के इतिहास में पहली बार कोई महिला राष्ट्रपति बनी। भागीदारी के स्तर पर ही  सही। यह इसलिए भी युगांतकारी घटना थी कि इसने भाषा से लेकर सामाजिक ढांचे तक को प्रश्‍नांकित किया था। एक सीधी सादी सी दिखने वाली महिला का राष्ट्रपति होना, भारत के गांव तक में रहने वाली महिलाओं को सुकून देने वाली परिघटना थी। सत्ता में भागीदारी का अहसास देने वाली परिघटना।</p>
<p><strong>हालांकि विरोधियों ने</strong> अशालीन हमलों के सिलसिले शुरू कर दिये थे, लेकिन प्रतिभा पाटिल के सौम्य व्यक्तित्व के आगे वे सरे हमले निष्प्रभावी हुए।</p>
<p><strong>लेकिन बाद के दिनों</strong> में जब उनके रिश्तेदारों ने इस पद पर उनकी आसीनता को अपना पराक्रम और प्रभाव बनाने के अवसर के रूप में देखना शुरू किया तो प्रथम नागरिक की गरिमा, जिसे हर हाल में एक गर्वोन्नत राष्ट्र धूमिल नहीं होने देना चाहता है, उतना निर्मल नहीं रह सका। श्रीमती पाटिल के बेटे का अमरावती से चुनाव जीतना लोकतंत्र के प्रति आस्थावान लोगों के लिए एक झटका सा था। मैं उन दिनों दिल्ली में था। महाराष्ट्र की काउंटिंग में लोगों की रुचि इस सीट के परिणाम जानने की उत्सुकता के कारण भी थी। राजेंद्र शेखावत के खिलाफ चुनाव हारने पर सुनील देशमुख के लिए हम जैसे कई लोगों के मन में सहानभूति और सम्मान, एक साथ उत्पन्न भाव थे। </p>
<p><strong>मैं वहां से लौटकर</strong> अपने एक मित्र, अशोक मेश्राम, आरपीआई के नेता, के साथ अमरावती सुनील देशमुख से मिलने गया। उस आदमी की जीवटता और कांग्रेस से मिले प्रलोभनों की चर्चा अमरावती के प्रबुद्ध समाज में थी। और जो चर्चा हमने सुनी, वह यह कि अमरावती विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने किस तरह शेखावत परिवार की चापलूसी से तरक्‍की की है, और इसी रास्ते वह हिंदी विश्वविद्यलय का रजिस्ट्रार भी बन बैठा। कैलाश खामरे नाम का यह शख्स ही विभूति के &#8216;छिनाल प्रसंग&#8217; में उनकी डूबती नैया का सहारा बना। बहुत कम लोग जानते है कि संकट में फंसे विभूति ने इसी शख्‍स को वर्धा से बुलवाया और संभवतः बरास्ते देवी सिंह शेखावत (राष्ट्रपति का पति ) कपिल सिब्बल को साधा। इस पूरे प्रकरण का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूं कि मुझे लगता है कि रिश्तेदारी का यह तंत्र प्रथम नागरिक की गरिमा पर चोट पहुंचाने के लिए काफी है और हिंदी विश्वविद्यालय को दारोगा कुलपति की जागीर बनाने के लिए भी। लेकिन उसके पहले देवी सिंह शेखावत और विभूति नारायण राय के रिश्तों का आदि अंत समझ लेना जरूरी है। </p>
<p><strong>विभूति वैसे तो</strong> रिश्तों को अपने हित में भुनाने में उस्ताद रहे हैं, लेकिन इस प्रसंग में मामला दोतरफा लगता है। इनकी पहली मुलाकात नागपुर में हुई थी। उन दिनों विभूति को आये चंद महीने ही हुए थे कि नागपुर में आये शेखावत का बुलावा आया। तब विश्वविद्यालय में नियुक्तियां होनी थीं। नागपुर में विभूति नदीम हसनैन के साथ हाजिर हुए। रास्ते भर ये दोनों यह बात करते गये कि शायद नियुक्तियों के लिए कोई लिस्ट थमाया जाने वाला है या फिर तत्कालीन रजिस्ट्रार की सिफारिश की जाने वाली है। क्योंकि विभूति तत्कालीन रजिस्ट्रार, अनूप पुजारी को चलता करना चाहते थे और पुजारी ने अपने अमरावती कनेक्शन का माहौल बना रखा था। खैर इन्हें बुलाने का एक ही मकसद सामने आया। शेखावत ने एक फाइल देते हुए कहा कि इसे देख लेना, अपने ही बच्चों का है। वह फाइल इंडियन नॉलेज कमिशन की थी, जो सूत्रों के अनुसार अमरावती कनेक्शन रखता है। यह इस विश्वविद्यालय का दुर्भाग्य है कि इसका पहला MOU एक NGO से हुआ। वह भी इस NGO को Maximum आर्थिक लाभ पहुंचाने वाला। वैसे यह MOU पूर्व कुलपति के कार्यकाल में हुआ था, पर इसके विरोध में इस विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ के सचिव, संतोष भदौरिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी तथा जिसके विषय में  स्वयं कुलपति विभूति और प्रतिकुलपति नदीम हसनैन की टिप्‍पणी थी, क्या कोई अपने कार्यकाल को बचाने के लिए इस हद तक गिर सकता है कि वह विश्वविद्यालय को ही गिरवी रख दे?</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Devi-Singh-Shekhawat-in-Wardha.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/08/Devi-Singh-Shekhawat-in-Wardha.jpg" alt="" title="Devi-Singh-Shekhawat-in-Wardha" width="580" height="369" class="aligncenter size-full wp-image-16146" /></a>
<p><strong>खैर जब विभूति गिरे</strong>, तो कुछ ज्यादा ही गिरे। वहां से चलकर ये दोनों इस NGO के खैरख्वाह बन गये और संतोष भदौरिया ने तो पलटी ही मार ली। अब इसमें कितने की बंदरबांट है, वह तो ये दोनों अथवा NGO बता सकता है, और पैसा कहां कहां जाता है, यह proper judicial inquiry ही बता सकती है। फिलहाल उस नागपुर वार्ता का एक और प्रसंग है कि शेखावत साहब ने इन्हें नियुक्तिओं की कोई लिस्ट नहीं दी और अनूप पुजारी के लिए  उन्होंने कहा कि &#8216;मारिये साले को&#8217;।  अब इस बात का हवाला मुझ तक कहां से पहुंचा, यह शेखावत साहब स्वयं पता लगा सकते हैं, क्योंकि ये तीन लोगों के बीच हुआ वार्तालाप है।</p>
<div style="BORDER-RIGHT: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-RIGHT: 15px; BORDER-TOP: rgb(18,115,18) 0px solid; PADDING-LEFT: 15px; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 3px; MARGIN: 5px; BORDER-LEFT: rgb(18,115,18) 0px solid; WIDTH: 365px; LINE-HEIGHT: 190%; PADDING-TOP: 3px; BORDER-BOTTOM: rgb(18,115,18) 0px solid"><img src="http://mohallalive.com/wp-content/uploads/2010/08/Aero1.jpg" alt="" title="Aero" width="40" height="277" class="alignleft size-full wp-image-16424" /><span style="font-size: large;">यह दौरा इतना गुप्त रखा गया कि राष्ट्रपति के पति होने के नाते यह दौरा जिले के पब्लिसिटी ऑफिसर को भी नहीं पता था। दूसरे दिन अखबारों से खबर मिली। शेखावत साहब का यह दौरा अत्यंत चालाकी से संपन्न करवाया गया ताकि विश्वविद्यालय के ढांचागत विकास में खायी गयी रकमों की जानकारी उन्हें न मिले; अब सारी निगाहें मैडम राष्ट्रपति पर टिकी हैं कि वे हिंदी के तमाम मूर्धन्य लेखकों का सम्मान करते हुए राय को अपदस्थ करती हैं या नहीं। हिंदी के अधिकांश चिंतक यदि इस कुलपति के खिलाफ हैं, तो उन्‍हें बनाये रखना किये जा रहे घोटालों को प्रश्रय देना होगा।</span></div>
<p><strong>लेकिन विभूति को</strong> शीघ्र ही पता चल गया कि रजिस्ट्रार वाले मामले में शेखावत साहब ने इतनी उदारता क्यों बरती। शीघ्र ही अमरावती से कैलाश खामरे को रजिस्ट्रार बनाये जाने का दबाव आने लगा। यह दबाव इतना बढ़ा कि विभूति को एक दिन अपने मित्र और तत्कालीन प्रभारी रजिस्ट्रार, राकेश श्रीवास्तव को औचक हटाना पड़ा। सुबह तक श्रीवास्तव को भी इसकी जानकारी नहीं थी। लेकिन सूत्र बताते हैं कि टेलीफोन की एक घंटी बजी और दोपहर में जनाब खामरे पदस्थापित हो गये। हालांकि जनाब खामरे साहब उन तीन आवेदकों में से एक थे, जो इस पद के विज्ञापन के बाद, आवेदन कर चुके थे। लेकिन इनकी नियुक्ति बिना किसी साक्षात्कार के करवा ली गयी और बाद में तीन साल के लिए इन्हें औपचारिक तौर पर नियुक्त कर लिया गया। लगभग एक साल तक काम करने के बाद।</p>
<p><strong>कैलाश खामरे की</strong> नियुक्ति अवैध है।</p>
<p><strong>अमरावती यात्रा के दौरान</strong> जो एक बात और चर्चा में आयी थी वह यह कि जनाब खामरे साहब को फर्जी कास्ट सर्टिफिकेट पेश करने के अपराध में विश्वविद्यालय  से निकला भी गया था, जो बाद में अमरावती दरबार के दरबारियों में शामिल हो लिये। इस खबर की पुष्टि के लिए मैंने सूचना अधिकार के तहत आवेदन कर रखा है। </p>
<p><strong>खामरे विभूति के लिए</strong> बहुत काम के सिद्ध नहीं हुए। मसलन 11 विवादित नियुक्तियों की जो फाइल राष्ट्रपति की अंतिम स्वीकृति के लिए पड़ी है, वह खामरे मूव नहीं करवा पाये, और एमएचआरडी ने उसे रद्द करने का इंटरनल नोट लगा रखा है। कॉपी मेरे पास है। विभूति और हसनैन साहब अनौपचारिक बातों में खामरे को अक्सर निकम्‍मा कहते रहे हैं। फिर भी विभूति का निरंतर प्रयास जारी है। क्योंकि इस शातिर नौकरशाह को पता है कि नेताओं का चापलूस  कुछ कर पाये या नहीं, दो-चार मुलाकातें और छोटे-मोटे काम तो निकलवा ही सकता है। और इसी कड़ी में जनाब ने भाया खामरे, देवी सिंह शेखावत का विश्वविद्यालय में अनौपचारिक दौरा भी करवा लिया। यह दौरा इतना गुप्त रखा गया कि राष्ट्रपति के पति होने के नाते यह दौरा जिले के पब्लिसिटी ऑफिसर को भी नहीं पता था। दूसरे दिन अखबारों से इसकी खबर सार्वजानिक हुई।</p>
<p><strong>शेखावत साहब का यह दौरा</strong> अत्यंत चालाकी से संपन्न करवाया गया, ताकि विश्वविद्यालय के ढांचागत विकास में खायी गयी रकमों की जानकारी उन्हें न मिले। वैसे इस दौरे में कौन किस पर भारी रहा, यह एक जांच का विषय हो सकता है। परंतु रिश्तों की गर्माहट तो कुछ बढ़ी ही। साथ ही जनाब खामरे, जिसे कुलपति, प्रतिकुलपति निजी बातों में निकम्मा कहते रहे हैं, अपनी औकात साबित करने में सफल हुए। अन्यथा वे फाइलें, जो राष्ट्रपति भवन में पेंडिंग हैं, उन्हें खामरे साहब अपने लगभग डेढ़ साल के कार्यकाल में खिसकवा तक नहीं सके, उनमें वर्धा से बाहर के केंद्रों की भी फाइलें हैं। वैसे विश्वविद्यालय झूठ बोलते हुए एक सूचना अधिकार में इन केंद्रों के अस्तित्व को ही नकारता है, और इस नकार की प्रतिलिपि एमएचआरडी को भी भेज चुका है। अब राय ही बता सकते हैं कि उनका एक परमानेंट लेक्‍चरर दिल्ली में कहां और कैसे पदस्थापित है? और भाभा सहित कालिया परिवार को वे किस मद से पेमेंट कर रहे हैं, दिल्ली में बैठकर? वहां ऑफिस क्यों है? और आजमगढ़ से लाया गया फोर्थ ग्रेड कर्मचारी क्यों है? लाखों रुपये का भवन किराया क्यों दिया जा रहा है? ये राय ही बता सकते हैं कि लखनऊ में उनका एक रीजनल डाइरेक्‍टर क्यों पदस्थापित है? और किराया कहां जाता है? वैसे ही इलाहाबाद के केंद्र का पैसा कहां जाता है और संतोष भदौरिया और उनकी टीम कहां पदस्थापित है, यह भी सिर्फ विभूति ही बता सकते है।</p>
<p><strong>तो खामरे ने</strong> अपनी उपयोगिता इस गुप्त दौरे से साबित कर दिया था, इसलिए जब विभूति छिनाल प्रसंग में फंसते पाये गये तो सबसे पहले शेखावत परिवार के इसी दरबारी को दिल्ली तलब किया गया। फिर तो पूरे देश ने देखा कि मंत्री महोदय ने किस तरह रंग बदला। यह जांच का विषय हो सकता है कि इसमें अमरावती कनेक्‍शन का कितना हाथ है। इन सारे प्रसंगों में सबसे खतरनाक है कि विभूति अपने पापकर्म की हिफाजत में प्रथम नागरिक के सम्मान को न लील ले जाएं। वैसे दाद देनी पड़ेगी राष्ट्रपति भवन के संयुक्त सचिव वरुण मित्र को, जिनकी टिप्पणियों के कारण राष्ट्रपति के हाथों फाइलों का गलत निपटारा नहीं हो पा रहा है। वैसे मंत्रालय ने तो कई ऐसे फाइलों को निपटा ही दिया था।</p>
<p><strong>अब सारी निगाहें</strong> मैडम राष्ट्रपति पर टिकी हैं कि वे इस विश्वविद्यालय को एक दारोगा कुलपति की जागीर रहने देती हैं अथवा हिंदी के लगभग मूर्धन्य लेखकों, चिंतकों का सम्मान करते हुए कुलपति को अपदस्थ करती हैं। आखिर हिंदी का यह विश्वविद्यालय बना किसके लिए है? हिंदी के अधिकांश चिंतक मनीषी, यदि इस कुलपति के खिलाफ हैं, तो क्या इसे बनाये रखना किये जा रहे घोटालों को प्रश्रय देना नहीं है? मैडम अपने पति डॉ देवी सिंह शेखावत से भी पूछ सकती हैं कि यदि वे राय के बंगले के करीब से गुजरे होंगे तो दारू की कितनी बोतलें पड़ी थीं वहां। मैडम को तय करना है कि जिस वर्धा में दारू गांधी जी के सम्मान में बंद  है, वहां  राय सहित अधिकांश शिक्षक कर्मी सात बजे के बाद धुत्त हो जाते हैं, तो प्रति दिन इस गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल इस कुलपति को बनाये रखने का क्या औचित्य है?</p>
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