Category archives for: साहित्य

मैं, राज्य की हिंसा का समर्थक विभूति नारायण राय बोल रहा हूं…

मैं साफ तौर पर कह सकता हूं कि कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच मुकाबला है। और मैं हमेशा राज्य की हिंसा का समर्थन करुंगा। राज्य की हिंसा से हम मुक्त हो सकते हैं। इस्लामिक आतंकवाद से हम मुक्त नहीं हो सकते। वहां पर जो भी लोग उनसे असहमति रखते थे, उन सबको आतंकवादियों ने धीरे-धीरे मार दिया। खत्म कर दिया। तो हम जब यहां खड़े हों और माओवाद जैसी चीज पर बात करें, हिंसा पर बात करें तो हमें इक्सट्रीम पर नहीं जाना चाहिए। हमें दोनों हिंसा का विरोध करना होगा। अगर वैदिकी हिंसा… हिंसा है तो अवैदिकी हिंसा… भी हिंसा है।

राठौर भी पुरस्कृत था, राय की तरह माफ क्यों नहीं कर देते?

महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय द्वारा महिलाओं के लिए प्रयुक्त शब्दों को लेकर जब भी उन पर कार्रवाई करने की बात आती है, हर बार उनका बचाव करने वाले लोग यह कहते हुए सामने आ जाते हैं कि विभूति नारायण राय बहुत ही धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हैं। इसके बाद सारा कुछ [...]

“कायर” कालिया ने मांगी माफी, मगर गुनाह “दूसरों” पर थोपा

((नया ज्ञानोदय के संपादकरवींद्र कालिया ने माफी मांगी है। इसी सिलसिले में उन्होंने एक चिट्ठी जनसत्ता को भेजी है। माफी इसलिए नहीं कि उनसे भूल हुई। वो छिनाल कांड से हिंदी साहित्य जगत को कितनी शर्मिंदगी होगी इसका अंदाजा नहीं लगा सके। बल्कि माफी इसलिए कि विभूति नारायण राय का इंटरव्यू उन्होंने पढ़ा नहीं था [...]

क्या साहित्यकारों की हालत वेश्याओं से भी ख़राब है?

विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के कलुषित गठबंधन के विरुद्ध हिंदी में जो कार्रवाई हुई उसने हिंदी लेखक-लेखिकाओं की ताकतों, कमजोरियों और विरोधाभासों को भी उजागर करने में ‘मदद’ की। लेखिकाएं कपिल सिब्बल से मिलीं लेकिन कोई लिखित ज्ञापन नहीं ले गर्इं जिसमें विभूति नारायण के इस्तीफे या बर्खास्तगी की मांग की गई होती। [...]

लेखक होने के वहम ने इस कुलपति की सनक बढ़ा दी

♦ विष्‍णु खरे हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता है कि हम कुछ विचारों, वस्तुओं और व्यक्तियों को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये पूर्वग्रह कभी सकारण होते हैं और कभी नितांत निरंकुश, जिनके लिए उर्दू में ‘बुग्ज-ए-लिल्लाही’ जैसा खूबसूरत पद है। हमें कुछ लोगों का जिक्र करने, उन्हें देखने, उनके साथ [...]

विभूति माफी तो मांग रहे हैं, माफ क्यों नहीं कर देते

अब, जबकि अधिकतर लोगों ने इंटरव्यू पढ़ लिया है, मुझे लगता है उसमें उठाये गए प्रश्नों पर बातचीत होनी चाहिए। संक्षेप में कहूं तो मेरे मन में मुख्य शंका यह है कि महिला लेखन में देह-केंद्रित लेखन को कितना स्थान मिलना चाहिए। एक मित्र ने आपत्ति की कि यह प्रश्न पुरूषों के लेखन पर भी उठना चाहिए। सही है, पर विमर्श सिर्फ वंचित या हाशिए पर पहुंचे हुए तबकों के लेखन से निर्मित होता है।

विभूति-कालिया के बचाव का भाषासेतु

भाषासेतु— साक्षात्कार में उपयुक्त आपत्तिजनक शब्दों की हम भर्त्सना करते हैं, फिर भी संपादक और लेखक द्वारा खेद प्रकट करने के बावजूद कुछ रचनाकारों द्वारा एक संचार पत्र समूह विशेष में लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।

दिल्ली में साहित्यकारों ने बैठक कर “लंपट” VC के ख़िलाफ़ मुहिम तेज की

विभूति नारायण राय का घेराव तेज हो रहा है। लेखिकाओं को छिनाल कह कर पूरे हिंदी समाज को अपमानित करने वाले विभूति नारायण राय के विरुद्ध अभियान को तेज करने का फैसला लिया गया है। इसी सिलसिले में आज दिल्ली के कॉफीहाउस में बैठक हुई। इस बैठक में मैत्रयी पुष्पा, अंजलि सिन्हां, अनीता भारती, तब्बसुम, [...]

छिछोरेपन के विरुद्ध खड़े साहित्यकारों, पत्रकारों में आपका नाम कहां हैं?

आज जनसत्ता में एक सूची छपी है। उन लोगों की जो हिंदी साहित्य के छिनाल-विभूति अध्याय के विरुद्ध खड़े हैं। वो मानते हैं कि विभूति नारायण राय ने हिंदी लेखिकाओं को छिनाल कह कर अपनी मानसिकता का परिचय दिया है और ऐसे मानसिक रोगी को किसी भी विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर बने रहने [...]

सब सवाधान रहो, कल कालिया तुम्हें भी बेवफा घोषित करेगा

बेवफा बुद्ध, बेवफा शमशेर रवींद्र कालिया जब से ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक बने हैं तब से हिंदी कहानी को तो उनकी नजर लग ही गई है। साथ ही उसके बाजारू होने की गति भी तेज हो ही गई है। पर कवियो, सावधान। हिंदी कविता पर भी कालिया की नजर पड़ चुकी है। ‘नया ज्ञानोदय’ के [...]

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