पीपली लाइव “इन्क्वायरिंग माइंड” की फिल्म है। हममें से कुछ लोग जो काम सोशल एक्टिविज्म, आरटीआई, ब्लॉग्स,फेसबुक,ट्विटर के जरिए करने की कोशिश करते हैं,वो काम अनुषा रिजवी,महमूद फारुकी और उनकी टीम ने फिल्म बनाकर की है। इसलिए हम जैसे लोगों को ये फिल्म बाकी फिल्मों की तरह कैरेक्टर के स्तर पर खुद भी शामिल होने [...]
आईपैड, इंटरनेट, सोशल मीडिया और मोबाइल एप्लीकेशन के इस दौर में अखबारों की मांग भले ही कम हो रही है लेकिन अमेरिकी संसद हर महीने 12 लाख डॉलर विभिन्न तरह के अखबारों पर खर्च करती है। अमेरिकी संसद जिन बडे़ अखबारों की ग्राहक है, इनमें ‘द न्यूयार्क टाइम्स’ और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ शामिल हैं। न्यूयार्क टाइम्स [...]
Aug 14 2010 | Posted in
मीडिया |
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आज जहां लोगों में अखबार पढ़कर फेंक देने या एक-दो महीने बाद उन्हें बेच देने की प्रवृत्ति घर कर गई है वहीं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखण्ड निवासी जय प्रकाश नारायण आजाद 65 वर्षों से अखबार सहेजने में लगे हैं। आज इनके पास विभिन्न तरह के एक लाख से ज्यादा समाचार पत्रों का [...]
Aug 14 2010 | Posted in
तीर-ए-नज़र,
मीडिया |
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फिल्म पीपीली लाइव के इस शो में इंटरवल के दौरान पीवीआर साकेत के पर्दे पर लुई फिलिप, बिसलरी और अल्सायी हुई लड़की के साथ पल्सर के विज्ञापन नहीं आते हैं। न ही एक तरफ फुफकारती हुई डंसने पर आमादा नागिन और दूसरी तरफ सुर्ख लाल पानी से भरी बोतल, जिसे दिखाकर सरकार हमारे बीच चुनने [...]
केरल में मीडिया उद्योग के अगुवा और मलयालम मनोरमा के प्रधान संपादक के. एम. मैथ्यू का रविवार तड़के उनके आवास पर निधन हो गया। वह 93 वर्ष के थे। जीवन के अंतिम दिनों तक मैथ्यू पत्रकारिता से जुड़े रहे और कुछ सप्ताह पहले तक वह दफ्तर में खबरों पर चर्चा करते रहे। मैथ्यू विशेषतौर पर [...]
स्वामी अग्निवेश ने हंस की गोष्ठी में एक संदर्भ का जिक्र किया था। जब हेमचंद्र पांडे की लाश को दिल्ली लाया गया, तो यह सवाल उठा कि आखिर उस लाश को रात भर रखेगा कौन। स्वामी अग्निवेश ने इस संदर्भ में बड़े मार्के की बात कही, जो जितनी सामान्य है, उतनी ही प्रासंगिक भी- तमाम [...]
हिंदुस्तान में उत्तरपूर्व के अलावा छत्तीसगढ़ और कश्मीर वे जगहें हैं, जहां कानून हमेशा मुल्तवी रहता है। जम्हूरियत का मूल आधार आज कंसंट्रेशन कैंप हो गया है। राज्यसत्ताएं आज बहुत बारीकी से चीजों में फर्क करती हैं और वो जानती हैं इस पूरी जम्हूरियत का तानाबाना जम्हूरी अधिकारों को मुल्तवी करके ही कायम रखा जा [...]
हिंदी लिटरेचर की दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच कही जानेवाली पत्रिका हंस की संगोष्ठी में जो नजारा हमने देखा, उससे एक साथ कई चीजें तार-तार हो गयीं। इस संगोष्ठी को मैं अपनी याददाश्त बरकरार रहने तक लोकतंत्र के मूल्यों की सरेआम धज्जियां उड़ानेवाली संगोष्ठी के तौर पर याद रखूंगा। ये मैंने अपने अकादमिक जीवन [...]
हंस की सालाना गोष्ठी हंगामेदार रही। पूर्व आईपीएस अधिकारी और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय और नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता गोष्ठी के बीच से “चोर” की तरह भागे। नई दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में राजेंद्र यादव समेत कुल छह वक्ताओं ने अपनी राय रखी। [...]
इंडियन एक्सप्रेस समूह के दिल्ली संस्करण में छह सौ पत्रकार गैर पत्रकार कर्मचारियों में दो सौ वेज बोर्ड के दायरे में हैं, जो महीने के अंत में उधार लेने पर मजबूर हो जाते हैं। दूसरी तरफ बाकि चार सौ में तीन सौ का वेतन एक लाख रुपए महीना है। हर अखबार में दो वर्ग बन गए है।