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	<title>जनतंत्र &#187; रागरंग</title>
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	<description>बोल के लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>पवित्र बंधन में बंधकर एक दूजे के हुए भूपति,लारा</title>
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		<pubDate>Wed, 16 Feb 2011 19:52:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<category><![CDATA[पवित्र बंधन में बंधकर एक दूजे के हुए भूपति]]></category>
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		<description><![CDATA[भारतीय टेनिस जगत के नामचीन सितारे महेश भूपति और बालीवुड स्टार लारा दत्ता बुधवार को शादी के पवित्र बंधन में बंध गए। भूपति और पूर्व मिस यूनिवर्स लारा दोनों ने बुधवार को माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट टिवटर पर इसकी आधिकारिक घोषणा की। उन्होंने लिखा, दोस्तों अब हम मिस्टर और मिसेज भूपति हो गए हैं। इससे पहले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/lara_bhupathi.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/lara_bhupathi.jpg" alt="" title="lara_bhupathi" width="265" height="230" class="alignright size-full wp-image-21604" /></a><strong>भारतीय </strong>टेनिस जगत के नामचीन सितारे महेश भूपति और बालीवुड स्टार लारा दत्ता बुधवार को शादी के पवित्र बंधन में बंध गए।</p>
<p><strong>भूपति </strong>और पूर्व मिस यूनिवर्स लारा दोनों ने बुधवार को माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट टिवटर पर इसकी आधिकारिक घोषणा की। उन्होंने लिखा, दोस्तों अब हम मिस्टर और मिसेज भूपति हो गए हैं।</p>
<p><strong>इससे </strong>पहले कई महीनों की अटकलों के बाद इस बहुचर्चित प्रेमी जोड़े ने पिछले साल सितंबर में सगाई का खुलासा किया था। ट्विटर पर जारी शादी की तस्वीर में महेश भूपति क्रीम कलर का कोट पहने हुए हैं जबकि लारा दत्ता परंपरागत भारतीय साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही हैं।</p>
<p><strong>भूपति</strong> ने शादी के इस कार्यक्रम से मीडिया को दूर रखा था। उन्होंने कहा, मीडिया दावा कर रहा है कि वह हर चीज जान रहा है, जैसे लोग क्या पहन रहे हैं और कौन आ रहा है। मेरा कहना है कि यह सब हास्यास्पद है, धोखा है और इस सर्कस का मैं मजा ले रहा हूं।</p>
<p> एजेंसियां</p>
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		<title>मलयाली कवि कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Feb 2011 16:51:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>राकेश कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मलयाली कवि और गीतकार ओ एन वी कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया है। मलयाली साहित्य में अमूल्य योगदान के लिये सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार ओ एन वी कुरूप को शुक्रवार को तिरूवनंतपुरम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2007 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर प्रदानमंत्री ने कहा कि केरल ने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/kurup.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/02/kurup.jpg" alt="" title="kurup" width="265" height="230" class="alignright size-full wp-image-21564" /></a><strong>मलयाली </strong>कवि और गीतकार ओ एन वी कुरूप को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया है।</p>
<p><strong>मलयाली </strong>साहित्य में अमूल्य योगदान के लिये सुप्रसिद्ध कवि एवं गीतकार ओ एन वी कुरूप को शुक्रवार को तिरूवनंतपुरम में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2007 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया।</p>
<p><strong>इस </strong>अवसर पर प्रदानमंत्री ने कहा कि केरल ने देश की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धरोहर और रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने की दिशा में उत्कृष्ठ योगदान दिया है।</p>
<p><strong>उन्होंने </strong>कहा कि भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन दिये जाने का कार्य एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें काफी काम किये जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘ भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इसके विभिन्न आयामों की समझ होना जरूरी है जो हमारी समावेशी संस्कृति की झलक पेश करता हो।’’</p>
<p><strong>सिंह </strong>ने कहा कि शिक्षित भारतीय पश्चिम के प्रसिद्ध लेखकों की कृति से परिचित है लेकिन उन्हें भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ठ योगदान देने वाले साहित्यकारों के बारे में कम जानकारी है। हाल के वर्षो में भारतीय लेखकों ने अंग्रेजी में देश और देश से बाहर अपनी ख्याति अर्जित की है लेकिन भारतीय भाषाओं में प्रतिभाओं को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है।</p>
<p><strong>प्रधानमंत्री </strong>ने कहा कि कुरूप की कविताओं का बंगाली, मराठी अथवा अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। कुरूप को मलयाली साहित्य के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए 43वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। कुरूप मलयाली साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले केरल के पांचवें साहित्याकार है।</p>
<p><strong>प्रधानमंत्री </strong>मनमोहन सिंह ने तिरूवनंतपुरम में एक समारोह में कुरूप को पुरस्कार प्रदान किया। पुरस्कार के तहत एक प्रशस्तीपत्र, कांसे से बनी देवी सरस्वती की प्रतिमा और धनराशि प्रदान की जाती है। समारोह में अन्य लोगों के अलावा केरल के राज्यपाल आर एस गवई और मुख्यमंत्री वी एस अच्यूतानंदन भी उपस्थित थे।</p>
<p><strong>कुरूप</strong> मलयाली साहित्य के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है जिन्हें पद्मश्री और पद्म विभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। मलयाली सिनेमा में उनका उल्लेखनीय योगदान है और उन्होंने 232 फिल्मों के लिये 900 से अधिक गाने लिखे हैं। फिल्म वैशाली में उनके लिखे गीत को 1989 में राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका अहम योगदान है और वह विभिन्न स्तरों पर प्राध्यापक रह चुके हैं।</p>
<p>एजेंसियां</p>
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		<title>सदा के लिए शांत हो गयी “अरे-रई-रई” की आवाज</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Jan 2011 03:27:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मधुबन (मऊ) : पूर्वांचल की माटी की खुशबू विदेशों तक अपने गायन के जरिये पहुंचाकर भोजपुरी जगत में अलग मुकाम हासिल करने वाले बालेश्वर की बीमारी के चलते लखनऊ में रविवार की सुबह हुई मौत से पूरा क्षेत्र ही क्या पूर्वांचल स्तब्ध रह गया। उनके गांव चचाईपार में पहुंचकर शोक जताने वालों का तांता लग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/baleshwar_yadav.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/baleshwar_yadav-300x166.jpg" alt="" title="baleshwar_yadav" width="300" height="166" class="alignright size-medium wp-image-21466" /></a>मधुबन (मऊ) : पूर्वांचल की माटी की खुशबू विदेशों तक अपने गायन के जरिये पहुंचाकर भोजपुरी जगत में अलग मुकाम हासिल करने वाले बालेश्वर की बीमारी के चलते लखनऊ में रविवार की सुबह हुई मौत से पूरा क्षेत्र ही क्या पूर्वांचल स्तब्ध रह गया। उनके गांव चचाईपार में पहुंचकर शोक जताने वालों का तांता लग गया। सोमवार को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए उनके भतीजे शिवशंकर सहित उनके सगे संबंधी लखनऊ रवाना हो गये।<span id="more-21465"></span></p>
<p>सन 1942 में क्षेत्र के बदनपुर में दुर्जन के पुत्र के रूप में जन्मे बालेश्वर तीन भाइयों में दूसरे स्थान पर थे। इनके बड़े भाई वंशीधर और छोटे भाई नागेश्वर पहले ही निधन हो चुका है। वह पत्‍‌नी छंगुरी देवी और तीन पुत्रों राजेश, अवधेश, मिथिलेश के साथ लखनऊ में ही रहते थे। इनके दो पुत्र व्यवसाय करते हैं वहीं मझले अवधेश इनके साथ ही लोकगीत गायन की विधा से जुडे़ है। घर पर बने बिरहा भवन में इनके भतीजे शिवशंकर रहते हैं।</p>
<p>बाल्यकाल से ही समाज में व्याप्त रीति-रिवाजों को लेकर गीत बनाने व गाने के शौकीन बालेश्‍वर को पूर्व सांसद स्व झारखंडेय राय ने राजनीतिक मंच देते हुए इनकी गायकी को लखनऊ में पहचान दिलायी थी। तबसे उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सन 80 और 90 के दशक में वह पूर्व मंत्री कल्पनाथ राय के संपर्क में आये और विपक्षी दलों पर अपने बिरहा के माध्यम से करारा प्रहार किया। इसी दौरान उन्हें मारीशस और हालैंड में गाने का मौका मिला। 7 जुलाई 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यश भारती पुरस्कार प्रदान कर इनकी प्रतिभा को सम्मानित किया था।</p>
<p>इतना बड़ा मुकाम हासिल करने के बावजूद वह गांव की माटी और बोली को नहीं भूल सके। उनके मृदुभाषी स्वभाव का हर कोई कायल था। आज उनकी मौत पर बुजुर्गो के साथ ही बच्चे भी आंसू बहा रहे थे और सबके मुंह से यही निकल रहा था कि अब नहीं सुनाई देगी अरे-रई-रई की आवाज।</p>
<blockquote><p>सौजन्‍य : दैनिक जागरण, बनारस एडिशन सूचना : अजय सिंह, संवाददाता, एनडीटीवी, बनारस</p></blockquote>
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		<title>ऑस्कर में भी भिड़ेंगे बॉलीवुड के दो खान: &#8216;माई नेम इज खान&#8217; और पीपली लाइव के बीच होगा मुकाबला</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Jan 2011 11:01:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इस साल के ऑस्कर पुरस्कारों के दौरान मुख्य कैटगरी जैसे &#8216;बेस्ट फिल्म ऑफ द ईयर&#8217; के तहत शाहरूख खान अभिनीत फिल्म माइ नेम इज खान और आमिर खान अभिनीत फिल्म पीपली लाइव के बीच मुकाबला होगा। मशहूर फिल्म निर्देशक और निर्माता करन जौहर की फिल्म &#8216;माई नेम इज़ खान&#8217; देर से ही सही लेकिन ऑस्कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/oskar.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2011/01/oskar.jpg" alt="" title="oskar" width="264" height="191" class="alignright size-full wp-image-21435" /></a><strong>इस </strong>साल के ऑस्कर पुरस्कारों के दौरान मुख्य कैटगरी जैसे &#8216;बेस्ट फिल्म ऑफ द ईयर&#8217; के तहत शाहरूख खान अभिनीत फिल्म माइ नेम इज खान और आमिर खान अभिनीत फिल्म पीपली लाइव के बीच मुकाबला होगा। मशहूर फिल्म निर्देशक और निर्माता करन जौहर की फिल्म &#8216;माई नेम इज़ खान&#8217; देर से ही सही लेकिन ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नॉमिनेट की गई है। </p>
<p><strong>अब</strong> यह फिल्म ऑस्कर पुरस्कारों के दौरान मुख्य कैटगरी जैसे &#8216;बेस्ट फिल्म ऑफ द ईयर&#8217; के तहत कई बड़ी फिल्मों के साथ होड़ करेगी। वैसे, भारत की तरफ से आधिकारिक तौर पर आमिर खान की फिल्म &#8216;पीपली लाइव&#8217; को ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजा जा चुका है।</p>
<p><strong>माई </strong>नेम इज़ खान ऑस्कर पुरस्कार के तहत कई श्रेणियों में नामांकित हुई है। गौरतलब है कि फिल्म &#8216;माई नेम इज़ खान&#8217;  में 9/11 के बाद अमेरिका के हालात में अस्पर्जर नाम की बीमारी से पीड़ित रिजवान खान के संघर्ष की कहानी है। रिजवान खान की भूमिका शाहरुख खान ने निभाई है।  </p>
<p><strong>करन </strong>जौहर ने इस खबर पर खुशी जताते हुए कहा, &#8216;माई नेम इज़ खान की शुरुआत एक आंदोलन के तौर पर हुई थी और आज यह देखकर अच्छा लग रहा है कि यह फिल्म ऑस्कर की सभी श्रेणियों में नामांकित हुई है। विश्व मंच पर फिल्म को इस तरह की स्वीकार्यता मिलने पर मुझे बहुत खुशी हो रही है।&#8217;  </p>
<p><strong>रिमांडर</strong> श्रेणी में &#8216;माई नेम इज़ खान&#8217; के अलावा &#8216;ब्यूटीफुल&#8217;, &#8216;क्लैश ऑफ द टाइटंसस&#8217;, &#8216;द एक्सपेंडेबल्स&#8217;, &#8216;फेयर गेम्स&#8217;, &#8216;इंसेप्शन&#8217;, &#8216;आयरन मैन 2&#8242; जैसी फिल्में शामिल हैं।  &#8216;माई नेम इज़ खान&#8217; को धर्मा प्रॉडक्शन के बैनर तले बनाया गया था। फिल्म का वितरण फॉक्स स्टार एंटरटेन्मेन्ट ने किया था, जो हॉलीवुड की मशहूर फिल्म निर्माण और वितरण करने वाली कंपनी है।</p>
<p><strong>इससे </strong>पहले सितंबर, २०१० में गरीबी से तंग आकर किसान की आत्महत्या की कोशिश और उसके मीडिया कवरेज की कहानी पर आधारित &#8216;पीपली लाइव&#8217; को २०११ के ऑस्कर पुरस्कारों के लिए &#8216;सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म&#8217; की कैटगरी में नामित किया गया था। इस फिल्म का निर्देशन अनुशा रिजवी ने किया है। छोटे बजट की फिल्म पीपली लाइव को भारत में काफी पसंद किया गया था।</p>
<p>एजेंसियां   </p>
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		<title>भोजपुरी सिनेमा की पहली कथा यहां है, आप दूसरी कहें</title>
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		<pubDate>Fri, 31 Dec 2010 06:13:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>आलोक रंजन</dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन दस्‍तावेजी है, क्‍योंकि इसके पन्‍ने पीले पड़ चुके हैं। भोजपुरी फिल्‍मों का बाजार तो बन गया है, लेकिन जैसा कि समय के दस्‍तावेजीकरण का दुख सब जगह पसरा हुआ है, भोजपुरी भी इससे अछूता नहीं है। कुछ समय पहले वरिष्‍ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने अपने फेसबुक पर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>यह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन दस्‍तावेजी है, क्‍योंकि इसके पन्‍ने पीले पड़ चुके हैं। भोजपुरी फिल्‍मों का बाजार तो बन गया है, लेकिन जैसा कि समय के दस्‍तावेजीकरण का दुख सब जगह पसरा हुआ है, भोजपुरी भी इससे अछूता नहीं है। कुछ समय पहले वरिष्‍ठ सिने पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने अपने फेसबुक पर भोजपुरी के पहले सिनेमा की कहानी का यह पहला पन्‍ना जारी किया था। उनकी टिप्‍पणी थी&#8230;</em></p>
<p><em></p>
<div style="padding-right: 15px; padding-left: 15px; float: right; padding-bottom: 3px; margin: 5px; width: 530px; line-height: 165%; padding-top: 3px; border: #127312 0px solid;">कल भोजपुरी के मौखिक इतिहासकार आलोक रंजन के साथ बैठक हुई। पच्‍चीस साल पहले उनके लिखे एक पायनियर लेख का पहला पृष्‍ठ&#8230; क्‍या आप नहीं चाहेंगे कि वे भोजपुरी फिल्‍मों का कालक्रमिक इतिहास लिखें? प्‍लीज, उनसे आग्रह करें कि वे इस इतिहास को लिपिबद्ध करें।</div>
<p></em><em><span style="color: #c0c0c0;">-</span><br /> <br />
आलोक जी इतिहास तो जरूर लिखें, लेकिन आप तमाम पाठकों से भी अनुरोध है कि भोजपुरी फिल्‍मों के जो छुपे हुए या कम जाने पन्‍ने आपलोगों के पास पड़े हुए हैं, उन्हें हमारे साथ जनतंत्र पर साझा करें। हम इसे प्रिंट वर्जन में भी लाएंगे : <strong>मॉडरेटर</strong></em></p>
</blockquote>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo.jpg" alt="" title="ganga_maiya_tohe_piyari_chadhaibo" width="300" height="301" class="alignright size-full wp-image-21381" /></a>
<p><span style="float: left; color: #000000; font-size: 40px; line-height: 35px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; font-family: Times, serif, Georgia;">19</span>87, यानी भोजपुरी फिल्‍मों का रजत जयंती वर्ष। 24 वर्षों की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा तय करने के बाद भोजपुरी फिल्‍में आज उस सुखद ऐतिहासिक स्थिति में पहुंच गयी है, जहां उसके सांस्‍कृतिक अस्तित्‍व और व्‍यावसायिक महत्‍व से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन इसी फिल्‍म महानगरी में पांचवें दशक के अंत तक किसी को इस बात का यकीन नहीं था कि उत्तर पूर्व भारत की इस लोकप्रिय बोली में कभी किसी फिल्‍म का निर्माण भी किया जा सकता है। इस शंका और अविश्‍वास के पीछे मूल रूप से यही धारणा काम कर रही थी कि भोजपुरी एक ऐसी ग्रामीण बोली है, जो लोकगीतों और धुनों के लिहाज से तो बेशक समृद्ध है, परंतु, सामाजिक संदर्भ में बातचीत के दौरान जिसका इस्तेमाल व्‍यक्ति को फूहड़ और गंवार ही जाहिर करता है। भोजपुरी की सांस्‍कृतिक परंपराओं एवं इसके प्रकाशित साहित्‍य से अनजान होने की अज्ञानता इस अधकचरी जानकारी की मूल वजह थी। उस वक्‍त किसी से भोजपुरी फिल्‍म निर्माण की संभावना पर विचार करने कहना भी एक तरह से अपना माखौल उड़वाना ही था। इसलिए वैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में इस नयी भाषा में फिल्‍म बनाने की कोशिश वही शख्‍स कर सकता था, जिसे एक तरफ जहां इसकी संस्‍कृति और परंपरा से गहरा लगाव हो, वहीं दूसरी ओर इसके परिवेश और संस्‍कारों के साथ उसकी गहरी आत्‍मीयता भी हो। सौभाग्‍य से हिंदी फिल्‍मोद्योग में तब तक कुछ ऐसी प्रतिभाओं ने अपनी पुख्‍ता पहचान बना ली थी। ऐसे लोगों में सर्वाध‍िक चर्चित व्‍यक्तित्‍व था, गाजीपुर निवासी नजीर हुसैन का। वे सिर से पांव तक भोजपुरी के संस्‍कारशील रंगों में रंगे हुए थे। भोजपुरी उनकी मातृभाषा थी और उन्‍हें अपनी इस बोली तथा इसकी सांस्‍कृतिक परंपराओं से वैसा ही सच्‍चा, गहरा लगाव था, जैसा मां-बेटे के पवित्र, नि:स्‍वार्थ संबंध में होता है।</p>
<p><span style="font-size: large;">जद्दनबाई की दस्‍तक</span></p>
<p><strong>यों</strong>, ऐतिहासिक तथ्‍यों की दृष्टि से भोजपुरी फिल्‍म का ख्‍याल सबसे पहले जिसके जहन में आया, वह शख्‍सीयत थी अपने वक्‍त की अजीम फिल्‍मी हस्‍ती और मशहूर अदाकारा नरगिस की मां जद्दनबाई। हिंदी फिल्‍मों में पूरबी गीत-संगीत तथा संवादों के व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर व्‍याप्‍त इसकी लोकप्रियता ने जद्दनबाई के दिल में यह कसक पैदा कर दी थी कि उनकी इस अपनी मीठी-शोख बोली में कोई फिल्‍म क्‍यों नहं बनती है? जब अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्‍में बनायी जा सकती हैं, तब भोजपुरी जैसी विस्‍तृत क्षत्र में बोली-समझी जाने वाली भाषा में फिल्‍म क्‍यों नहीं बनायी जा सकती है? इसी कसक से उद्वेलित होकर वे अपने संपर्क में आये हर भोजपुरी बोलने, समझने वाले फिल्‍मकर्मी को इस बाबत प्रेरित करती रहती थीं। वे समझाती थीं कि भोजपुरी बोलने और समझने वाले तो तकरीबन संपूर्ण हिंदी प्रदेशों में कमोबेश फैले हुए हैं। इसलिए आर्थिक दृष्टि से भी यह सौदा घाटे का नहीं होगा। जरूरत महज इस बात की है कि कोई साहसी, धैर्यवान और मेहनती आदमी इस ओर पहल करे। जद्दनबाई के अलावा विशुद्ध बनारसी और विलक्षण प्रतिभाशाली कलाकार कन्‍हैयालाल भी इस दिशा में पांव आगे बढ़ाने के लिए लोगों को प्रेरित करते रहे। फिल्‍म बनाने के मुताबिक ये दोनों अगर व्‍यावहारिक स्‍तर पर स्‍वयं कोई सार्थक कोशिश नहीं कर पाये तो इसकी एकमात्र वजह थी, इनकी निजी सीमाएं और उम्रगत विवशताएं।</p>
<p><span style="font-size: large;">ख्‍वाब को हकीकत में बदलने की तड़प</span></p>
<p><strong>जद्दनबाई</strong> और कन्‍हैयालाल ने उत्‍प्रेरक की भूमिका निभाते हुए चाहे चंद लोगों को ही सही, पर इस ओर कम से कम सोचने को बाध्‍य तो कर ही दिया। तब इन्‍हें पता नहीं था कि भोजपुरी में फिल्‍म निर्माण का जो खयाल इनकी आंखों में किसी सुनहरे ख्‍वाब की शक्‍ल में बसा हुआ था, उसे हकीकत में तब्‍दील करने के लिए भोजपुरी मिट्टी का एक सच्‍चा सपूत बहुत जल्‍द ही अपनी कमर कस कर निकल पड़ेगा। वह शख्‍स, जिसके पूरे वजूद को इस खयाल ने रूहानी और जिस्‍मानी दोनों तौर पर बेहद बेचैन और परेशान कर रखा था, उसका नाम था, नजीर हुसैन। उन्‍हें भोजपुरी फिल्‍म बनाने की प्रेरणा देशरत्‍न डॉ राजेंद्र प्रसाद के सान्निध्‍य से मिली थी। सबसे पहले उन्‍होंने राजेंद्र बाबू के समक्ष जब अपना यह विचार प्रकट किया था, तब देशरत्‍न ने कहा था, &#8220;बात तs बहुत नीक बा, बाकी एकरा ला बहुत हिम्‍मत चाहीं। ओतना हिम्‍मत होखे तs जरूर बनाईं।&#8221; राजेंद्र बाबू की इसी बात ने जल्‍दी से जल्‍दी भोजपुरी फिल्‍म बनाने के लिए उन्‍हें परेशान कर रखा था।</p>
<p><strong>नजीर साहब</strong> हिंदी फिल्‍मों के मशहूर चरित्र अभिनेता होने के साथ साथ एक संवेदनशील लेखक भी थे। ग्रामीण पृ‍ष्‍ठभूमि से संबंधित होने के कारण उन्‍होंने भोजपुरी भाषी क्षेत्रों की विवश स्थितियों और सामाजिक समस्‍याओं को न सिर्फ करीब से देखा-परखा था बल्कि अंदरूनी तौर पर उनकी तपिश भी महसूस की थी। इसी तपिश को उन्‍होंने एक ऐसी कहानी के सांचे में ढाला था, जो उनकी जुबान से सुनने पर कहानी नहीं वरन भोजपुरी इलाकों को साफ, सच्‍ची और जीती जागती तस्‍वीर मालूम पड़ती थी। इसके ग्राम्‍यबोध के कारण वे इसे भोजपुरी में ही बनाने को संकल्पित थे। इसी भावना के साथ उन्‍होंने यह कहानी कई निर्माताओं को सुनायी। कई लोग हिंदी में इसके फिल्‍मांकन के लिए तैयार हो गये लेकिन, भोजपुरी जैसी नयी भाषा में फिल्‍म बनाने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। सब की नजरों में यह एक जोखिम भरा काम था। जहां लीक पीटने की प्रवृत्ति कई दशकों से स्‍वभाव और संस्‍कार में शामिल हो चुकी हो, वहां एक नयी लीक गढ़ने में ऐसी मुश्किलों से वास्‍ता पड़ना बहुत सहज-सामान्‍य बात ही थी। इसी कारण हर ओर से मिलती निराशा के बावजूद नजीर साहब हताश नहीं हुए। विमल राय जैसे ख्‍यातिलब्‍ध निर्देशक ने उस कहानी पर हिंदी फिल्‍म बनाने की पेशकश की पर, इस सम्‍मानजनक प्रस्‍ताव की कद्र करते हुए भी उन्‍होंने अपना इरादा बदस्‍तूर बरकरार रखा। पता नहीं किस आत्मिक शक्ति की वजह से उन्‍हें बराबर यह यकीन बना रहा कि कभी न कभी तो कोई ऐसा व्‍यक्ति मिलेगा, जो उन्‍हीं की तरह बुलंद हौसलेवाला सच्‍चा भोजपुरिया होगा। नतीजन वे अपनी जिद पर अड़े रहे कि, इ फिलिमिया चाहे जहिया बनी, बाकी बनी तs भोजपुरिये में।</p>
<p><strong>वक्‍त की रफ्तार</strong> के साथ-साथ निर्माता ढूंढ़ने की कोशिश भी अनवरत आगे बढ़ती रही। यह एक ऐसी अंधेरी यात्रा थी, जिसकी सुबह कब, कैसे और कहां होगी, सिवा ऊपरवाले के और किसी को इसकी कोई खबर नहीं थी। चारों ओर बस एक दर्दीला सन्‍नाटा पसरा हुआ था। ऐसे अंधेरे सफर में नजीर साहब के हमसफर बने असीम कुमार, जो तब हिंदी फिल्‍मों के एक नामचीन अदाकार हो चुके थे। बनारसी होने और विमल राय की कई फिल्‍मों में साथ काम करने के कारण इन दोनों में अच्छी नजदीकी कायम हो गयी थी। नजीर साहब ने अपनी इस भावी फिल्‍म में उन्‍हें हीरो बनाने का फैसला भी कर लिया था। उन दिनों अपनी हर मुलाकात में वे असीम कुमार को कहते, &#8220;अरे असीमवा! कोई मिल जाय त कइसहुं इ फिलिमिया बना लीहीं&#8230;&#8221; निर्माता तो खैर वर्षों तक नहीं मिला, पर इसी दरम्‍यान नजीर हुसैन से मिलने एक ऐसे सज्‍जन आये जो जद्दनबाई से प्रेरित होकर खुद ही भोजपुरी फिल्‍म के सूत्रधार बनने के कल्‍पनालोक में पूरी तरह खोये हुए थे। ये थे, मुंगेर, बिहारवासी बच्‍चा लाल पटेल। यों तो पटेल ने लंकादहन जैसी कुछ पौराणिक फिल्‍मों में अभिनय भी किया था लेकिन मूलत: वे फिल्‍मों के निर्माण-प्रबंधन, नियंत्रण और वितरण कार्यों से संबंधित थे। इसलिए बिहार, बंगाल के कई फिल्‍म वितरकों से उनकी अच्‍छी-खासी जान-पहचान थी। फिल्‍मोद्योग में नजीर साहब की कहानी की चर्चा ही उन्‍हें उन तक खींच लायी थी। उन्‍होंने कहानी सुनी और पसंद भी कर ली। बावजूद इसके बात आगे नहीं बढ़ पायी, क्‍योंकि पूरी फिल्‍म बनाने लायक पूंजी पटेल के पास भी नहीं थी। लेकिन वे एक जुगाड़ी आदमी थे और उन्‍हें अपनी इस प्रतिभा पर पूरा ऐतबार था। लिहाजा नजीर साहब को आश्‍वस्‍त कर वे अपने ढंग से किसी ऐसे पूंजीदाता की तलाश में लग गये जो इस मुतल्लिक उनकी सहायता कर सके। इस आशावादी मुलाकात से रोमांचित हुए बगैर नजीर हुसैन आगे की यात्रा तय करते रहे क्‍योंकि फिल्‍मोद्योग के अपने पुराने अनुभवों से वे जान चुके थे कि यहां जब तक कुछ घटित न हो जाए, तब तक उसका भरोसा नहीं किया जा सकता।</p>
<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/Bhojpuri-Cinema-First-Page.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/12/Bhojpuri-Cinema-First-Page-225x300.jpg" alt="" title="Bhojpuri-Cinema-First-Page" width="225" height="300" class="alignright size-medium wp-image-21382" /></a>
<p><span style="font-size: large;">योगदान &#8220;गंगा जमुना&#8221; का</span></p>
<p><strong>वक्‍त</strong> गुजरता रहा और उसके साथ ही नजीर साहब की अंदरूनी छटपटाहट बढ़ती रही। अब तक असीम कुमार भी निर्माता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक चुके थे। अब हर पल मन में बस यही कामना कसकती रहती कि कहीं से कोई फरिश्‍ता आये और इस अंतहीन मानसिक चिंता से उन्‍हें उबार ले। नजीर साहब को शुरू से ही इसका पक्‍का विश्‍वास था कि जिस दिन उनकी कहानी उनके मिजाज से फिल्‍मांकित होकर भोजपुरी क्षेत्रों के सिनेमाघरों के पर्दों तक पहुंच जाएगा, लोग इसे जरूर पसंद करेंगे और तब भोजपुरी फिल्‍मों का बंद पड़ा निर्माण द्वार जरूर खुल जाएगा। एक ओर था इतना प्रबल आत्‍‍मविश्‍वास और दूसरी ओर कड़वे यथार्थ की मटमैली, रूखी और निराशाजनक सच्‍चाइयां! फिर भी अपनी स्‍पष्‍ट सोच के साथ तमाम नाकामयाबियों को झेलते और सहते हुए वे आगे बढ़ते ही रहे। तब उन्‍हें क्‍या पता था कि हमेशा की तरह वे जिस एक और फिल्‍म में अभिनय करने जा रहे हैं, वही कल को भोजपुरी फिल्‍मों के निर्माण की नींव बनने में सहायक सिद्ध होगी और उसी से एक नये भविष्‍य की पृष्‍ठभूमि तैयार होगी। यह फिल्‍म थी &#8220;गंगा जमुना&#8221; और इसके निर्माता थे अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के भाई नारिस खां।</p>
<p><strong>&#8220;गंगा जमुना&#8221;</strong> एक ऐसी फिल्‍म थी, जिसमें पूरेपन में अवधी संवादों का व्‍यवहार किया गया था। हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था। संगीत निर्देशक नौशाद की सूझ, प्रेरणा, जिद और सहयोग की वजह से ही अवधी से पूर्णरूपेण प्रभावित इस पहली हिंदी फिल्‍म का निर्माण संभव हो पाया था। फिल्‍म और फिल्‍म संगीत, दोनों ही दृष्टि से &#8220;गंगा जमुना&#8221; सुपरहिट रही। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इसकी ईर्ष्‍याजनक व्‍यावसायिक सफलता ने पहली बार विश्‍वास उत्‍पन्‍न किया कि अन्‍य क्षेत्रीय भाषाओं की तरह उत्तर भारतीय बोलियों-भाषाओं में भी फिल्‍में बनायी जा सकती हैं। तब इस संदर्भ में चर्चाओं और बहस-मुबाहिसों का बाजार काफी गर्म हो उठा। परंतु तमाम गहमागहमी के बावजूद बंबई फिल्‍मोद्योग का कोई निर्माता एक नयी राह गढ़ने की हिम्‍मत नहीं जुटा सका। यह हिम्‍मत और हिमाकत जिस शख्‍स ने की, वह बंबई से लगभग दो हजार किलोमीटर दूर गिरिडीह, बिहार में कोयला खानों के व्‍यवसाय से संबंधित था और उसे तब फिल्‍म निर्माण का कोई अनुभव नहीं था। बंधुछपरा, शाहाबाद (बिहार) निवासी इस दिलेर हस्‍ती का नाम था, विश्‍वनाथ प्रसाद शाहाबादी।</p>
<p><strong>शाहाबादी</strong> एक पक्‍के भोजपुरिया थे। तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के व्‍यक्तित्‍व ने उन पर भी काफी गहरा प्रभाव डाला था। राजेंद्र बाबू की आदत थी कि जब भी कोई भोजपुरी भाषी उनसे मिलता, वे बगैर किसी संकोच या हिचक के स्‍वयं ही भोजपुरी में बात करना शुरू कर देते थे। भारत के प्रथम नागरिक होने का आभिजात्‍य या गौरव इस भाषाप्रेम में कभी उनके आड़े नहीं आया। वैसे भी सरलता, सहजता और सादगी तो देशरत्‍न की बहुचर्चित विशिष्‍टताएं थीं हीं, परंतु इन सबसे ज्‍यादा उनके भाषाप्रेम ने शाहाबादी को मन की भीतरी तहों तक अभिभूत कर रखा था। इसीलिए उनके हृदय में भी अपनी इस भाषा के सम्‍मान और विकास के लिए कुछ सार्थक काम कर गुजरने की आकांक्षा काफी भीतर तक पैठ चुकी थी। तलाश थी तो सिर्फ उचित अवसर और अनुकूल परिवेश की। संयोगवश गगा जमुना की सफलता ने उनकी इस आकांक्षा को फलीभूत करने के लिए सही स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी।</p>
<p><span style="font-size: large;">सपने साकार हुए</span></p>
<p><strong>1961</strong> के वर्षांत में शाहाबादी अपने एक मित्र के साथ जब बंबई आये, तब बच्‍चा लाल पटेल द्वारा उन्‍हें नजीर हुसैन की कहानी और भावी भोजपुरी फिल्‍म की योजना के बारे में पता चला। अपनी आंतरिक आकांक्षा के कारण सहज ही इस योजना में उनकी गंभीर रुचि उत्‍पन्‍न हो गयी। चूंकि &#8220;गंगा जमुना&#8221; की सफलता ने पहले से ही उन्‍हें उद्वेलित कर रखा , इसलिए इस संदर्भ में निर्णय लेने में उन्‍हें देर नहीं लगी। उस वक्‍त फिल्‍मोद्योग की कई अनुभवी हस्तियों ने उनकी अनुभवहीन स्थिति देखते हुए इस बाबत काफी रोका-टोका। लोगों ने समझाया कि पहली बार निर्माण क्षेत्र में प्रवेश करने के साथ ही इतना बड़ा खतरा मोल लेना उनके पूरे भविष्‍य को अंधेरे में डुबो सकता है, परंतु अपने भाषाप्रेम के कारण शाहाबादी इन फिल्‍मी नसीहतों से बेअसर रहे। नफा-नुकसान की परवाह किये बगैर उन्‍होंने फिल्‍म निर्माण की शुरुआत के लिए नजीर हुसैन को हरी झंडी दिखा दी।</p>
<p><strong>जनवरी 1961</strong> में इस प्रथम भोजपुरी फिल्‍म के निर्माण की आरंभिक तैयारियां नजीर हुसैन के मार्गदर्शन में शुरू हुई। फिल्‍म का नाम रखा गया, &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221;। असीम कुमार, बच्‍चालाल पटेल, रामायण तिवारी और भगवान सिन्‍हा जैसे हिंदी फिल्‍मों से जुड़े भोजपुरीभाषियों ने इस पवित्र यज्ञ को सकुशल संपन्‍न कराने के लिए अथक परिश्रम किया। आपसी सहयोग के आधार पर इन सबों ने उत्तर भारतीय फिल्‍मकर्मियों की एक सूची तैयार कर कलाकारों और तकनीशियनों का चयन किया। इसी आधार पर निर्देशक के रूप में कुंदन कुमार का नाम तय हुआ। चूंकि लेखक नजीर हुसैन की स्क्रिप्‍ट पहले से ही पूरी तरह तैयार थी, इसलिए शेष तैयारियों के बाद शाहाबादी और कुंदन कुमार ने तुरंत ही शूटिंग शुरू कर देने का फैसला कर लिया। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्‍मारक पर फिल्‍म का मुहूर्त समारोह संपन्‍न हुआ और अगले दिन से शूटिंग शुरू हो गयी। फिल्‍म से संबंधित सारे लोगों ने समर्पण की भावना के साथ अपना-अपना योगदान दिया। इस सम्मिलित, समर्पित प्रयास का ही नतीजा था कि समय-समय पर आयी आर्थिक रुकावटों के बावजूद निर्माण की गति में कभी शिथिलता नहीं आयी। पहले से निर्धारित बजट से कुल खर्च काफी ज्‍यादा बढ़ गया, पर शाहाबादी ने इस पर नाक-भौं नहीं सिकोड़ा और फिल्‍म के निर्माण स्‍तर के साथ कोई गलत समझौता नहीं किया। निर्माण की सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद अंतत: 1962 के वर्षांत में यह फिल्‍म सबसे पहले बनारस के प्रकाश टॉकीज में प्रदर्शित हुई। अगले सप्‍ताह ही वहां आलम यह हो गया कि दूरदराज के गांव, कस्‍बों और शहरों से लोग खाना-पीना साथ लेकर बनारस पहुंचने लगे। थिएटर के बाहर मेले का दृश्‍य उपस्थित हो गया और एक नयी कहावत चल पड़ी, &#8220;गंगा, नहाs, बिसनाथ दरसन करs, गंगा मइया&#8230; देखs, तब घरे जा&#8230; !&#8221;</p>
<p><strong>प्रदर्शन के</strong> कुछ ही दिनों बाद &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221; ने क्षेत्रीय फिल्‍मों की सफलता के इतिहास में एक उज्‍ज्‍वल, अनछुआ और स्‍वर्णिम पृष्‍ठ जोड़ दिया। इसके द्वारा भोजपुरी भाषी इलाकों में व्‍याप्‍त दहेज, बेमेल विवाह, नशेबाजी, सामंती संस्‍कारों तथा अंधविश्‍वासी परंपराओं से उत्‍पन्‍न सामाजिक समस्‍याओं का ऐसा सही और संवेदनशील चित्र उपस्थित हुआ कि दर्शकों को यह महज फिल्‍म नहीं बल्कि अपनी ही जिंदगी की अनकही कहानी लगी। इस फिल्‍म से दर्शकों का आत्‍मीय संबंध कायम करने में सबसे अहम भूमिका रही गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार चित्रगुप्‍त की। &#8220;काहे बंसुरिया बजवले&#8221;, &#8220;सोनवां के पिंजरा में बंद भइल हाय राम&#8221;, &#8220;मोरी कुसुमी रे चुनरिया इतर गमके&#8221;, &#8220;अब हम कइसे चलीं डगरिया&#8221; तथा &#8220;हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो संइया से कर दे मिलनवा&#8221; जैसे भोजपुरी लोकसंगीत के रस में डूबे मीठे, दर्दीले और शोख गीतों ने कुछ ऐसा समां बांधा कि वर्षों तक हर ओर बस &#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221; की ही गूंज रही। आज भी इन गीतों का जादू बिल्‍कुल उसी तरह बरकरार है, जैसा तब था।</p>
<p><span style="font-size: large;">उज्‍ज्‍वल भविष्‍य की ओर</span></p>
<p><strong>यह सच है</strong> कि नजीर हुसैन, रामायण तिवारी, लीला मिश्रा, शैलेंद्र, चित्रगुप्‍त, असीम कुमार और कुमकुम के फिल्‍म कैरियर की शुरुआत हिंदी फिल्‍मों से हुई थी और वहां अपनी अपनी सीमाओं में उनकी सुदृढ़ व्‍यावसायिक पहचान भी बनी हुई थी, बावजूद इसके यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इन्‍हें सम्‍मान और सफलता की जो ऊंचाई भोजपुरी फिल्‍मों से मिली, वह हिंदी फिल्‍मों से बढ़चढ़ कर ही रही। कम से कम नजीर हुसैन, तिवारी, चित्रगुप्‍त, असीम कुमार और कुमकुम के संदर्भ में तो यह बात पूरे विश्‍वास के साथ कही जा सकती है। ये सभी भोजपुरी के स्‍टार, सुपर स्‍टार रहे। असीम कुमार और कुमकुम आज भले ही पर्दे पर दिखाई न पड़ें, पर एक वक्‍त था जब यह जोड़ी दिलीप कुमार-मीना कुमारी और राजकपूर-नर्गिस की तरह ही दर्शकों में लोकप्रिय थी। चित्रगुप्‍त तो आज भी भोजपुरी के अकेले सिरमौर संगीत निर्देशक हैं, जिन्‍होंने सबसे ज्‍यादा हिट फिल्‍में दी हैं। इन सबों को सफलता के शीर्ष की छुअन का सुख हासिल कराने में सबसे महत्‍वपूर्ण योगदान &#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221; का ही रहा, क्‍योंकि उसी ने भोजपुरी फिल्‍मों के निर्माण द्वार को पहले पहल खोला और एक नये भविष्‍य की रचना की। कुमारी पद्मा के रूप में जो नवोदित प्रतिभ वहां पहली बार पर्दे पर अव‍तरित हुई थी, आज वही पद्मा खन्‍ना बन कर उपलब्धियों के एक विस्‍तृत आकाश को अपने दामन में समेट चुकी है। हिंदी में जो स्‍थान नर्गिस या मधुबाला का रहा है, भोजपुरी में अपनी वैसी ही जगह बनाने के बाद पद्मा खन्‍ना एक भावप्रवण नर्तकी और अविस्‍मरणीय अभिनेत्री के रूप में आज भी सक्रिय है।</p>
<p><strong>&#8220;गंगा मइया&#8230;&#8221;</strong> के विषय में फिल्‍म इतिहासकार फिरोज रंगूनवाला ने अपनी पुस्‍तक <strong>A Pictorial History of Indian Cinema</strong> में लिखा है -</p>
<blockquote><p><em>Directed by Kundan Kumar, the film was a typical romantic melodrama but the novelty of its language and folk music made it such a sensational hit that it let loose a flood of films in this and its sister dialects.</em></p>
<p><em> </em><em>For a time, the industry had its Bhojpuri Craze (like any other phase that succeds by success). About 18 films were made up until 1966 and one Avadhi in 1964, two Chettisgadhi after 1965 and two Magadhi in 1964-65.</em></p>
</blockquote>
<p><strong>अपनी अन्‍य</strong> विशिष्‍टताओं के अलावा &#8220;गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो&#8221; की चरम उपलब्धि यह रही कि सिर्फ भोजपुरी ही नहीं बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्‍यप्रदेश की अन्‍य आंचलिक बोलियों-भाषाओं में भी फिल्‍म निर्माण की प्रवृत्ति को इसने प्रेरित तथा उत्‍साहित किया।</p>
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		<title>सबसे ज्यादा पैसे ले रहा है महाबली खली</title>
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		<pubDate>Wed, 20 Oct 2010 07:21:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[रियालिटी शो बिग बॉस इस बार कई तरह के आलोचनाओं का शिकार हो रहा है।इस शो में भाग लेने वाले ज्यादातर प्रतिभागी आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं और कुछ कलाकार पाकिस्तानी भी हैं। शिव सेना ने पाकिस्तानियों को इसमें शामिल करने पर नराजगी जतायी थी और शो को बंद करने तक की धमकी दी थी। इसके [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/khali.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/khali-300x193.jpg" alt="" title="khali" width="300" height="193" class="alignright size-medium wp-image-19577" /></a>रियालिटी शो बिग बॉस इस  बार  कई तरह के आलोचनाओं का  शिकार हो  रहा है।इस शो  में  भाग लेने  वाले ज्यादातर प्रतिभागी  आपराधिक  पृष्ठभूमि के हैं और कुछ कलाकार  पाकिस्तानी भी  हैं। शिव सेना ने पाकिस्तानियों  को इसमें शामिल करने  पर नराजगी जतायी थी और शो को बंद करने तक की धमकी दी थी।</p>
<p>इसके कारण निर्माताओं पर शो की छवि सुधारने के साथ टीआरपी बनाये रखने की भी जिम्मेदारी है।इसी की वजह से  प्रबंधन ने डब्लूडब्लूई चैंपियन खली को वाईल्ड कार्ड के जरिए एंट्री दी  है।इसके लिए खली को मोटी रकम दी  जा रही है।खबर है कि हर दिन खली को पांच लाख रुपये की  रकम दी जा रही है। </p>
<p>इस रियलिटी शो में हिस्‍सा लेने वाले प्रतिभागियों को &#8216;साइनिंग अमाउंट&#8217; के अलावा बिग बॉस के घर में रहने के लिए अलग से हर हफ्ते कुछ रकम दी जाती है। साइनिंग अमाउंट प्रतिभागी की लोकप्रियता और बाजार भाव के मुताबिक सामान्‍य तौर पर दो लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक होती है। इसके अलावा प्रतिभागी को हफ्ते भर के लिए एक लाख से तीन लाख रुपये तक पेमेंट करना होता है हालांकि मनोज तिवारी और श्‍वेता तिवारी जैसे कलाकारों को हर हफ्ते पांच लाख रुपये तक दिए जा रहे हैं। वे अब तक के सबसे महंगे मेहमान हैं।हर हफ्ते के लिए खली  40 लाख रूपये वसूल रहे हैं।</p>
<p>वैसे खबर है कि खली वहां हफ्ते भर या दस दिन से ज्यादा वहां नही रहेंगे।शो के नियम के मुताबिक हर सद्स्य को शाईनिंग अमाउंट के  अलावा उनकी प्रसिद्धी के हिसाब से हर हफ्ते कुछ रकम दी  जाती है।</p>
<p>वर्तमान सदस्यों में खली को छोड़कर मनोज तिवारी को सबसे ज्यादा रकम मिली रही ह</p>
<p>सूत्रों ने बताया कि खली ज्‍यादा दिनों तक बिग बॉस के &#8216;घर&#8217; ज्‍यादा दिनों के मेहमान नहीं हैं। दो पाकिस्‍तानी कलाकारों वीना मलिक और बेगम नवाजिश अली के चलते आलोचनाओं के घेरे में आए इस शो की लोकप्रियता बढ़ाने के मकसद से खली को वाइल्‍ड कार्ड के जरिये एंट्री दी गई है। सूत्रों के मुताबिक करीब हफ्ते भर या 10 दिनों के बाद बिग बॉस के घर से खली की विदाई हो सकती है।   </p>
<p>बिग बॉस के घर में खली को कई तरह की रियायतें भी दी गई हैं। खली को आराम करने के लिए बड़ा बिस्‍तर मुहैया कराया गया है। इसके अलावा उसके खाने में अतिरिक्‍त अंडे और टोस्‍ट दिए जाते हैं। बिग बॉस ने यहां तक कह दिया है कि खली को कोई भी प्रतिभागी नॉमिनेट नहीं कर सकता और न ही खली किसी के नॉमिनेशन में हिस्‍सा ले सकता है। इससे साफ है कि इस हफ्ते तक खली को बिग बॉस के घर से कोई भी बाहर नहीं कर सकता।</p>
<p>खली को मिल रहे &#8216;वीआईपी ट्रीटमेंट&#8217; के तहत बिग बॉस ने शो में यह भी ऐलान किया है कि कप्‍तान राहुल भट्ट के साथ खली भी सबसे पहले खाना खाएंगे। उनके खाने के बाद ही अन्‍य प्रतिभागी खाना खा सकता है। खली की सुविधा के लिए बड़ा बाथरुम भी तैयार किया जा रहा है। </p>
<p>वैसे खली  के आ जाने से शो की टीआरपी बढ गई है।और दर्शको को भी इस महाबली को ज्यादा से ज्यादा जानने का मौका मिल गया है।</p>
<p>एजेंसिया</p>
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		<title>इंदिरा गांधी पर प्रस्तावित फिल्म के लिए अभिनेत्री  की तलाश शुरू</title>
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		<pubDate>Sun, 17 Oct 2010 06:12:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अमेरिका में बसे भारतीय मूल के फिल्ममेकर कृष्णा शाह भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर अपनी बनने वाली फिल्म में किसी भारतीय हिरोइन को तय करने की सोच रहे हैं&#124;वह इस फिल्म में विद्या बालन को लेना चाहते थे मगर हॉलीवुड मेक अप आर्टिस्ट ग्रेग केनन की सलाह के बाद उन्होंने विद्या को लेने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/indira-gandhi-in-india1.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/indira-gandhi-in-india1-238x300.jpg" alt="" title="indira-gandhi-in-india1" width="238" height="300" class="alignright size-medium wp-image-19466" /></a> <strong>अमेरिका </strong>में बसे भारतीय मूल के फिल्ममेकर कृष्णा शाह भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर अपनी बनने वाली फिल्म में किसी भारतीय हिरोइन को तय करने की सोच रहे हैं|वह इस फिल्म में विद्या बालन को लेना चाहते थे मगर हॉलीवुड मेक अप आर्टिस्ट ग्रेग केनन की सलाह के बाद उन्होंने विद्या को लेने का इरादा बदल लिया है और अब वह किसी उपयुक्त चेहरे की तलाश में हैं|</p>
<p> कृष्णा शाह का कहना है&#8221;इंदिरा गांधी की भूमिका के लिए अभिनेत्री का चयन बहुत ही कठिन है। अब तक इसके लिए केवल दो बॉलीवुड अभिनेत्रियों पर विचार किया है। इनमें से एक करीना कपूर और दूसरी प्रियंका चोप़डा हैं। दोनों ही इंदिरा गांधी की भूमिका के लिए हैं।&#8221;" उन्होंने कहा, &#8220;मैंने अब तक दोनों कलाकारों में से एक से भी मुलाकात नहीं की है। मुझे जल्दी ही उनसे मुलाकात होने की उम्मीद है। अब सब कुछ उनकी प्रतिक्रिया, उनके पास उपलब्ध समय और अनुबंध पर निर्भर करता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि   मैं जानता हूं कि जो कोई भी इस भूमिका को निभाएंगी वह ऑस्कर पुरस्कारों के लिए एक प्रतियोगी होंगी और उन्हें इंदिरा गांधी की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री के रूप में याद रखा जाएगा।&#8221; इस भूमिका के लिए शाह की पहली प्राथमिकता अभिनेत्री माधुरी दीक्षित थीं लेकिन उन्होंने निजी कारणों से इसके लिए स्वीकृति नहीं दी। </p>
<p>यह भी देखना रोचक है कि क्या काग्रेस फिल्म को अनुमति देती है या नहीं इससे पहले भी लेडी एलिजाबेथ और नेहरू पर आधारित एक फिल्म को काग्रेस ने अनुमति नहीं दी थी।</p>
<p>एजेंसी</p>
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		<title>टीआरपी चाहिए तो अजमल कसाब और अफजल गुरु को भी शामिल कर लो</title>
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		<pubDate>Mon, 04 Oct 2010 11:44:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डेस्क</dc:creator>
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		<description><![CDATA[रियलिटी शो बिग बॉस-4 शुरू होते ही विवादों में घिर गया है। शिवसेना और मनसे ने इस शो में पाकिस्तानी कलाकारों को शामिल किए जाने का विरोध करते हुए इस शो को बंद कराने की धमकी दे डाली है। महेश भट्ट इसे &#8216;चोरों का सम्‍मेलन&#8217; कहा है। एक संस्‍था ने शो के प्रतिभागियों के बारे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/big.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/10/big-300x155.jpg" alt="" title="big" width="300" height="155" class="alignright size-medium wp-image-18759" /></a> <strong>रियलिटी </strong>शो बिग बॉस-4 शुरू होते ही विवादों में घिर गया है। शिवसेना और मनसे ने इस शो में पाकिस्तानी कलाकारों को शामिल किए जाने का विरोध करते हुए इस शो को बंद कराने की धमकी दे डाली है।</p>
<p>  <strong>महेश </strong>भट्ट इसे &#8216;चोरों का सम्‍मेलन&#8217; कहा है। एक संस्‍था ने शो के प्रतिभागियों के बारे में एक सर्वेक्षण के माध्यम से बताया कि  युवा इस शो  के लिए  चुने गये प्रतिभागियों से खुश नहीं हैं क्यों उसमें से ज्यादातर या तो आपराधिक छवि के हैं या  आतंतवादियों का बचाव करने वाले हैं।            </p>
<p><strong>शिवसेना </strong>के प्रवक्ता संजय राउत ने कहा कि उनकी पार्टी इस शो में पाकिस्‍तानी कलाकारों बर्दाश्त  नहीं करेगी। उन्‍होंने कहा कि ‘यदि पाकिस्‍तानियों को इस शो में शामिल ही किया गया है तो अजमल कसाब और अफजल गुरू को भी शो में शामिल करना चाहिए।’  राउत ने कहा कि रियलटी शो में भारतीय कलाकारों को ही शामिल किया जाना चाहिए न कि पाकिस्तानी कलाकारों को। यदि ऐसा नहीं हुआ तो शो को बंद करा दिया जाएगा।</p>
<p> <strong>राज </strong>ठाकरे ने भी बिग बॉस में पाकिस्‍तानियों को शामिल किए जाने का विरोध किया है। राज ठाकरे का कहना है कि जब पाकिस्तान भारतीय कलाकारों को अपने देश नहीं बुलाता तो हम उन्हें क्यों बुलाते हैं। राज ने कड़े लहजे में कहा, ‘क्या हमने ग्लोबल होने का ठेका ले रखा है।’ </p>
<p><strong>संजय </strong>राउत  ने  कहा  कि यदि  इस  चैनल  को टीआरपी ही चाहिए तो आतंकवादियों  के लिए एक शो करा ले । उन्होंने  कहा कि चैनल वाले सारी हदें पार कर  रहें हैं हम  इस किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने होस्ट सलमान खान को भी आड़े होथों लेते हुए कहा कि सलमान खान की संवेदना कहां गई है ।जहां के लोगों ने हमारे देश को इतने लोगों को मारा वे उसे गले लगा रहें हैं।</p>
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		<title>चार्म और ललक तो नायिका के लिए,लेकिन फिल्में नायक के लिए-प्रवेश भारद्वाज</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Sep 2010 08:19:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनीत कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[प्रवेश भारद्वाज के हाथ में जो पर्चा होता है, उसमें हिंदी सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंध, प्रेम और इसके बीच हीरोइन की क्या हैसियत होती है, उसकी एक लंबी सूची होती है। वो सिनेमा एक-एक करके रेफरेंस देते हुए बताते हैं कि कैसे सिनेमा हीरो और हीरोइन की न होकर अंततः हीरो का ही होता है। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/Pravesh-Bhardwaj.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/Pravesh-Bhardwaj.jpg" alt="" title="Pravesh-Bhardwaj" width="230" height="209" class="alignright size-full wp-image-18393" /></a>प्रवेश भारद्वाज के हाथ में जो पर्चा होता है, उसमें हिंदी सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंध, प्रेम और इसके बीच हीरोइन की क्या हैसियत होती है, उसकी एक लंबी सूची होती है। वो सिनेमा एक-एक करके रेफरेंस देते हुए बताते हैं कि कैसे सिनेमा हीरो और हीरोइन की न होकर अंततः हीरो का ही होता है। इस बात को वो एक संस्मरण के जरिये और साफ करते हैं। आज हम हीरो-हीरोइन की बात करेंगे। फिल्मों में हीरोइन इसलिए होती है कि वो हीरो को रिझा सके। फिल्म में एक से ज्यादा नायिका होने की स्थिति में नायिका बंट सी जाती है। हमने जब फिल्म बनानी चाही और उसकी कहानी सुनाया तो हमें सलाह दी गयी कि फिल्म हीरो की होती है, तुम्हारी फिल्म हीरोइन की है, तुम सीरियल बनाओ।</p>
<p>प्रवेश भारद्वाज की कुल बातों में से सबसे असरदार बात यही रही कि उन्होंने कहा कि आमतौर पर किसी भी फिल्म में हीरोइन के प्रति चार्म, ललक होने के बावजूद भी वो हीरो का ही सिनेमा होता है। उनकी ये बात समाज में स्त्री-पुरुष के बीच स्त्री की हैसियत को काफी हद तक स्‍पष्‍ट करती है। लेकिन वो खुद कभी भी स्त्री-पुरुष शब्द का नहीं बल्कि हीरो-हीरोइन शब्द का प्रयोग करते हैं।</p>
<p>हीरो-हीरोइन के बीच के संबंधों को लेकर फिल्मों की सूची में सबसे पहले वो देवदास की बात करते हैं। देवदास ने प्रेम को कहीं पारिभाषित कर दिया है और कुछ इस तरह से कि प्रेम इसी तरह से होते हैं या हो सकते हैं। पारो और देवदास को एक ही मोहल्ले का दिखाया गया है। दोनों बचपन में साथ खेलते-पढ़ते हैं और बड़े होकर प्रेम करने लग जाते हैं। मुझे ऐसे रिश्ते में कई प्रैक्टिकल प्रॉब्लम आती है। मोहल्ले में साथ रहनेवाले लड़के-लड़कियां आपस में भाई-बहन के तौर पर माने जाते हैं और यहां… फिर मुझे इस बात में दिक्कत लगती है कि हीरो दुखी होकर शराब क्यों पीता है, ये समझ नहीं आता।</p>
<p>आदित्य चोपड़ा की दिलवाले हम सबने देखी। अब तक फिल्म उतरी नहीं है। लड़की प्रेम करती है लेकिन मर्यादा में रहकर। यशराज की फिल्मों की सफलता में सबसे बड़ा रोल इसी बात का रहा है। हीरोइन आधी से ज्यादा फिल्मों में मिनी स्कर्ट और टॉप पहनेगी लेकिन वो प्यार करने के लिए प्रेमिका के तौर पर तभी दिखेगी जबकि वो साड़ी पहनकर आती है। हम जैसे दर्शकों ने भी कई ऐसी फिल्में देखी हैं, जहां हीरोइन के साड़ी पहनकर आते ही हीरो को प्यार हो जाता है गोया प्यार की वजह हीरोइन न होकर साड़ी ही हो। ऐसे सीन और फिल्मों का एनआरआइ रुचि बनाने में योगदान रहा।</p>
<p>टीनएज में रोमांस पर बनी फिल्मों में देखें तो बाबी… बाबी और राजा की कहानी… ग्लैमर को पुनः परिभाषित कर दिया गया। टीन एज रोमांस पहले भी आया। अल्हड़ लड़की के आने से बात बदल गयी। ऐसी फिल्मों का अंत दुखांत होता है लेकिन बॉबी इसका अपवाद है। इसी तरह आप देखेंगे कि फिल्म में हीरो-हीरोइन के स्टेटस को लेकर बहुत सारी फिल्में बनी हैं।<br />
प्रवेश भारद्वाज ने साफ कहा कि फिल्मों में प्रेम को जिस रूप में दिखाया जाता है, उसमें सबसे ज्यादा पहली बार में जो प्रेम हो जाता है, उससे दिक्कत है। ऐसा लगता है कि प्रेम सिर्फ और सिर्फ खूबसूरत लड़कियों से ही संभव है। पहली बार में प्रेम हो जाने का आधार भी वही होता है।</p>
<p>इसी प्रेम को लेकर कई फिल्मों में प्रेम-त्रिकोण पैदा करने का फॉर्मूला है। संगम इसका एक उदाहरण है। गोपाल और राधा की प्रेम कहानी। लेकिन शादी सुंदर से होती है। इस प्रेम-त्रिकोण में शादी बहुत इपॉर्टेंट होती है। हर हाल में ऐसे में दिखाया जाता है कि प्रेम किसी और से है और शादी किसी और से होती है। शादी जब भी होती है, मुश्किल हालात में ही होती है। त्रिकोण की फिल्मों में दोहरी भूमिका का योगदान होता है।</p>
<p>इस प्रेम को लेकर शहरी-प्रेम को थोड़ा अलग करके दिखाया जाता है। शहरी परवरिश में अधिकतर में शादी गायब रहती है। अगर अपनी तरफ से एक फिल्म चुनूं तो अर्थ महत्वपूर्ण है। गाइड में एक और रूप दिखता है। ये थीम बहुत कम आया है कि नायिका अपनी मर्जी से शादी के स्वार्थ से अलग हुई है।</p>
<p>अब फिल्मों में स्टेटस की बात करें जो कि एक ही साथ कई अर्थों को स्टैब्लिश करता है… कि हीरो अक्सर खानदानी होता है। खानदान के फेर में प्रेम की बलि चढ़ जाती है। लेकिन हां, पाकीजा सरीखी कुछ फिल्मों में तवायफ को खुशनसीबी जरूर मिल जाती है। फिर भी मीना कुमारी को एक सुख भी नहीं मिलता है।</p>
<p>प्रवेश भारद्वाज के बाद सुधीर मिश्रा ने माहौल को संजीदा बनाने के अंदाज में कहा कि ये तो सबसे अच्छा है कि स्त्री-पुरुष में संबंध बने। हॉल ठहाकों से गूंज गया लेकिन फिर हम कब अचानक से सीरियस हो गये पता ही नहीं चला।</p>
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		<title>बहसतलब-5 में लगा दिग्गजों का जमघट</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Sep 2010 05:36:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनीत कुमार</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मेरी रिपोर्ट पढ़ने के दौरान बार-बार सिनेमा शब्द आने से आप भी सोचेगें कि इन सिरफिरों को सिनेमा की अच्छी ठरक चढ़ी है। जहां पूरा देश राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले पर आनेवाले फैसले को लेकर सुलगने-बुझने की स्थिति में है, सब जगह चौक-चौबंद लगा दिए गए हैं, दूसरी तरफ दिल्ली का हर शख्स बाढ़ और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a class="highslide" onclick="return vz.expand(this)" href="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/ff.jpg"><img src="http://www.janatantra.com/news/wp-content/uploads/2010/09/ff-300x179.jpg" alt="" title="ff" width="300" height="179" class="alignright size-medium wp-image-18284" /></a><strong>मेरी </strong>रिपोर्ट पढ़ने के दौरान बार-बार सिनेमा शब्द आने से आप भी सोचेगें कि इन सिरफिरों को सिनेमा की अच्छी ठरक चढ़ी है। जहां पूरा देश राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले पर आनेवाले फैसले को लेकर सुलगने-बुझने की स्थिति में है, सब जगह चौक-चौबंद लगा दिए गए हैं, दूसरी तरफ दिल्ली का हर शख्स बाढ़ और कॉमनवेल्थ की खबरों के बीच डूब-उतर रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि जब ये देश दो सबसे बड़े मुद्दों के बीच अटक सा गया है, ये लोग उससे मुक्ति सिनेमा में जाकर खोज रहे हैं। जिस सूरजकुंड के रिसॉर्टों के बीच लोग चिल्ल होने आते हैं, वो सिनेमा के पचड़ों को लेकर क्यों चले गए? मौजूदा हालातों से अगर ये पलायन है तो फिर ये योग और आध्यात्म की गोद में गिरने के बजाय सिनेमा के बीच जाकर क्यों गिरे? इसे आप खास तरीके का बनता समाज कहें, तारीखों का संयोग या फिर देश की राजनीति और खेल की तरह ही सिनेमा का भी उतना ही जरुरी करार दिया जाना, ये आप तय करें। फिलहाल…</p>
<p>ये कोई नई बात नहीं है कि सिनेमा को लेकर अपने-अपने दौर में हममे से अधिकांश लोग पागल होते आए हैं। कोई किसी खास हीरो हीरोईन को लेकर, कोई सीन को लेकर तो फिर कोई खालिस सिनेमा देखने को लेकर। तब हीरो-हीरोईन, फिल्म स्टोरी चाहे जो भी हो क्या फर्क पड़ता है? लेकिन सिनेमा को लेकर इस पागलपन में अगर उससे जुड़ी बहसें और विमर्श भी शामिल हो जाएं तो क्या कुछ मामला बदल सकता है? हम अपने मिजाज का सिनेमा होने की मांग को, सिनेमा बनानेवालों के बीच एक दखल के तौर पर रख सकते हैं, कुछ इसी नीयत से बहसतलब 5 में “सपने दिखाता सिनेमा, सिनेमा देखता समाज” के आयोजन में हम शामिल हो गए। सिनेमा को लेकर कुछ सपने तो हमें इस बहस में शामिल होते ही पूरे होते दिख गए कि जिन फिल्मकारों की फिल्मों को देखने के दौरान हम सिनेमाघरों में रुमाल नचाने और सिटी बजानेवाले का काम करते आए, कभी सीरियस हुए तो कभी अपने भीतर उनके बनाए चरित्र खोजने लग जाते, वे कई फिल्मकार हमें चाय पीते, मौसम का हाल पर बात करते नजर आ गए। बहरहाल, </p>
<p>निर्धारित समय से करीब पच्चीस मिनट की देरी पर करीब 11 बजे सुबह सिनेमा पर इस बहसतलब की शुरुआत हो जाती है।</p>
<p>कार्यक्रम को लेकर औपचारिक परिचय देते हुए यात्रा बुक्स की नीता गुप्ता जून में हुई बहसतलब के बीच से छिटककर आए इस विषय पर बात करती है और इन सब बातों की चर्चा करते हुए वो माइक मोहल्लालाइव के मॉडरेटर अविनाश की ओर माइक बढ़ाती है।</p>
<p><strong>सिनेमा ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक हो, मुंबई से बाहर निकले सिनेमाः अविनाश</strong></p>
<p>अविनाश इस कार्यक्रम की जरुरत को सीधे-सीधे आम आदमी की बेचैनी से जोड़ते हैं। लोगों के पास बहुत सारे सवाल हैं। इन सवालों का जबाब देने के लिए लोग भी हैं। लेकिन सवाल कायदे से पहुंच नहीं पाते। बहुत सारे सवाल फुसफुसाहट बनकर रह जाते हैं। मई में हमने बहसतलब की शुरुआत की। जून में विषय रखा था – अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी। अनुराग अचानक से आए, सवालों की बारिश शुरु हो गयी। लगा कि पहली बार ऐसा आदमी फंसा है, सारे सवाल इन्हीं पर उतारो। दोनों ने इन्ज्वॉय किया। लगा की बात अधूरी रह गयी लेकिन इंडिया हैबिटेट में समय की बंदिश थी। फिर इसे बड़े फलक पर कराने का मन बनाया।</p>
<p>हमने फिल्मकारों को बुलाने की सोची। सिनेमा को लेकर जो कॉमन पीपल के दिमाग में सवाल होता है वो फिल्मकारों से सीधे बात करे। जो अलग किस्म का मेनस्ट्रीम बन रहा है, हम चाहते हैं कि सिनेमा मुंबई से कभी पटना में चला जाए, जयपुर चला जाए। सिनेमा में लोकतांत्रिककरण हो, हम इसे कितना बेहतर कर पाते हैं, इस पर फोकस करेंगे।</p>
<p>हमने इन कार्यक्रमों के संचालन के लिए बिल्कुल नए लोगों को चुना है। सारे मॉडरेटर नौजवान हैं, सीधे सिनेमा में नहीं है लेकिन सिनेमा पर बात करते हैं। सिनेमा देखते हुए उनकी अपनी समझ है। हम चाहते हैं कि बहस इन्हीं लोगों से बीच होकर आगे बढ़े।</p>
<p><strong>पहला सत्रः किसके हाथ में वॉलीवुड की कंटेंट फैक्ट्री की लगाम</strong></p>
<p>कंटेट फैक्ट्री की लगाम किसके हाथ में होती है, इस पर तो वक्ताओं ने अलग-अलग राय जाहिर किए ही जिनके मत एक-दूसरे से विल्कुल अलग रहे लेकिन करीब तीन घंटे तक चलनेवाले सत्र की लगाम मिहिर के हाथ में रही। मिहिर नये दौर की फिल्म समीक्षा में एक जरुरी नाम हैं, इस सत्र के मॉडरेटर के तौर पर उन्होंने बहस का माहौल ‘हरीश्चंद्राची फैक्ट्री’ सिनेमा की उस सीन से बताया जहां दादा साहेब फाल्के सिनेमा को पर्दे के सामने बैठकर देखने के बजाय उल्टा होकर देखने लगते हैं प्रोजेक्टर की तरफ। उन्हें समझ में आ जाता है कि असल में वहीं फिल्म की चाबी है। कई मायनों में यही हिन्दुस्तानी सिनेमा के जन्म का बिंदु है। इसी मेटाफर को बदलकर देखें तो पर्दे के आगे का सच क्या है, इसे समझकर हम पर्दे पर चलनेवाली फिल्म के कंटेंट की लगाम को समझ सकते हैं। यानी ऑडिएंस कौन है, उसकी क्या पहचान है, उसके क्या सवाल हैं? साथ ही बहस शुरु होने से पहले ही एक संभावित सवाल उठाए कि मल्टीप्लेक्स के आने के बाद से क्या सिनेमा का कंटेंट तेजी से बदल रहा है? और यदि बदला है तो वो सिनेमा के कंटेंट के लिए किस हद तक साकारात्मक या नकारात्मक है? इसे भी समझना दिलचस्प होगा। अपनी इस छोटी सी नोट्स के बाद मिहिर ने वॉलीवुड की कंटेंट फैक्ट्री की लगाम विषय पर बहस के पहले उसकी जमीन तैयार करने के लिए अजय ब्रह्मात्मज को बुलाया।</p>
<p>सिनेमा हिन्दी का और विमर्श अंग्रेजी में, ये सही नहीं है – अजय ब्रह्मात्मज</p>
<p>अजय ब्रह्मात्मज के हिसाब से फिल्में अच्छी हिन्दी में बनती है लेकिन विमर्श अंग्रेजी में होता है। कुछ लोगों ने साजिशन सिनेमा को अपनी की तरफ किया है। ये वैसे लोग (मंच पर बैठे लोगों की तरफ इशारा करते हुए) हैं, जो सिनेमा में सेंध मार चुके हैं, अपनी एक जगह भी बना रहे हैं। मैं इसे ऐतिहासिक कदम मानता हूं। हर लंबे सफर की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। इस बहसतलब में ऐसे लोगों को चुना है, जो सवाल हिन्दी में सुनकर जबाब अंग्रेजी में नहीं देते, वो आपकी भाषा में बात करेंगे। अजय ब्रह्मात्मज की अपनी समझ है कि इस तरह के विमर्श से मेनस्ट्रीम की सिनेमा के बीच नई तरह की स्थितियां पैदा हो सकती है। उनकी इस समझ और विषय प्रवर्तन (सब्जेक्ट इन्ट्रोडक्शन) के साथ पहले सत्र की बहस की शुरुआत हो जाती है जिसे आगे पहले वक्ता के तौर पर अनुराग कश्यप और गर्माते चले जाते हैं।</p>
<p>सिनेमा की लगाम मेरे ही हाथ में होती हैः अनुराग कश्यप</p>
<p>मेरे सिनेमा की लगाम मेरे हाथ में है। वैसे बजट डिसाइड करता है कि सिनेमा की लगाम किसके हाथ में होगी। प्रोड्यूसर का पेट कितना मजबूत या कमजोर है, किसे जल्दी बबासीर हो जाता है और किसे नहीं होता, ये भी बहुत निर्भर करता है। इसमें फंड भी एक जरुरी मसला है। अलग-अलग देशों में इसके लिए ग्रांट हैं। दीपा मेहता को कनाडा से ग्रांट मिलता है। कई देश इसे टूरिज्म के हिस्से का मानकर ग्रांट देते हैं। हमारे यहां ऐसा कुछ भी नहीं है।</p>
<p>अपने पर्सनल अनुभवों को शेयर करते हुए उन्होंने आगे कहा कि उड़ान बहुत अच्छा नहीं कर पायी लेकिन उस वक्त सेटेलाइट का मार्केट अच्छा था उस वक्त तो रिकवरी हो गयी। मैं पब्लिक स्कूल का पढ़ा हूं, मेरे कुछ दोस्त हैं जिनके पास पैसे हैं तो उनसे उधार मिल जाती हैं। लेकिन अनुराग के फंड के इस तरीके को हम एक ढांचा तो नहीं ही मान सकते हैं। बस इतना है कि आप पर्सनल लेवल पर फिल्म बनाने के साथ-साथ उसके बनाने के साधन और खर्चे किस तरह से जुटा पाते हैं, ये एक जरुरी सवाल बनकर सामने आता है। मतलब ये कि फिल्म बनाने की कामना के साथ-साथ इस बारीकी को भी समझना अनिवार्य है कि सिर्फ आइडिया ही काफी नहीं है, उसे फिल्म की शक्ल देने के लिए बाकी के भी ताम-झाम समझने होंगे।</p>
<p>एक समस्या और भी है कि जब मैं फिल्म बनाने की सोचता हूं तो उस समय तो कोई फंड देने को तैयार नहीं होता लेकिन वही बन जाने पर रिलीज करने के वक्त लड़ाई शुरु हो जाती है। वैसे रिस्क कोई नहीं लेना चाहता। आगे उन्होंने कहा कि मेरे ख्याल से कंटेंट की जब बीज डाली जाती है तब प्रोड्यूसर की भूमिका होती है लेकिन चूल्हे पर चढ़ने पर मसाला बदल जाता है। हम वही फिल्म हूबहू नहीं बनाते जो स्क्रिप्ट हम सुनाते हैं। हमें ये करना पड़ता है। एक भी फिल्म अच्छी चल गयी तो कई बाहरी फायदे हैं लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता। कई बार एक फिल्म के सक्सेस होने से 2-3 साल तक छूट मिल जाती है। आप उसके नाम की कमाई खा सकते हो लेकिन ये काम लंबे समय तक नहीं चल सकता। रामू यानी रामगोपाल वर्मा के साथ फिलहाल वही स्थिति है, अब वो ऐसा नहीं करने की स्थिति में नहीं हैं।</p>
<p>फिल्म में जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि बजट ज्यों-ज्यों बढ़ता जाता है लोगों के आइडियाज बंटने लग जाते हैं। बजट बढ़ने से ओपिनियन मेकर की भूमिका बढ़ जाती है। मतलब साफ है जिसे कि अनुराग बहुत जोर देकर बताते हैं कि जैसे-जैसे आपकी फिल्म का बजट बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे उसमें बाकी लोगों की मर्जी और इच्छाएं शामिल होती जाएगी, सिनेमा की लगाम बंटती चली जाएगी। फिर कोई एक यूनिनेमस तरीके से लगाम नहीं रह जाती है।</p>
<p>एक और जरुरी बात कि हमारे हिन्दी सिनेमा का प्रॉब्लम इटरवल है। आप हिन्दुस्तान में बिना इन्टर्वल के फिल्म बना नहीं सकते। इसमें फूड एंड वेवरेज का बड़ा बिजनेस हैं। इन्टर्वल होने से कहानी के दो भाग हो जाते हैं। इस इन्टर्वल के दौरान विज्ञापन का स्पेस तो जरुर बन जाता है लेकिन कई ऐसी चीजें बिखरती जाती है। लेकिन हमें ये बात समझनी होगी कि ये आर्ट फार्म तो है लेकिन बिजनेस का बड़ा हिस्सा भी इसमें शामिल है। इसलिए कल के लिहाज से आज के सिनेमा में उसी तरह से आर्ट को देखना मुश्किल हो गया है और आज उसी रुप में सिनेमा को बनाना मुश्किल काम है।</p>
<p><strong>इंडियन सिनेमा का ये सबसे खराब फेज हैः जयदीप वर्मा</strong></p>
<p>जयदीप अपनी बात की शुरुआत एक प्रसंग से करते हैं। सुधीर मिश्रा, सईद मिर्जा औऱ कुंदन साह बैठे थे। 45 मिनट से बात कर रहे थे… उनकी बाते… मतलब बहुत ही मजा आ रहा था। कुछ देर के बाद मैंने उनसे पूछा कि इस तरह की बातें कर रहे हो तो इस किस्म की फिल्में क्यों नहीं बनाते। उन्होंने कहा कि पैसा कौन देगा?</p>
<p>इस मामले में अनुराग से अलग लगता है मेरा व्यू- इंडियन सिनेमा का सबसे खराब फेज है। सुधीर मिश्रा ने कहा कि हजारों ख्वाहिशें जैसी फिल्म फिर नहीं बना सकते। अगर वो नहीं बना सकते तो बाकी के क्या चांस हैं? कुछ नहीं. कुछ देर के लिए मैं बाहर जा रहा हूं, मेरे को नहीं करना है ये? जिस लेबल पर जाना पड़ता है, ये सिर्फ इंडिया में नहीं हो रहा है, ये दुनियाभर में जारी है.</p>
<p>सिनपेन ने इनटू दि वाइल्ड फिल्म बनायी लेकिन वही शख्स इस तरह की फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। ये बहुत ही भयावह है। इंडिया में और भी बुरा है, बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं। मेरे ख्याल से सब कुछ होना चाहिए लेकिन सबसे बड़ी बिडंबना है कि ये सबसे डायवर्स कंट्री है लेकिन सबसे कम विविधता वाली स्टोरी आती है। सबसे इम्पार्टटेंट लोग प्रोड्यूसर है लेकिन… अपने यहां वो अवार्ड नहीं देते… शायद इससे मोटिवेशन चेंज हो जाए। प्रोड्यूसर के पास ये स्कोप है, लेकिन वो ऐसा नहीं करते। स्टार में सिर्फ ऐसा आमिर खान ही करते हैं। </p>
<p>लेकिन क्या, इस देश में सिर्फ पल्प फिक्शन बनकर रहेगा, क्या लिटरेचर पर कोई फिल्म नहीं बन पाएगी। जिनके पास पैसा है उनके पास स्पिरिट क्यों नहीं है कि कुछ अलग प्रोजेक्ट पर काम करें। रिलांयस के पास पैसा है, इतना बड़ा वेंचर है लेकिन वो चींटी को भी बुरी तरह पीस कर खा जाएंगे। ये बहुत बुरी चीज है इनके पास इतना पैसा है लेकिन सबको पीस डालने की जो प्रवृति है वो चिंताजनक है।</p>
<p>ये बड़ी समस्या है, ये सिर्फ फिल्म का इश्यू नहीं है। ये समाज के बाकी क्षेत्रो में भी है। मुझे लगता है कि हमारे देश में कल्चर नहीं है, सेवा की कोई फीलिंग नहीं है। ये चीजें जेनरेशन में कैरी करती चली आ रही है।</p>
<p>हम कम्पीलिटली कॉलोनियलाइज हैं, पहले हम इतने नहीं थे। ये जो क्रिएटिविटी को लेकर आत्मविश्वास की कमी है, वो हमारे यहां साफ तौर पर दिखाई देती है। कॉलोनियलाइज हैं, हम खुद नहीं बना सकते हैं। एक कॉम्प्लेक्स है कि हम नहीं कर सकते, इसलिए हम कहानियां नहीं दे पाते। जिनके पास पैसे हैं वो हम पर हंसते हैं। जिस तरीके से वो पेश आते हैं बेसिकली वो आपको-हमें गदहे समझते हैं।</p>
<p>जो लोग (मंच पर बैठे लोगों की तरफ इशारा करते हुए) ब्रेक थ्रू कर रहे हैं, बहुत लोग समझते हैं कि नई फिल्म आ रही है लेकिन ये सिनेमा के दिखाए जाने के तरीके के हिसाब से अलग लग रहा है, कंटेंट के लिहाज से बहुत नया और अलग नहीं है। उस इन्टेक्चुअल कोलोनियलिज्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। ऐसा तो हमेशा से होता आया है। अस्सी में बनी 90 में बनी… मैं तो कभी नहीं इस तरह से नॉन फिक्शन पर फिल्में बनाउंगा। जयदीप ने दरअसल इसी साल के अप्रैल महीने में इंडियन ओशियन बैंड पर जो लिविंग होम नाम से फिल्म बनायी थी उसे लेकर उनका बहुत ही कड़वा अनुभव रहा। रिलांयस की बिग सिनेमा के साथ जो कुछ भी हुआ, जयदीप को इस घटना ने बुरी तरह झकझोरा है। उन्होंने कहा कि इस फिल्म के लिए जो हमें सहना पड़ा, वो बर्दाश्त के बाहर है। पीपली लाइव को आमिर खान ने सपोर्ट किया, अच्छी बात है लेकिन उसके वाबजूद कितनी ऐसी फिल्में बनेगी।</p>
<p>मैं फिर कह रहा हूं कि ये लोग जो कुछ अलग कर रहे हैं वो एक स्लाइट रिग्रेट है वो स्टाइल के लेबल पर ब्रेक थ्रू हो रहे हैं, कंटेंट के लेबल पर नहीं हो रहा। वो तब होगा जब आपको करने दिया जाएगा, वो स्टेप बाइ स्टेप होंगे। आप एक लॉजिक लेकर चलें कि वर्ल्ड लेबल पर वो स्टैंड कर पाएंगे कि नहीं। लेकिन मुझे जो लगता है जो ब्रेक थ्रू है वो स्टैंड नहीं कर पाएंगे। हम स्टोरी टेलर टाइप सम हो गए हैं।</p>
<p>ये शायद पहला जेनरेशन है – जो स्टूपिड है… मीडिया इज दि रिप्रजेंटटर ऑफ दि यंगर पार्ट ऑफ दि सोसायटी. मेरी समझ है कि यूथ की जिस आइक्यू लेबल के नाम पर फिल्में बनायी जा रही है वो इतनी भी खराब नहीं है। लेकिन इनके नाम पर तमाम तरह की नॉनसेंस फिल्में बनायी जा रही है। एक शैलोनेस प्रॉपगेट हो रहा है। ए सेंस ऑफ डिस्कवरी खत्म हो रही है। स्टैन्डर्ड गोइंग डाउन, ये टेक्लनलॉजी में हो रहा है, समाज में हो रहा है, ड्यूरिबिलिटी खत्म हो रही है।</p>
<p>जयदीप सिनेमा की इस हालत पर बात करते हुए मीडिया पर भी टिप्पणी करते हैं और साफ तौर पर कहते हैं कि – सबको पता है कि मीडिया किस लेबल पर गिर चुका है लेकिन दुख की बात है कि जिनके पास मौके हैं, जो इन्फ्लूएंस कर सकते हैं उनमें वो स्पिरिट ही नहीं। आपका योगदान एक बदलाव लाने का है लेकिन वो नहीं करते। वो ट्राय भी नहीं करते। सबसे खराब बात है कि वो चैम्पीयन नहीं करते। बूस्ट अप नहीं करते। ब्रिटिश सिनेमा में कहा जाता है कि अगर क्रिटिक से ऐसा सपोर्ट नहीं मिला होता… तो नहीं करते। आलोचना और समीक्षा के स्तर पर भी कुछ खास और बेहतर नहीं हो रहा। रिव्यू में प्रेज एफर्ट नहीं दिखता, आलोचना के लिए सबसे ज्यादा दिखता है, लॉक करने के लिए लिखा जाता है, ये सैड चीज हैं, प्रॉब्लम दिखता है। अच्छे जो राइटर हैं उनको स्पेस नहीं दिया जाता।</p>
<p>बड़ी कंपनी यशराज फिल्मस, बिग कंपनी, यू टीवी कहेंगे – हैव टू गो थ्रू स्क्रिप्ट बोर्ड। लेकिन मुझे कहीं दिखा नहीं कि कोई फिल्म इस तरह से स्क्रिप्ट बोर्ड से डिसाइड होकर आय़ी हो। मेरा सिर्फ इतना कहना है कि जिन्होंने रगड़ा है उन्हें वो इज्जत तो मिले। वो पैसे बनाने के लिए फिल्में नहीं बना रहे हैं।</p>
<p>काफी डायरेक्टर को मिलता हूं, वो भी प्रोड्यूसर के लैंग्वेज में बात करते हैं, बताते हैं कि एक्सपेंसिव मीडियम है, प्रोड्यूसर की तरह समझाते हैं। प्रोड्यूसर को हम बिजनेसमैन क्यों कहें वो तो रिस्क लेता ही नहीं। बाकी लोग रिस्क लेते हैं। प्रोड्यूसर को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये खराब बात है कि ये टैलेंटेड लोग ऐसे बात करते है कि रिटर्न भी देखना पड़ेगा।</p>
<p>और वास्तविक सच में दो जरुरी बिंदुओं को जोड़ा।</p>
<p>सिनेमा की कंटेंट को मार्केटिंग और पीआर तय करने लग गए हैः अनुषा रिजवी</p>
<p>जयदीप ने बहुत सही बात कही कि प्रोड्यूसर को बिजनेसमैन क्यों कहें, वो तो रिस्क नहीं ले रहा। तो फिर फिल्म का कंटेंट उसके नाम पर क्यों जाए।</p>
<p>दो एस्पेक्ट- मार्केटिंग, एक खास तरह की टीम है-30 साल तक के लोगों की। वो तीन-चार शहरों में जाकर एक फाइल बना देते हैं और तय कर देते हैं कि किस तरह की फिल्म देखेंगे किस तरह की नहीं। पीपली लाइव के साथ यही किया। इंदौर, अहमदाबाद और मुंबई में गए बाकी के हिन्दुस्तान को छोड़ दिया।</p>
<p>दूसरा- पीआर जो कि कंटेंट को काफी हद तक फिल्म को डिसाइड करने लगा है कंटेट इससे भी डिसाइड होता है। ये दोनों बहुत ही पॉवरफुल हो गया, इसे चेक किया जाना चाहिए।</p>
<p>अनुषा रिजवी के बोलने के बाद महमूद फारुकी ने साफ कर दिया कि मुंबई में रहकर जिन लोगों ने स्ट्रगल किया, हम उनमें शामिल नहीं है। इसलिए उनकी तरह इस मसले पर बात करने की स्थिति में नहीं है।</p>
<p><strong>सिनेमा में कला की समस्या अलग है, बाजार की समस्या अलग हैः महमूद फारुकी</strong></p>
<p>बहुत लोग हमें खुशकिस्मत समझ रहे हैं। बहुत सारे लोग बंबई में खड़े होकर लगातार संघर्ष करते हुए काम कर रहे हैं। मैं अपने को मिसफिट पाता हूं। ये अलग जर्नी है, जो लोग कर रहे हम उनसे अलग हैं। ये लोग ज्यादा बेहतर बता सकते हैं। इसलिए ज्यादा बात नहीं कर रहे।</p>
<p>मेरे हिसाब से कला की समस्या अलग है, बाजार की समस्या अलग है।</p>
<p>1970 से ये स्ट्रगल चल रहा है कि सिनेमा ऐसा हो जो कि कला और साहित्य के बरक्स खड़ा हो सके। कला की समस्या तीस-40 साल से वहीं की वहीं है। हम कैसे एक ऐसा सिनेमा बनाएं जो कि कम पढ़े लिखे लोगों के लिए भी बना सकें।</p>
<p>बिजनेस के मॉडल हमेशा बदलते रहते हैं। तो सिनेमा वैसा नहीं रह जाता है जैसा पहले होता है।</p>
<p>दर्शक के नंबर की अहमियत नहीं रह गयी है। क्रांति को लोगों ने ज्यादा देखा 3 इडियट से। लेकिन सबके वैल्यू अलग हो गये। ये 70-80 वाले दौर से अलग है।</p>
<p>क्या हम सिनेमा को थिएटर लाइफ से जोड़ रहे हैं। हम थिएटर रिलीज से जोड़कर देख रहे हैं। मुझे लगता है इस पर बात होनी चाहिए।</p>
<p>चंद्रप्रकाश द्विवेदी काशीनाथ सिंह की रचना कासी का अस्सी पर फिल्म बनाने जा रहे हैं जिसकी अभी से ही चर्चा होनी शुरु हो गयी है। चंद्रप्रकाश शुरु से ही अतीत को विवेक का आधार मानते आए जिसे लेकर स्त्री-पुरुष सत्र में काफी विवाद भी हुए, इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। फिलहाल वो जयदीप वर्मा की तरह मौजूदा स्थिति को बहुत खराब नहीं मानते।</p>
<p><strong>हिन्दी सिनेमा के मौजूदा दौर को लेकर निराशा नहीः चंद्रप्रकाश द्विवेदी</strong></p>
<p>मैं भी कह सकता हूं कि मैंने कभी भी किसी ऐसे विषय पर काम नहीं किया जो किसी ने करने के लिए मजबूर किया। किसी ने अब तक मजबूर नहीं किया। मैं तय करता हूं, क्यों तय करता हूं। किस तरह के विषयों को छूता है उस पर बात होती है। सब अलग फिल्म बनाते हैं इससे साफ है कि हिन्दी में इतनी जगह है कि हम अलग-अलग किस्म की फिल्म बनाते हैं। वर्तमान में संभवाना है मैं इससे निराश नहीं हू।</p>
<p>कुछ लोगों के हाथ में है-अजय ने कहा, नाम गिनाए थे मैं नाम लेना चाहता। हम यहां राज्याभिषेक और निंदा करने नहीं आए हैं। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कोई भी व्यक्ति आपसे नहीं कह रहा है कि ऐसा बनाइए, आप खुद लेकर आते हैं कि ऐसा बनाएं। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने बहुत ही कम समय में लगभग सूत्र वाक्य में अपनी बात रखी और उम्मीद जतायी कि ऐसी स्थितियां हैं कि हम अपनी मर्जी से अपने तरीके का काम कर सकते हैं। हां ये जरुर है कि उसके लिए हमें कोशिश करनी होगी।</p>
<p><strong>फिल्म बनाने के लिए खुद को लड़ना पड़ेगाः सुधीर मिश्रा</strong></p>
<p>जयदीप बहुत अच्छा बोला, जो व्यथा है… मुझमें ऐसा नहीं है। मैंने ऐसा माना नहीं। मुझे लगता है कि मेरे साथ कुछ अच्छा ही हुआ। इस मुल्क में मैं जहां कलाकारों को आम आदमी से अलग दर्जा नहीं देता, इस मुल्क में जहां प्रवीण तोगड़िया रहता है, प्रणव मुखर्जी की फिलास्फी है, पी चिंदरबम अपने प्लेन से लोगों का खात्मा करना चाहते हैं तो इस मुल्क में सुधीर मिश्रा के साथ कुछ बुरा नहीं हुआ।</p>
<p>अलग-अलग दौर में लगाम अलग-2 लोगों के हाथ में होती है। क्या ऐसा है कि मेरे भीतर इतनी काबिलियत है कि हमेशा लगाम मेरे हाथ में होती। अगर होती तो कोई हल ढूंढ़ न लेते। अनुराग की तरह बाकी लोग क्यों नहीं?</p>
<p>दो तरह के आर्टिस्ट होते हैं- एक बचकानी ख्वाहिशें होती है औऱ दूसरा कि कुछ लोग बहुत कम को अपील करना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए टेकनलॉजी फायदेमंद हैं।</p>
<p>अब लगाम बहुतों के हाथ में है। कार्पोरेट के हाथ में है। लेकिन कार्पोरेट में स्क्रिप्ट नहीं सुनी जाती। मेरे हिसाब से सात-आठ स्टार के हाथ में है।</p>
<p>लोग मुझे अक्सर कहा करते हैं कि तुम अपने फैन्स के बीच फंस गए हो सुधीर, उससे निजात पा लो। सिनेमा के लिए सबसे जरुरी चीज है इंडीपेंडेंसी। जब तक आपमें इंडीपेंडेसी नहीं होगी काम नहीं कर सकते। मेरे पास न्यूकमर आते हैं कि आप मुझे फिल्म सिखा दो। मैं कहता हूं 100 करोड़ लाओ.सिखा दूंगा फिल्म बनाना। फाइनेंस मोड समझना होगा। आज आपको मॉल का माहौल है, आप सिंगल स्क्रीन में नहीं देखते। फिल्म के बहाने मॉल में लाएं जाते हैं। सिंगल स्क्रीन में सिर्फ फिल्म देखने जाते थे। कान हर फिल्म को इज्जत देता है। फिल्ममेकर को इज्जत देता है। हमारे लिए इज्जत खत्म हो गयी है इसलिए हमलोगों ने ऐसी फिल्में बनायी ही नहीं। विमल ने अपनी तरह से की, मणि कौल ने अपने तरीके से की थी, राजकपूर ने अपने तरीके से की थी। लगाम के लिए लड़ना पड़ेगा, समस्याओं से जूझना पड़ेगा नहीं तो फिल्म नहीं बनाने के कई बहाने हैं।</p>
<p>बहसतलब के चारो सत्र में हस्तक्षेप का प्रावधान है जो कि ऑडिएंस के सवाल से अलग मसला है। इस सत्र में अतुल तिवारी और भूपेन ने हस्तक्षेप किया।</p>
<p>आज सिनेमा की सीढ़ियां बाजार की तरफ खुलती हैः अतुल तिवारी</p>
<p>कश्मीर के बाद हस्तक्षेप बड़ा डेनजरस शब्द हो गया। 24 को जिरह हो रही है वहां बहस नहीं हो रही है। बहस में क्रिएटिवनेस होती है। मैं कश्यप संहिता की बात करना चाहूंगा। दोनों भाइयों को देखिए एक ऑडिएंस के हिसाब से फिल्म बनाता है, दूसरा कि एक ऑडिएंस से कहने के लिए फिल्म बनाता है। मैं बहसतलब की इस लाइन से डिफर कर रहा हूं कि दर्शकों का सिनेमा हो जाए। सिनेमा में सबका विजन शामिल होता है। कैमरामैन का भी विजन शामिल होता है, उसका अपना इन्टरप्रटेशन है। क्या थीअरिटकली कंटेंट की लगाम किसी किसी एक के हाथ में रह पाएगा।</p>
<p>सुधीर ने कहा कि लड़ना पड़ेगा- नीतिश को भी लड़ना पड़ेगा भले ही सड़के बना ली हो। ये जीवन के हर हिस्से में शामिल है, हर फील्ड में लड़ना होगा।</p>
<p>फिल्म को पूरी तरह दर्शकों का हो जाने के सवाल पर अतुल तिवारी ने कहा कि ये भी गलत एप्रोच है, सिनेमा को लालू पासवान नहीं हो जाना चाहिए, जिस पर मिहिर ने आगे जोड़ा कि- मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह आल्हूवालिया भी नहीं हो जाना चाहिए।</p>
<p>अतुल तिवारी हस्तक्षेप को सिनेमा- एज ए स्पेस की बहस तक ले जाते हैं- हर कला का एक घर होता है, हर कला कहां बसती है उसका भी स्तर होता है। आज सिनेमा का एक घर नहीं बनता, एक बाजार होता है जिसमें इत्तफाकन एक सिनेमा भी होता है। भूखे-नंगे लोगों की फिल्म देखकर कौन बर्गर खा पाएंगे। सिनेमा की सीढियां बाजार की तरफ निकल जा रही है। इसमें जोड़ते हुए महमूद ने कहा कि- कोका कोला और बर्गर का वजन इतना भारी है कि वो अच्छी फिल्मों पर भी हावी हो सकती है।</p>
<p>सिनेमा में हमें हाशिए के लोगों और विकल्प की बात करनी होगीः भूपेन</p>
<p>भूपेन हस्तक्षेप के बहाने पूरी बहस को सिनेमा में विकल्प और सरोकार के सवाल से जोड़ने की कोशिश करते हैं और इसमें हाशिए के लोगों की अनिवार्यता पर जोर देते हुए फैज की इन पंक्तियों से अपनी बात की शुरुआत करते हैं।</p>
<p>सीसा हो कि जाम हो कि दुर<br />
जो टूट गया सो टूट गया<br />
सीसों का मसीहा कोई नहीं…<br />
क्यों आस लगाए बैठे हो… </p>
<p>भूपेन ने साफ तौर पर कहा कि सुधीरजी से हमें आज निराश होना पड़ा है-<br />
हिन्दुस्तान बहुत महान है, ग्रोथ रेट बढ़ रहा है<br />
कौन कंटेट डिसाइड कर रहा है…<br />
बड़ी पूंजी का कोई विकल्प है, बाहर निकलने का रास्ता है.<br />
सरकार से क्या उम्मीदें हैं?</p>
<p>कौन फिल्म बना रहे हैं, पूरा आइडिया कहां से आ रहा है, सबसs डॉमिनेंट कौन होता है, वो किस सेंसिबिलिटी के साथ फिल्म बनायी है, ये मायने रखती है। अपर कास्ट, अपर क्लास, इंगलिश स्पीकिंग लोग फिल्म बनाते हैं, बाद में क्लास बदल जाते हैं। भूपेन ने कहा कि ऐसे में बल्ली सिंह चीमा – तय करो किस ओर हो, आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो की लाइनें याद आती है।<br />
सारे वक्ताओं के बोल लेने और हस्तक्षेप करने के बाद सवाल-जबाब का जो दौर शुरु हुआ, उसके आगे लंच का इंतजार मद्धिम पड़ गया। मेरी इच्छा थी कि इससे व्यवस्थित तौर पर आपके सामने रखूं लेकिन दिनभर की लगातार व्यस्तता, लंबी थकान, इतनी गहरी रात और फिर अगले दिन फिर दिनभर बैठने का काम। थोड़ी हिम्मत तो बची है लेकिन इसे मैं बचाकर अगले दिन के लिए रख रहा हूं। फिलहाल मैं सत्र के दौरान जो जैसा नोट कर पाया-चिपका दे रहा हूं, कम से कम आप उस बातचीत की फ्लेवर का मजा ले सकेंगे।</p>
<p>सवाल-जबाब सत्र</p>
<p>अजय ब्रह्मात्मज – मंच के तमाम लोगों से सवाल करते हैं। आप उन फिल्मों की चर्चा करें जो आप बना नहीं सकें। उससे निकलकर आएगा कि कौन फिल्म के कंटेंट तय करता है। कुछ के साक्ष्य रहा हूं… जो आपकी हार है उससे भी सामने लाएं, शर्माएं नहीं।</p>
<p>चंद्रप्रकाशजी का जबाब – मेरी यात्रा भारत के अतीत में रही है। बीच में किसी ने कला जीविका की बात की तो मैं हैरान हूं, प्राचीन भारतीय मनोविनोद में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा कि- कला जब जीविका हो जाती है तो वह कला नहीं रह जाती है, क्या हमलोग सचमुच कला के लिए काम कर रहे हैं। दूसरा अजय की बात!</p>
<p>मैंने ऐसी कई कहानियां लिखी जिसे मैं बाजार के पास लेकर गया</p>
<p>कुछ से सफलता मिली कुछ से असफलता मिली, कुछ सितारे हां कर चुके थे। उन पर पैसे लगानेवाले लोग भी तैयार हो गए, टेलीविजन से मेरा रिश्ता रहा है। मैं दोष देता था मार्केटियर की। बाजार तय करता है, हमसे पूछा जाता है कि क्या इससे समाज का कोई कनेक्ट है। लेकिन सच्चाई है कि जिन कहानियों पर बात नहीं करते वो हमारे पास है हम कार्पोरेट के पास जाते हैं, कुछ तैयार होता है कुछ नहीं।<br />
फिर एक सवाल लागत की होती है कि क्या रिटर्न आ जाएगा। बाजार को मतलब लागत के वापस आने से हैं। अजय भाई जहां हम रुक जाते हैं वो ये कि हम वापस लाने की बात पर कनंविंस नहीं कर पाते। इसे मैं फिर भी कंटेंट की पराजय नहीं मानता हूं। यदि अगर अभिव्यक्त किए बिना नहीं जी सकते तो आपको माध्यम मिल जाएंगे।</p>
<p>सुधीर मिश्रा – डॉक्टर साहब से सहमत हूं। मैं क्रोसेबा साहब से बात करना चाहता था, किया। उन्होंने कहा हमेशा वही फिल्में बनाना जो तुम बनाना चाहते हो। अगर फिल्म मेकर बनना चाहते हो तो बहुत सारी फिल्में आपके पास होनी चाहिए। डॉयरेक्टर वो अच्छा है जो कि कन्विंस कर सके कि मेरे ख्बाब पर पैसे लगा सकते हो। मैंने एक फिल्म करनी चाही, दो बूढ़ो की कहानी है जो नहीं बनी।. बहुतों के हाथ में है लगाम. सिनेमा का डेमोक्रेटाइजेशन जरुरी है। हर आदमी को सिनेमा बनाने के लिए मुंबई न आना पड़े।टेक्नलॉजी ऐसा करेगा। अगर बनारस में रहकर बने तो वो ट्रू डेमोक्रेटाइजेशन होगा।</p>
<p>अनुराग – अपने-अपने जूतों में सब सही है। जयदीप से मैं डिस्एग्री हूं। रुलाते हैं लेकिन उदास कर देते। आपको यथार्थ को एक्सेप्ट करना पड़ेगा। समय बदल चुका है। अब पचास चैनल आते हैं-दो मिनट में बदल देते हैं। अगर आप फिल्म बनाना चाहते हैं तो इन हालातों को समझना होगा। अब फिल्म देखना इवेटं नहीं रह गया है। प्रॉब्लम होती है फिल्म मेकर की वो अलग तरह की चीजों में फंस जाता है। मैंने झूठ-झूठ बोल-बोलकर फिल्में बनायी है। कार्पोरेट को सीन स्क्रिप्ट समझ नहीं आता। तीन पिक्चर ऐसी बन गयी जिसमें कोई सपोर्ट नहीं- उड़ान, यलो बूट्स, माइकल… आपको एक्सेप्ट करना पड़ेगा कि आप कहां है, ऐसी फिल्में बनती जाएगी। बिहार बेस्ड बना रहा हूं, 16 करोड़ का बजट मिल रहा है। हर चीज पॉसिबल है, पहले सेल्फ/इगो हटाना पड़ेगा। तय करना होगा कि या तो फिल्म बनानी है या फिर पैसा कमाना है, हमें तय करना होगा- या तो फिल्म बनाओ, या बंगला बनाओ. तीन-चार पांच साल हमलोग कहीं रुकनेवाले नहीं है। फिल्म बनाते रहेंगे।</p>
<p>जयदीप – मैं निराशावादी नहीं हूं। मेरे पास स्क्रिप्ट है तीन-चार लेकिन इन्टरेस्ट नहीं है। मेरा प्राब्लम है कि मैं निकल जाता हूं। एक एस्केपिस्ट हूं मैं निकल जाता हूं। लेकिन फिर मैं वापस आ जाता हूं।</p>
<p>महमूद – आज सिनेमा सचमुच इंगलिश मीडियम पीपल के लोगों के लिए बन रही है लेकिन निकल कैसे सकेंगे। लेकिन फिर भी एक-पढ़े लिखे लोगों के लिए बना रहे हैं। भूपेन का जबाब दिया-हम जिससे निकलने की बात कर रहे हैं तो वो हमें तालिम से भी निकलने की कोशिश कर सकते हैं।</p>
<p><strong>अनुषा – इस मामले में दबंग बहुत अच्छा स्टेप है, अंग्रेजी से निकलने की कोशिश है।</strong> </p>
<p>अनुराग – स्क्रिप्ट अलग थी, फिल्म अलग। जो स्क्प्टि थी वो आज की मदर इंडिया की थी। सलमान के साथ जो भी फिल्म बनाया वो अपनी फिल्म तो बनायी ही नहीं। फिर भी भाषा वही रही, कपड़े वही रहे, वातावरण वही रहा, सौ फीसदी तो नहीं लेकिन पचास फीसदी तो वो कर पाया औऱ सलमान से करवाया। भाषा बदली, एक्सप्रेशन वही रह गया।</p>
<p>रवीशः क्राइसिस स्टोरी टेलिंग को लेकर है</p>
<p>पूरी बहस ये मानकर चल रही है कि सब अच्छी फिल्म बन रही है। दबंग में सिटी बजाना नहीं सीखा। पीपली-फिल्म कम देखी लोगों को ज्यादा देखा। मैं आदमी एक हूं लेकिन दर्शक कई तरह का हो सकता हूं और हूं।</p>
<p>रेट बोल जवानी हो को आप-हम नहीं जानते लेकिन लोग देख रहे हैं, जबरदस्त पॉपुलर हो रहे हैं। हम विकल्प को अपने तरीके से फिक्स कर दे रहे हैं। कई तरह के बाजार हैं। क्राइसिस स्टोरी टेलिंग को लेकर है। स्टोरी टेलिंग बेजोड़ है दबंग में और पीपली लाइव में। टिनहिया हीरो है… दबंग है। हम वो ग्रैंड कहानियां नहीं दे रहे हैं। बहुत लिमिटेड रिएलिटी घूम रहा है। मल्टीरियलिटी दर्शक हूं मैं… ज्यादा से ज्यादा लोगों को छू जाए, ऐसी फिल्में कम बन रही है। कहानी के कहने में कमजोरियां है, गाने औऱ तकनीक को ठोस दे रहे हैं। लोगों का जब सपोर्ट नहीं होगा तो कार्पोरेट तो खेलेगा ही खेलेगा।</p>
<p>शेष नारायण सिंह – पहली फिल्म भाभी देखी- चल उड़ जा रहा रे पंछी, आखिरी फिल्म पीपली लाइव. पिंजर सात बार देखी, सबने कहा कि फिल्म बहुत अच्छी। दो लेड़ीज के साथ देखी जो 1947 में रेप होते-होते बची थी। हर फ्रेम में कंटेंट भरा पड़ा था। हर फ्रेम चट करने पर पेंटिंग बन सकती थी। ये फिल्म तूफान खड़ी करने में कामयाब क्यों नहीं रही। मार्केट के लिहाज से भी। टाइम, स्पेस, दलाली, भाषा हर पैमाने पर मैंने दुनियाभर के रैकेटियर के बारे में बात की तो कहा कि बेहतरीन फिल्म है। ये क्यों हीं बड़ी बन पायी।</p>
<p>अनुराग – लोगों ने फिल्म देखी नहीं। कई बार फिल्म लोगों की रडार में आती है कई लोगों के नहीं। फिल्म के टीवी पर बनी रहने से सर्वाइव करने से बनी रह जाती है।</p>
<p>सुधीर मिश्रा – हर फिल्म उसी वक्त सफल नहीं होती। पाथेर पांचाली के साथ भी ऐसे ही हुआ। कुछ फिल्मों के साथ अलग सा रिश्ता बनता है। कोई ऐसा मिला नहीं कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी नहीं देखी हो लेकिन कहां देखी ये अलग बात है। सब फिल्म एमीडिएटली विकम फैशनेबुल लेकिन कुछ के साथ बाद में होता। वक्त गुजरने के साथ फिल्म क्या होता है, ये देखना होगा। दि मेजोरिटी इज नॉट आलवेज राइट, फिल्ममेकर के साथ ऐसा नहीं होता।</p>
<p>महमूद – सीरियस चीजें हमेशा कम होगी। पिक्चर की अच्छी का होना और चलना अलग है। मार्केटिंग का बड़ा रोल होता है। छोटी फिल्म को बनानेवाले का रास्ता बंद हुआ है एक स्टार के जुड़ने से पीपली लाइव से।</p>
<p>अजय – फिल्म का चलना क्यों जरुरी है, बल्कि बहुत जरुरी है।</p>
<p>अनुराग – अब फिल्मों को इतना सस्टेन करने के लिए समय ही नहीं मिलता। हमें बदलाव को समझना होगा। तकनीक तेजी से बदल रहे हैं।</p>
<p>अतुल तिवारी – हर फिल्म की एक कुंडली होती है। भाग्यवादी नहीं हूं फिर भी। मार्केट हमसे देखने का अधिकार छिन लेता है। एक ऐसा प्रयास हो जो कि कहीं देखी ही नहीं गयी।</p>
<p>चंद्रप्रकाश – ऐसा प्रयास हो चुका है, लेकिन सफल नहीं हुआ।</p>
<p>विप्लव राही – आमिर खान के आने से पीपली सक्सेस हुई है।</p>
<p>हमें इस बात का प्रयास करना चाहिए कि एक और जो दर्शक वर्ग है वो फिल्मकारों के बीच आ जाए।</p>
<p>पाणिनी आनंद – हम हमेशा उस किसान के बारे में ही क्यों सोच रहे हैं जहां किसान पांच फिट का है। उस गोरे-चिट्टे किसान पर फिल्म क्यो नहीं बनती। हम आज के विषय को क्यों नहीं उठा पा रहे हैं? इसको समझा जाए। नत्था लाचार ही क्यों दिख रहा है?</p>
<p>अनुराग – हमलोग कैपटलिज्म बना ही नहीं सकते। घोबी घाट नाम पर हंगामा मचा हुआ है। हम ऐसे देश में रहते हैं जहां मरने के बाद भी राजीव गांधी पर फिल्म बना ही नहीं सकते। इंडिया में करप्शन करने से करियर और बढ़ जाता है। असली नाम से कैरेक्टर इस्तेमाल करने से झमेले हो जाते हैं। मैं सीडब्ल्यूजी पर फिल्म बनाना चाहूंगा तो क्या फिल्म बनाना चाहेंगे।</p>
<p>राकेश कुमार सिंह – मुझे नहीं लगता कि यहां अनरियल चीजों पर फिल्म बनती है. फिल्म उन्हीं मसले पर बनती है जो कि रीयल होती है। </p>
<p>महमूद – दो तरह के किसान आते रहे हैं- एक रीयल, दूसरा मिथुन दादा की तरह। 80 तक किसान था फिर नहीं था। एक पैरलल, दूसरा कमर्शियल में। किसान क्यों नहीं आ रहा ये व्यापक सवाल है।</p>
<p>वरुण ग्रोवर – हिन्दी सिनेमा किस तरह के कंटेट को बनाता या नहीं बनाता है। हमारा जितना गुस्से में है… 70 में एंग्रैमैन निकला लेकिन सटायर क्यों नहीं निकला? सिनेमा में सटायर क्यों नहीं पहुंचा?</p>
<p>सटायर को लेकर हिन्दी सिनेमा इतना क्यों खाली है?</p>
<p>अनुषा – रीजनल सिनेमा में ये हैं। मुझे नहीं लगता कि पीपली सटायर फिल्म है। क्योंकि मैं सटायर में बहुत सारी चीजें देखता हूं।</p>
<p>सुधीर मिश्रा – जाने भी दो यारों, पोयर सटायर था। हम मेलोड्रामा में जाना ज्यादा पसंद करते हैं। आशीष नंदी जिस मेलोड्रामा की बात करते हैं। तो फिर उस तरह की फिल्में ज्यादा बनती है, मार्केट फिर उस प्रवृति को मार्केट बिगाड़ते भी है। फिल्ममेकर को कहानी कहनी है। आफ किसी का अंदाज ए बया तय नहीं कर सकते। एंड में क्राइसिस फिल्ममेकर का है।</p>
<p>अनुराग – मैंने जिस फिल्म में जो कहना चाहा वो मैंने कह दिया। आप उम्मीद ज्यादा कर लेंगे तो फिर आपको लगता है कि नहीं हो पाया। </p>
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